ब्रेकिंग न्यूज़ 

राजस्थान: कुर्सी के सफर के लिये जद्दोजहद

राजस्थान: कुर्सी के सफर के लिये जद्दोजहद

सत्ता की कुर्सी के लिये अभी लगभग ढाई साल का सफर शेष है। इसके बावजूद राजस्थान में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी लगातार दूसरी पारी खेलने की फिराक में है तो विधानसभा में प्रतिपक्ष की जाती हुई कुर्सी को बचा सकी कांग्रेस धर्नुधारी अर्जन की मानिंद सत्ता के लक्ष्य पर निशाना साधने की होड़ में जुट गई है। बदकिस्मती यह है कि मुख्यमत्री वसुंधरा राजे को जहां आम जनता में शासन प्रशासन की छवि बनाये रखने के साथ सरकार एवं पार्टी संगठन में बेहतर तालमेल की चादर में होने वाले छिद्रों को रोकने की कवायद में अपनी ताकत लगानी पड़ रही है। वहीं प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व को भी संगठन के हर स्तर पर व्याप्त आपसी कलह तथा गुटबाजी और कांग्रेसजनों के बड़े तबके की सड़कों पर आकर संघर्ष नहीं करने की मानसिकता से जूझना पड़ रहा है। ऐसे माहौल में ”सौ सुनार की एक लुहार की’’ तर्ज पर आजादी के बाद पहली बार अनुसूचित जनजाति के वरिष्ठ आई.ए.एस. ओम प्रकाश मीणा को मुख्यसचिव पद पर बिठाकर मुख्यमंत्री ने अपने दूरदर्षी निर्णय से एक तीर से कई निशाने साध लिये है।

सियासी एवं प्रशासनिक समीकरण के चलते सोशल इंजीनियरिंग के पैमाने पर वसुंधरा राजे का यह फैसला कितना सटीक सिद्ध होगा इसके लिये तो लम्बा इंतजार बाकी है लेकिन राज्य के प्रशासनिक तंत्र में दो बार के विस्तार के बाद मुख्य सचिव सी.एस. राजन का कार्यकाल 30 जून 2016 को समाप्त होने पर सवाईमाधोपुर जिले के अत्यंत प्रभावी मीणा परिवार के सदस्य ओम प्रकाश मीणा को शासन का मुखिया बनाना अप्रत्याषित एवं दूरदर्षिता का परिचायक माना गया है। ओ.पी. मीणा के अग्रज हरीशचंद मीणा राज्य के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्ति के बाद अभी दौसा से भाजपा सांसद है तो नमोनारायण मीणा कांग्रेस शासन में केन्द्रीय मंत्री रहे है। अन्य भाई भी बड़े पदो पर रहे है। जून 1957 में  जन्में और 1979 बैच के आई. ए. एस. ओ.पी. मीणा कैट चेयरमैन नीलिमा जौहरी के बाद वरिष्ठतम नौकरशाह है जिन्हें लगभग साढे चार माह पूर्व ही शासन सचिवालय से बाहर का रास्ता दिखाते हुये राजस्थान आवासन मण्डल का अध्यक्ष एवं आयुक्त बनाया गया था।

17-07-2016आयुक्त के पद को अपने से जूनियर अधिकारी का पद मानकर मीणा ने कई दिनों तक इस पद पर कार्यभार नहीं सभाला था अब इस पद पर ए. मुखोपाध्याय को लगाया गया है जो गृह विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद पर आसीन थे और मुख्य सचिव पद की दौड़ में अतिरिक्त मुख्य सचिव यूडीएच, अशोक जैन के साथ प्रतिस्पर्धा में थे। लेकिन सोन चिडिय़ा मीणा के माथे पर बैठी। उधर राजन को मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद का पूर्णकालिक उपाध्यक्ष बनाकर वसुंधरा राजे ने अपने साथ समन्वय बनाये रखने की जिम्मेदारी देकर उन पर भरोसा जताया है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की फ्लेगशिप योजनाओं की समीक्षा, मॉनिटरिंग तथा सुपरविजन करने वाले राजन बराबर पावरफुल बने रहेंगे। मुख्य सचिव के पदस्थापन के साथ आई.ए.एस. अधिकारियों को इधर उधर किया जाना स्वाभाविक था। लेकिन इसके साथ ही भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.) के अधिकारियों की तबादला सूची ने स्वयं सरकार को कठघरे में ला खड़ा किया। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की शक्तिशाली टीम को तोडऩे से सवाल दर सवाल खडे हो रहे है।

