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पित्तज विकार, अतिसार, उदर विकार में लाभकारी व ग्रीष्म शामक सुयोग नींबू

पित्तज विकार, अतिसार, उदर विकार में लाभकारी व ग्रीष्म शामक सुयोग नींबू

नींबू से सब परिचित हैं, नींबू का अचार, नींबू की चटनी लोग बड़े चाब से खाते हैं। जबकि, गर्मियों में लोग नींबू के शर्बत का भी प्रयोग करते हैं। यह विटामिन ‘सी’ का मुख्य स्रोत है अत: इसमें स्कर्वी निवारक गुण पाया जाता है, नींबू अम्लीय होने पर भी पित्तशमक है। यद्यपि नींबू की कई प्रजातियां पाई जाती हैं, जैसे- कागजी नींबू, बिजौरी नींबू, जम्मीरी नींबू, मीठा नींबू इत्यादि, पर औषधिय व्यवहार में अक्सर कागजी नींबू का ही प्रयोग करना चाहिए। नींबू भारत में मुख्यत: हिमालय के उष्ण भागों में, उत्तराखंड से सिक्किम, खसिया पहाड़ी क्षेत्रों, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु में विशेषत: पाया जाता है।

नींबू के पत्र पर्णिल अथवा पर्णक सदृश, चर्मिल, चमकीले हरे रंग के, नुकीले होते हैं। पत्तियों को मसलने पर सुगंध आती है। इसके पुष्प छोटे, श्वेत, अथवा गुलाबी वर्ण के सुगन्धित होते हैं। फल गोलाकार से अंडाकार, दीर्घायत, हरित वर्णों एवं पीत वर्णी बिंदुकित, चिकने तथा बीज संख्या में अनेक, पीताभ- श्वेत वर्ण के, चिकने होते हैं। इसका पुष्पकाल अप्रैल से मई तक तथा फलकाल मई से जून तक होता है।

रासायनिक संघटन

नींबू के फल में सिट्रिक अम्ल, एस्कॉर्बिक अम्ल, फ्रंक्टोस, ग्लूकोस, स्युक्रोस, पेक्टिन्स, वाई-एमिनोब्युट्रीक अम्ल, जेसमोनीक अम्ल एवं मिथाईल एस्टर, अरियोडिक्टीयॉल, हेसपेरीटिन एवं नारिंगीनी के 7- रूटिनोसाईड पाए जाते हैं।

इसके तेल में डी- लीमोनीन, ए- टर्पीनीओल, टर्पीनीन-4-ऑल, मिरसीन, केम्फीन, लीमोनीन, लीनालून, नेरॉल, ऑसिमीन, आईसोपुलेगॉल, सोरालेन एव बर्गामोटिन पाया जाता है। इसके मूल में जेन्थीलेटिन होता है व पत्र में वर्गापटने, सिट्रोप्टेन, एरिओसिट्रिन, आईसोपिम्पीनेलीन लीमोटिन, डिऑसीराईबोन्युक्लीन अम्ल एवं स्टार्च पाया जाता है। इसके बीज में 6,7- डाईमिथॉक्सीमेरिन एवं टेंगेरेटिन पाये जाते हैं।

नींबू के औषधीय प्रयोग

शिरो रोग

केश विकार- नींबू के रस में आंवला के फलों को पीसकर बालों में लगाने से रूसी मिटती है व बालों का झडऩा रूकता है।

नेत्र रोग-

नींबू के रस को लोहे की खरल में लोहे के दस्ते से घोंटे, इसका रस जब काला पड़ जाये, तब नेत्रों के आसपास पतला लेप करने से नेत्र शूल का शमन होता है।

मुख रोग

छाले- जीभ पर उत्पन्न छालों व मसूढ़ों पर नींबू का छिलका रगडऩे व 20-30 मिली नींबू रस नियमित पीने से शीघ्र लाभ होता है।

