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कौन बनायेगा उत्तर प्रदेश में लड़ाई का तीसरा कोण?

कौन बनायेगा उत्तर प्रदेश में लड़ाई का तीसरा कोण?

उत्तर प्रदेश में 2011 की चुनावी जंग का शंखनाद हो चुका है। सभी राजनीतिक दल चुनावी बिसात पर अपने मोहरे सजाने लगे हैं। प्रमुख दल सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस चुनाव के लिहाज से नये दोस्त बनाने में लग गये हैं। जैसा कि कहते हैं- मुहब्बत और जंग में सब कुछ जायज होता है। वैसे ही दोस्त और दुश्मन बनने-बनाने में अपने हित-लाभ देखे जा रहे हैं। नैतिकता और राजनैतिक शुचिता सिर्फ, किताबों में बंद कर भविष्य में चर्चाओं के लिए रख दी गईं हैं। इस जंग की शुरूआत से पहले सर्वाधिक आहत बसपा दिख रही है, जिसके दो महारथी- महासचिव और नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और पूर्व दिग्गज आर. के. चौधरी ने एक ही सप्ताह के भीतर मायावती पर ऐसे इल्जाम लगाते हुए पार्टी छोड़ दी जैसे अभी तक विरोधी दलों के लोग ही लगाते थे। लिहाजा बहन जी सपा और भाजपा के आरोपों का जवाब दें या स्वामी प्रसाद के ताजा हमलों  से खुद को बचायें, समझ नहीं पा रही हैं।

स्वामी प्रसाद मायावती के करीबी लोगों में से रहे हैं। वे बसपा के महासचिव और विधान मण्डल में नेता प्रतिपक्ष थे। उन्हें बसपा में पिछड़े वर्ग का नुमाइंदा समझा जाता था। खासकर अपने समाज (कुशवाहा) को बसपा से जोड़े रखने की जिम्मेदारी, बाबू कुशवाहा के हटने के बाद वे ही निंभा  रहे थे।  हालांकि  उनका कहना है कि, ‘बहन जी बसपा की तानाशाह हैं। उनके रहते पार्टी में काई और नेता का सवाल ही नहीं पैदा होता। खासकर पिछड़े और दलित समाज के लोगों को तो वे नौकर (सेवक) समझती हैं’ स्वामी प्रसाद ने पार्टी छोडऩे के कारणों में प्रमुख कारण पार्टी के चरित्र में आमूल-चूल बदलाव बताया। उनका कहना कि पार्टी अब अम्बेडकर और कांशीराम के दर्शन – 85 प्रतिशत के हक की लड़ाई- को भूल गयी है और अब मायावती ‘दलित के लिए नही, दौलत के लिए’ लड़ रही हैं।

जाहिर है कि मायावती के विरोधी ही अभी तक उन पर यह आरोप चस्पा करते थे। मौर्य के इन आरोपों पर बसपा के फाउंडर मेम्बर और कांशीराम के सहयोगी रह चुके एम. एल. सी. (पूर्व) शिवबोध राम कहते हैं- ‘ये लोग राजनीतिक महत्वकांक्षा के चलते बसपा में आये। सामाजिक संघर्ष इनके बूते की बात नही। जब कि हम (बसपा) दलित पिछड़ों के हक की लड़ाई लड़ते आये हैं। इनको जहां थोड़ा प्रलोभन मिला नहीं कि अनर्गल बातें करते हुए भाग खड़े होते हैं।’ हालंाकि बसपा के मूल चरित्र में आये बदलाव की बात बसपा के पुराने कैडर और कांशीराम के सहयोगी रह चुके लोग भी कहते हैं। वे मानते हैं कि ‘कांशीराम सामाजिक बदलाव के लिए लोगों को एकजुट कर रहे थे लेकिन मायावती ने तो हद ही कर दी है। उनके मुताबिक अब बसपा में न संघर्ष की इच्छा शक्ति रही न दम। सिद्धांत से तो वे पहले ही भटक गयी थीं जब बाह्यणों को साथ लेकर चलीं। जिन ब्राह्यणों ने उन्हें सिंहासन पर बिठाया उन्होंने ही अब उन्हे सिंहासन से इतनी दूर खड़ा कर दिया कि खुद उनके लोग ही उनसे दूर होते जा रहे हैं। ये कहना है बसपा के पूर्व मंत्री और अब सपा के नेता श्रीराम यादव का। वे कहते हैं कि मायावती से दुखी होकर बसपा छोडऩे वालो में लम्बी सूची तो दलितों की है। राज बहादुर, जोखू राम, शाकिर अली, बलिहारी बाबू, बी. राम, दीनानाथ भास्कर वगैरह दो दर्जन नाम हैं। पिछड़ों में सोनेलाल पटेल, राम लखन वर्मा, अब स्वामी प्रसाद मौर्य आदि। सवर्णों को गले लगाने वाली बहन जी उनकी ही राजनीति की शिकार हो गयीं।


सतीश मिश्रा बसपा में ‘सुपरमैन’ हैं- स्वामी प्रसाद


17-07-2016

”2012 के विधानसभा चुनाव में टिकटों का बंटवारा बहन जी ने कुछ लोगों से पैसे लेकर कर किया। रिजल्ट गड़बड़ आना ही था। लेकिन उन्होंने इससे नसीहत नहीं ली। उल्टे पैसे की उनकी हवस बढ़ गयी। जहां पहले रेट 50 लाख था, बाद में लोकसभा चुनाव के समय एक करोड़ हो गया। दलित उम्मीदवारों से भी पैसे लेकर टिकट देने लगीं,’’ ऐसे कहना है स्वामी प्रसाद मौर्य का, जिनसे बातचीत की सियाराम यादव ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:-

 

आपने अचानक बसपा क्यों छोड़ दी?