सालभर में तीन आई.ए.एस सहित आर.ए.एस. एवं अन्य प्रमुख अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल की सलाखों में डालने वाले महानिरीक्षक दिनेश एम.एन. तथा अतिरिक्त महानिदेशक भूपेन्द्र दक को हटाने के पीछे आई.ए.एस लॉबी का दबाव माना जा रहा है। पुलिस की गिरफ्त से दस माह पूर्व फरार हुये गैंगस्टर आंनदपाल सिंह को पकडऩे के लिए दिनेश को एस.ओ.जी. का आई.जी. बनाने की दलील दी गई है। बहरहाल इन तबादलों के सियासी मायने किसी से छिपे नहीं है। चर्चा यह भी है ए.सी.बी. दो बड़े नौकरशाहों की नकेल कसने की तैयारी में थी इससे पहले ही पुलिस अफसरों का बधियाकरण हो गया।

गजब यह भी है कि नवनियुक्त मुख्य सचिव पारिवारिक मामलों को लेकर विवादों में रहे है। उनकी आर.ए.एस पत्नी गीता सिंह ने 2015 में जयपुर के महिला थाना पश्चिम में दहेज उत्पीडऩ का मामला दर्ज कराया हुआ है तथा उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार अनुसंधान जारी है जबकि राज्य महिला आयोग में की गई शिकायत का निस्तारण हो चुका है। उनकी पुत्री ने भी अपने पिता पर मुकदमा दर्ज कराया हुआ है। इसके बावजूद सब प्रयासों को दरकिनार करते हुए वसुंधरा राजे ने ओ.पी. मीणा की तैनाती से सभी को हतप्रभ कर दिया है। बहुत बड़ी संख्या में राज्य विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों में मीणा समुदाय के मतदाताओं की बहुलता को देखते हुए कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल भी इस नियुक्ति का विरोध करने की स्थिति में नहीं है। इस कदम से वसुंधरा ने भाजपा के बागी डा. किरोड़ी लाल मीणा के अपने समुदाय के वोट बैंक के समीकरण को भी गड़बड़ा दिया है।

यह समझा जाता है कि अनुसूचित  जनजाति के अधिकारी की मुख्य सचिव पद पर नियुक्ति के निर्णय के पीछे वरिष्ठ आई.ए.एस. उमराव सालोदिया द्वारा राज्य सरकार पर दलित वर्ग के अधिकारियों की अनदेखी के आरोप, धर्म परिवर्तन की घोषणा के साथ स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के प्रकरण को जोड़ा गया है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अनुसूचित जनजाति के वरिष्ठ अधिकारी को मुख्य सचिव बनाकर बड़ी लकीर खीची है तो विधानसभा के आगामी चुनाव में मीणा समुदाय के वोटबैंक के गणित को भी ध्यान में रखा है। इसी गणित के मद्देनजर उन्होंने पहली बार राज्य विधानसभा के अध्यक्ष पद पर अनुसूचित जाति के कद्दावर नेता कैलाशचन्द्र मेघवाल को सर्वसम्मति से आसीन करवाया तो डा. ललित के. पवार को राजस्थान राज्य लोकसेवा आयोग का चेयरमैन बनाया। डा. पंवार पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पहले कार्यकाल में उनके सचिव थे। राज्यसभा में दलित वर्ग के राजकुमार वर्मा को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाकर जिताया। पूर्व आई.ए.एस. आर के मीणा को राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था। केन्द्र में मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाओं के बीच राजस्थान में भी नये मंत्रियों की नियुक्ति तथा मंत्रियों के विभागों में फेरबदल की सम्भावनाओं को भी मुख्यमंत्री की सोशल इंजीनियरिंग की कवायद के रूप में देखा जायेगा।