उदर रोग

  • उदरशूल- 1-2 ग्राम कच्चे नींबू के छिलके को पीसकर खाने से उदर शूल का शमन होता है।
  • वमन- भोजन के बाद होने वाले वनम को रोकने के लिए 5-10 मिली ताजे नींबू के रस को पीना चाहिए।
  • मंदाग्नि- एक नींबू के रस में थोड़ी अदरक, काला नमक मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण, मंदाग्नि तथा आमवात का शमन होता है।
  • अजीर्ण व उदरशूल- 3 मिली नींबू का रस, 10 मिली चूने का पानी तथा मधु तीनों को मिलाकर 20-20 बूंद की मात्रा में लेने से अजीर्ण व उदर शूल का शमन होता है।
  • अरूचि- नींबू के शर्बत में दोगुना पानी, 1-2 नग लौंग, काली मिर्च मिलाकर पीने से अथवा नींबू को काटकर काला नमक बुरका कर चाटने से भी अरूचि शमन होती है।
  • 5-10 मिली नींबू के रस का सेवन करने से जाठराग्नि दीप्त होती है।

कृमिरोग– नींबू के रस का सेवन करने से आंतों के अंदर टायफायड, अतिसार, हैजा इत्यादि पैदा होने वाले कीटाणु मर जाते हैं।

विसूचिका– भोजन से पूर्व प्रतिदिन दो नींबू के रस का सेवन करने या नींबू रस में मिश्री मिलाकर सेवन करने से विसूचिक में लाभ होता है।

पित्तज विकार– एक नींबू के रस में 5 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करने से पित्तज विकारों का शमन होता है।

अतिसार– 30 मिली कागजी नींबू के रस को दिन में 2-3 बार सेवन करने से अतिसार में लाभ मिलता है।

उदर विकार– 5 मिली नींबू के रस में मधू मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण, अम्लपित्त, पित्तज छर्दि तथा अत्यधिक लालास्त्राव में लाभ होता है।

  • नींबू फल स्वरस में समभाग पलाण्डु स्वरस तथा 1 ग्राम कपूर मिलाकर सेवन करने से विसूचिका, प्रवाहिका तथा आहार जन्य विषाक्तता में लाभ मिलता है।
  • पत्र स्वरस में मधु मिलाकर प्रयोग करने से उदर कृमियों का नि:सारण होता है।

वृक्कवास्तिरोग

  • मूत्राशय शोथ- नींबू फल के स्वरस को उबले हुये जल में मिलाकर सेवन करने से मूत्राशय शोथ, वृक्कवस्तिगत दाह एवं रक्तस्राव में लाभ होता है।
  • वृक्क विकार- नींबू फल के स्वरस में नारिकेलोदक मिलाकर सेवन करने से अल्पमूत्रता, वृक्कशोथ, बस्तिशोथ, उच्च रक्तचाप तथा गर्भावस्था जन्य विषाक्ता में लाभ होता है।
  • अल्पमूत्रता- नींबू फल स्वरस में खीरे का स्वरस अथवा नारिकेलोदक अथवा गाजर स्वरस मिलाकर सेवन करने से शोथ एवं अल्पमूत्रता में लाभ मिलता है।

17-07-2016

यकृत्प्लीहा रोग

  • कालमा- नींबू रस को नेत्र में लगाने से कालमा में लाभ होता है।
  • यकृत विकार- गुनगुने पानी में नींबू का रस व मिश्री मिलाकर सुबह चाय की तरह पीने से यकृत की क्रिया सुचारू रूप से होती है।
  • 5-10 मिली नींबू रस में भुनी हुई 500 मिग्रा अजवायन व सेंधा नमक स्वादानुसार मिलाकर सेवन करने से यकृत और प्लीहा के रोगों में लाभ होता है।
  • प्लीहावृद्धि- नींबू का अचार खाने से प्लीहा वृद्धि में लाभ होता है।

अस्थिसंधि रोग

  • आमवात- 1-2 मिली नींबू स्वरस को 4-4 घंटे के अंतर पर सेवन करने से आमवात में लाभ मिलता है।

