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मनुर्भव:

मनुर्भव:

सृष्टिकत्र्ता ने जब सृष्टि बनाई तो सृष्टि के समस्त परिचालन को दृष्टि में रख कर मनुष्य को बनाया। पृथ्वी पर रहने वाले करोड़ों जीवों से मनुष्य भिन्न है। हमारे अनेक गुण हमें अन्य सभी प्राणियों से अलग करते है, हम ना केवल भाषा के माध्यम से अपने भाव को प्रकट कर सकते है बल्कि विवेक को प्रयोग करके अन्य सभी प्राणियों को अपने बस में कर सकते है। मनुष्य अपने इच्छाशक्ति के द्वारा क्या नहीं कर सकता है। लेकिन आज के असंतुलित वातावरण, अव्यवस्थित दुनिया को देखकर यह ज्ञात होता है कि शायद मनुष्यता की कमी है, सुन्दर दिखने वाले, आधुनिक पोशाक पहन कर कुछ शिक्षाप्रद बात करने वाला हर व्यक्ति मनुष्य नहीं होता है। मनुष्य कहलाने के लिए कुछ गुणों का उपस्थित होना जरूरी होता है, लेकिन फिर भी पूरी तरह मनुष्य नहीं बन सकते हंै। केवल विवेक पूर्ण होना बड़ी बात नहीं होती है, हम अपना विवेक अथवा अपनी चिन्ता और चेतना को किस प्रकार उपयोग करते है वह महत्वपूर्ण है।

मानव बनना तभी सफल होता है जब उसका मूल्य हम समझ सकें, केवल अर्थ उपार्जन करके अथवा समाज में कुछ नाम कमाने से हम सही मायने में मनुष्य नहीं बन जाते है। एक बार स्वामी विवेकानंद एक जहाज में विदेश यात्रा कर रहे थे। उनके साथ एक युवक उच्च शिक्षा के लिए जा रहा था। स्वामी के साधारण भेष-भूषा को देखकर युवक अपने आप को उनसे अलग रखता था। उसको अपनी स्थिति के लिए बहुत गर्व और अहंकार था। स्वामी जी ने युवक के पास जाकर पूछा, आप कहां जा रहे हैं और किस लिए? युवक अत्यंत खुश होकर बोला विलायत जा रहा हूं उच्च शिक्षा के लिए। स्वामी जी ने फिर पूछा  युवक आश्चर्य पूर्वक देखकर बोला, पढ़ कर वहीं नौकरी करूंगा और खूब पैसा कमाऊंगा। स्वामी जी ने हंसकर फिर पूछा, युवक स्वामी जी को मूर्ख समझ कर गुस्से से बोला, अच्छी नौकरी करुंगा , सुन्दर सी लड़की से शादी करूंगा। स्वामी जी ने फिर पूछा, युवक बोला फिर दो बच्चे होंगे, उन्हें उच्च शिक्षा दूंगा। स्वामी जी ने फिर पूछा, युवक अधिक गुस्से में बोला बच्चे भी पढऩे के लिए विदेश जायेंगे। और पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनेंगे, खूब पैसा कमाएंगे। फिर स्वामी जी ने पूछा आपका क्या होगा, युवक बोला, मेरा क्या मैं बूढ़ा हो जाउंगा और एक दिन मेरी मृत्यु हो जाएगी। स्वामी जी बोले सबकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए जीवन में एक चीज का ध्यान जरूर रखना अपनी मनुष्यता को पहचानो, जीवन का मोल क्या है। अगर हमने एक बार जन्म लिया है तो एक सही मनुष्य बनने का प्रयास करें। केवल उच्च आकांक्षा रखने से हमारा जीवन सार्थक नहीं बन सकता है।

हम अच्छा मनुष्य तब बन पाते है, जब हम हमारे अन्दर कुछ अच्छे गुणों को स्थान दे, जैसे प्रसन्नता, परोपकार, सहनशीलता, दया, सेवा, क्षमा, मधुर वचन बोलना, सबके साथ मिल-जुलकर रहना। मनुष्य बनने के लिए सबसे अधिक जिस गुण की आवश्यकता है वह है दूसरों को समझने की, जो व्यक्ति अपने सामने आने वाले हर व्यक्ति और परिस्थिती को समझ सकता है, वही सच्चा मनुष्य होता है। प्रत्येक मनुष्य के अंदर विवेक विद्यमान रहता है, आवश्यक्ता है तो केवल अपने विवेक को जाग्रृत करना।

विवेक होने से हम जीवन को समझने और जीने को सहज हो जाते है। देखा जाए तो हम दिनों-दिन अपनी बाहरी वेष-भूषा को मार्जित करके एक उन्नत मनुष्य के तरह दिखने का प्रयास करते हैं। लेकिन जितना हम अपने अन्दर को मार्जित बना पाएंगे उतना अधिक हम अपने आप को उन्नत बना सकते है। एक क्षीण व्यक्ति मनुष्य कहलाने का हक नहीं रखता। जब तक हम अपने ह्दय को विस्तृत नहीं कर पाएंगे, तब तक हम पूर्ण मनुष्य नहीं बन पाएंगे। एक विस्तृत ह्दयवान व्यक्ति सर्वप्रथम दूसरों के ह्दय को समझता है। क्योंकि केवल अपने लिए तो साधारण पशु भी सोचता है। आज के समाज में अगर कोई भी परिवत्र्तन की आवश्यकता है तो केवल यह कि हम अपने आपको कुछ सदगुणों का अधिकारी बना कर मनुष्य बनाएं।

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