संगठनात्मक दृष्टि से सत्तारूढ़ भाजपा की स्थिति को संतोषप्रद नहीं माना जा रहा। प्रदेशाध्यक्ष पद पर दूसरी बार आसीन हुए विधायक अशोक परनामी अभी तक प्रदेश कार्यसमिति का गठन नहीं कर पाये है। राजधानी की जयपुर इकाई का भी यही हाल है। विपक्ष द्वारा सरकार पर लगने वाले हर आरोप का जबाव देने के लिए प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी को मशक्कत करनी पड़ती है। भाजपा की हर बैठक में सरकार की योजनाओं की जानकारी तथा उपलब्धियों से जनता के सभी वर्गों को अवगत कराने पर बल दिया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत का यह आलम है कि जयपुर में 23 जून को प्रदेश कार्यसमिति के नाम पर बुलाई गई वृहद बैठक में मुख्यमंत्री के पूछने पर कोई भी जिलाध्यक्ष राज्य सरकार की पांच फ्लैगशिप योजनाओं का उल्लेख नहीं कर पाया।

खुद मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। आठ मंत्रियों ने भी प्रजेंटेशन दिया। अलबत्ता यह दावा जरूर किया गया कि विधानसभा चुनाव के दौरान घोषित सुराज संकल्प पत्र की 667 घोषणाओं में से 479 याने लगभग 72 फीसदी क्रियान्वित की जा चुकी है। भाजपा के प्रदेश कार्यालय में मंत्रियों तथा संगठन पदाधिकारियों द्वारा पार्टी कार्यकत्र्ताओं की जन सुनवाई का मामला हो अथवा मंत्री समूहों या विधायकों के समूह द्वारा फील्ड में जाकर कार्यकत्र्ताओं से फीड-बैक लेने का मामला हो तब सरकार के काम-काज, पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी तथा आपसी शिकवा शिकायतें हावी रहती है। बूथ लेवल पर कार्यकारिणी को लेकर मंडल अध्यक्ष तथा जिला अध्यक्ष के बीच तालमेल के अभाव पर परनामी को ऐसे मंडल अध्यक्षों को तीसरे नोटिस पर बर्खास्त करने की चेतावनी देनी पड़ी।

राज्यसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के प्रभारी ओम माथुर को प्रदेश नेतृत्व की ना-नुकर के बावजूद पार्टी हाई कमान के निर्देषों के अनुसार पुन: राज्यसभा में भेजा गया। माथुर के निर्वाचित होने के साथ प्रदेश में सत्ता का दूसरा केन्द्र होने की चर्चा चल पड़ी है। पिछली बार विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद तत्कालीन प्रदेश पार्टी अध्यक्ष ओम माथुर ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया था।

उधर विभिन्न विभागों के मंत्रियों तथा आला अफसरों के बीच समुचित तालमेल के अभाव से फैसले लेने से लेकर उन्हे लागू करने में पग-पग पर बाधायें खड़ी हो रही है। ऐसे अनेक मामले सार्वजनिक हो चुके है। नौकरशाही के आगे विवश मंत्रीगण पार्टी कार्यकत्र्ताओं की इस शिकायत का संतोषजनक जबाव नहीं दे पाते कि जिलों में अधिकारी उनकी नहीं सुनते। सत्ता में पर्याप्त भागीदारी की गरज से पार्टी के जिलाध्यक्षों को जिले में बीस सूत्री कार्यक्रम समिति का उपाध्यक्ष बनाने की बहस को कोहनी में गुड़ लगाने का प्रयास माना जा रहा है।

राज्य सरकार के दो साल के जश्न पर अपनी पीठ थपथपाने पर कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई थी। अब भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में सुराज संकल्प पत्र की घोषणाओं की 72 प्रतिशत क्रियान्विति के दावे की पोल खोलने की रणनीति पर कांग्रेस ने कवायद शुरू कर दी है। लेकिन अब तक बयानबाजी और मीडिया में सुर्खिया लेने के प्रयास अधिक रहे है। प्रदेश के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव गुरूदास कामत के पहले राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा पर हुई प्रतिक्रिया से पार्टी की खेमेबाजी उजागर हुई। कामत अब ‘हाथ’ थामने के लिए वापस लौट आये है। कांग्रेस को सत्ता पर आसीन कराने के मंसूबे से वह गुजरात की तर्ज पर राजस्थान में भी करीब सालभर पहले संभावित प्रत्याशियों की घोषणा का फार्मूला अपनाने का विचार कर रहे है। आपसी गुटबाजी में फंसी कांग्रेस कुर्सी के सफर के लिए क्या मशक्कत करती है, इसका इंतजार रहेगा।

जयपुर से गुलाब बत्रा

александр лобановский харьков классMedia I

Leave a Reply

Your email address will not be published.