त्वचा रोग

  • चर्मरोग- दाद, खाज, चमड़ी पर काले दाग इत्यादि रोगों पर नींबू को काटकर रगडऩे से लाभ होता है ।
  • खाज- नींबू के रस में करौंदे की जड़ को पीसकर लगाने से खाज में तुरंत लाभ मिलता है।
  • त्वक विकार- फल स्वरस का प्रतिदिन प्रयोग करने से त्वक शुष्कता तथा त्वक विवर्णता में लाभ होता है।
  • नींबू फल स्वरस को एक गिलास उबले दूध में डालकर गिल्सरीन मिलाकर, आधे घंटे तक रख दें, उसे शरीर पर लगाने से हस्तपाद स्फुटन, पीडिका, त्वक शुष्कता आदि त्वक विकारों में लाभ होता है।
  • कील मुहांसे- नींबू के रस को चेहरे पर मलने से कील-मुहासे ठीक होते हैं।
  • नींबू, तुलसी और काली कांसौदी का रस बराबर मिलाकर धूप में रखें, जब वह गाढ़ा हो जाये तो मुंह पर मलें, यह मुहांसों को दूर करता है।
  • चेहरे की झुर्रियों को मिटाने के लिए नींबू के रस में शहद मिलाकर चेहरे पर लगायें।

मानस रोग

  • उन्माद- नींबू के रस को मस्तक पर लेप करने से उन्माद में लाभ मिलता है।

सर्वशरीर रोग

  • मोटापा- सुबह-सुबह खाली पेट 200 मिली गुनगुने जल में 2 चम्मच नींबू व 1 चम्मच शहद डालकर पीने से मोटापा घटता है।
  • ज्वर- नींबू के दो भाग करें, एक भाग में पिसी हुई काली मिर्च और सेंधा नमक भरें तथा दूसरे भाग में मिश्री भरकर दोनों को गर्म कर चूसने से वर्षा ऋतु के बाद होने वाले आन्त्रज्वर में लाभ होता है।
  • मौसमी बुखार- 25 मिली नींबू रस, 25 मिली चिरायते का काढ़ा, दोनों को मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पीने से मौसमी बुखार ठीक हो जाता है।
  • स्थौल्य- 5-10 मिली फल स्वरस में पुराना मधु एवं शीतल जल मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाली पेट प्रयोग करने से स्थौल्य का शमन होता है।

17-07-2016

विष चिकित्सा-

  • कीटदंश- मच्छर आदि विषैले कीटों के दंश पर नींबू का रस लगाना चाहिए।
  • बिच्छू का विष- नींबू के बीजों की मीगी 9 ग्राम तथा सेंधा नमक 8 ग्राम, दोनों को पीसकर मिलाकर सेवन करने से वृश्चिकदंशजन्य विषक्त प्रभावों का शमन होता है।
  • जमालगोटा जन्य विषक्तता-
  • नींबू फल स्वरस में जल मिलाकर प्रयोग करने से जमालगोटा जन्य विषाक्त प्रभावों का उपशमन होता है।
  • सज्जीक्षार, यवक्षार तथा काले नमक को नींबू रस के साथ घोंटकर बर्रे के डंक पर लगाने से दंशजन्य विषक्त प्रभावों का शमन होता है।
  • नींबू को लेकर पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का यह एक स्वानुभूत प्रयोग भी हजारों लोगों के लिए वरदान बन चुका है। पूज्यवर के अनुसार 1 कप गर्म दूध में आधा नींबू निचोड़ कर दूध फटने से तुरंत पहले पी जायें। यह रक्तस्राव को तुरन्त बंद कर देता है। उक्त प्रयोग को एक या दो बार से अधिक न करें।
  • वर्तमान ग्रीष्म ऋतु में तो हर किसी के लिए रामबाण है नींबू। वैसे भी औषधि एवं आहार दोनों रूपों में प्रयुक्त होने वाले नींबू को हर मौसम में घर-परिवार में स्थान देकर स्वजन अनेक प्रकार के रोगों से स्वयं को व अपने परिवार के लोगों बचा सकते हैं।

साभार: योग संदेश

 

आचार्य बालकृष्ण

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