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अपनी जड़ों से दूर हमारा कोई वजूद नहीं

अपनी जड़ों से दूर हमारा कोई वजूद नहीं

एक पेड़ तब तक ही फलता-फूलता है जब तक कि उसकी जड़े सुरक्षित रहती हैं। अगर पेड़ की जड़ ही काट दी जाये तो पेड़ को कितना भी खाद-पानी दिया जाये वह पनप नहीं सकता। यानी पेड़ का वजूद तब तक ही है जब तक कि उसकी जड़े सुरक्षित हैं। ठीक ऐसे ही तब तक इंसान का वजूद है जब तक वह अपनी जड़ों से यानी माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी अपने परिवार से जुड़ा है। लेकिन आज आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में युवाओं ने पश्चात्य संस्कृती का अनुसरण करना शुरू कर दिया है, वह एकल जीवन के आदी होते जा रहे हैं। अत: घर के बड़े बुजुर्ग के साथ रहना या किसी भी फैसले में उन्हें शामिल करना उनके लिये दकियानुसी हो गया है। लेखक हिमांशु कुमार चौहान ‘हरित’ की पुस्तक ‘बुजुर्ग: ढलती उम्र के अनेक रंग’ में समाज की इसी बुराई को इंगित किया गया है। लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से युवकों को ये संदेश देने की कोशिश की है कि बुजुर्गों से ही हमारी पहचान है। अगर हम इन्हें ही तवज्जो देना छोड़ देंगे तो हमारी अपनी भी कोई पहचान नहीं रह जायेगी। आधुनिकता की चकाचौंध में युवा खुद ही अपनी पहचान को मिटाने पर आमदा हो गये हैं। वक्त के साथ-साथ दो पीढिय़ों के बीच बढ़ते इस फासले की कई वजह गिनाई जा सकती हैं पाश्चात्य संस्कृति का अंधाधुंध अनुसरण, तेज रफ्तार जिंदगी जहां रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचा, संस्कारों का अभाव, वगैरह-वगैरह। आज बुर्जुग वर्ग और युवा पीढी़ के बीच लगातार फासले बढ़ते जा रहे हैं। पुस्तक में लेखक कहते हैं कि फासलों को तभी कम किया जा सकता है जब दोनों पीढिय़ों के बीच संवाद ठीक से स्थापित हो सके।

17-07-2016बुजुर्ग: ढलती उम्र के अनेक रंग

लेखक : हिमांशु कुमार चौहान ‘हरित’

प्रकाशक : अनुराधा प्रकाशन

मूल्य        : 125 रु.

पृष्ठ    : 72

पुराने जमाने में जहां बुजुर्ग घर व समाज में मार्गदर्शक, संरक्षक और घर के मुखिया की भूमिका निभाते थे, आज वही बुजुर्ग अपने बच्चों की अनदेखी का शिकार होकर, दर्द में जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। यहां तक कि उनके लिये घर में जगह नहीं है उन्हें वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। हमारे युवाओं के लिये यह मुद्दा बहुत ही गंभीर है कि जो मां-बाप हमें जन्म देते हैं, पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, समाज में लायक बनाते हैं, उन्हीं मां-बाप को हम ऐसे वक्त में अकेला छोड़ देते हैं जब उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे वक्त में हम उन्हें दर-बदर की ठोकरें खाने के लिये छोड़ देते हैं।

इस पुस्तक में कुल दस कहानियां है। प्रत्येक कहानी में युवा और बुजुर्गों के बीच के बढ़ते फासलों को दर्शाया  गया है। कहानी ‘सात रूपये की चाय’ में एक बुढ़ा व्यक्ति कड़ाके की ठंड में फटे कुर्तो में चाय की ठेली लागने के लिये मजबूर है, क्योंकि उसे कैसे भी अपना और अपनी पत्नी का पेट पालना है। पूरी जिंदगी कमा कर जिन बच्चों को लायक बनाया उनके पास अब अपने मां-बाप के लिये वक्त नहीं है। तो वहीं दूसरी काहानी ‘मावे के लड्डू’ एक ऐसी बूढ़ी औरत की कहानी है जिसने फटी-पुरानी साड़ी और नंगे पांव रह कर पूरी जिंदगी गुजार दी सिर्फ अपने बेटे को काबिल बनाने के लिये और एक दिन उसका बेटा एक प्रसिद्ध एक्टर बन जाता है। लेकिन अब उसे अपनी मां को अपने साथ रखनेे में शर्म आती है। वह भरे समाज में अपनी मां को यह कर फटकारता है कि शूटिंग के दौरान यहां मुझसे मिलने क्यों आई हो? लोग इस तरह फटे-पुराने कपड़ों में नंगे पांव देखेंगे तो क्या सोचेंगे मेरे बारे में, यह सुनकर मां की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। और आखिरकार उसने वहीं नदी में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस पुस्तक की सभी कहानियां बच्चों और युवाओं के लिये बेहत प्रेरणादायक हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य दो पीढिय़ों के बीच संवाद की संभावनायें तलाशना है, ताकि देश में दो पीढिय़ों के बीच बढ़ते फासले को कम किया जा सके।

 प्रीति ठाकुर

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