छोडऩे की घोषण अचानक की। मन के भीतर मंथन काफी दिनों से चल रहा था। मायावती के साथ मतभेद 2012 से था। जब पिछले विधानसभा चुनाव में टिकटों का बंटवारा कर रही थीं।

आपको तो वे काफी मानती थीं। पार्टी में महासचिव का पद दिया था। नेता प्रतिपक्ष भी बनाया था।

बसपा में मायावती जी की तनाशाही चलती है। बाकी सब नाम के हैं। उनके बाद सतीश जी (राज्य सभा सदस्य सतीश मिश्रा) जो चाहते हैं, वह होता है। इसके अलावा किसी की कोई औकात नहीं।

आप इतने दिनों बिना औकात के क्यो पड़े रहे?

कहा न, 2012 के विधानसभा चुनाव में टिकटों का बंटवारा बहन जी ने कुछ लोगों से पैसे लेकर किया। रिजल्ट गड़बड़ आना ही था।  लेकिन उन्होंने इससे नसीहत नहीं ली। उल्टे पैसे की उनकी हवस बढ़ गयी। जहां पहले रेट 50 लाख था, बाद में लोकसभा चुनाव के समय एक करोड़ हो गया। दलित उम्मीदवारों से भी पैसे लेकर टिकट देने लगीं।

आपसे पैसे मांगे थे?

मांग कई तरह से होती है। किसी और से पैसे लेकर मेरा टिकट काट दिया।

आप का टिकट काटकर वे क्या संदेश देना चाहती थीं?

पहला तो यह कि मैं अपनी औकात समझ लूं। दूसरी बात यह कि वे जो कहें उसे ही आंख मूंद कर स्वीकार करूं। तीसरी बात यह कि पिछड़े, दलित समाज की रहनुमाई के बारे में सोचंू भी न, उनके किसी कार्यक्रम में न जाऊं।

ऐसा कभी कहा उन्होंने आपसे?

हां, हां। अम्बेडकर जयंती के ठीक बाद 16 अप्रैल, 2016 को पार्टी की बैठक हुई। मायावती ने मुझसे कहा कि बहुजन समाज पिछड़े वर्गों, शोषित समाज के किसी कार्यक्रम में अध्यक्षता करने या किसी भी रूप में मैं शामिल ना होऊं। बाबा साहब की जयंती या अनुसूचित जाति, जनजाति के किसी आयोजन, सम्मेलन में मुझे जाने से रोक दिया।

आपने कभी इसका कारण नहीं पूछा?

मैंने कहा न, वहां उनका आदेश ही चलता है। फिलहाल, इलाहाबाद में एक कार्यक्रम था अम्बेडकर जयंती के सिलसिलें में। मैंने कहा कि मैंने कार्यक्रम में जाने के लिये हां कह दी है क्या करूं? वह बोलीं-चले जाइये, लेकिन आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए।

फिर आगे क्या हुआ?

मैं समझ गया उनका संदेश क्या था। फिर तो मेरे लिए अपना रास्ता चुनने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

पिछले चुनाव में उन्होने आपके बेटा-बेटी दोनों को टिकट दिया।

हां, मेरे मना करने के बाद भी। मैंने कहा कि मेरी बेटी मेडिकल की स्टूडेंट है। वह चीन गयी है। बेटा भी राजनीति में जाने को उत्सुक नहीं है। फिर मैं खुद भी परिवारवाद का विरोधी हूं। इसलिए मेरी बेटी-बेटे को टिकट मत दीजिए। लेकिन उन्होंने कहा- पार्टी की अध्यक्ष मैं हूं या तुम? मैं चुप रह गया?

आपके परिवार के सिवा पार्टी के किसी दूसरे नेता के परिवार के सदस्यों को भी टिकट दिया है?

हां, हां दिया। आगामी विधानसभा चुनाव में भी कई लोगों के लिए घोषणा कर चुकी हैं। सतीश मिश्रा जी के परिवार में 12-14 लाल बत्तियां हैं। वे पार्टी में ‘सुपरमैन है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी, उनका बेटा भी (बेटा हार गया) टिकट पा चुका हैं। रामवीर उपाध्याय के दो भाई विधानसभा पहुंच चुके हैं। देखिये, केवल दलित वोटों के बल पर व्यापक समाज का नेतृत्व कर पाना संभव नहीं हो सकता। इसलिए मायावती सर्वसमाज का नेतृत्व तभी कर पायीं जब ब्राह्यण, ठाकुर, कोइरी, कुर्मी सबको जोड़ा, तभी। इसलिए उनकी रणनीति शायद यही हो कि सबको अपने साथ जोड़ो। लेकिन, जिस दलित व पिछड़े समाज के बल पर वे निष्कंटक राज कर सकीं उन्हें प्रताडि़त करके वे किसको आगे बढ़ाना चाहती हैं?

आगे की रणनीत क्या है? भाजपा से जुड़ेंगे या सपा से या खुद की पाटीं बनायेंगे?

विचार मंथन चल रहा है। आगामी 22 सितंबर को रमाबाई मैदान में सम्मेलन आयोजित होगा। उसमें ही कुछ निर्णय लिया जायेगा। तब तक इंतजार कीजिए।

आप सपा के खिलाफ अभियान चला रहे थे। भाजपा और संघ को कोस रहे थे। इनमें से किसी के साथ जाना पड़ा तो कैसा लगेगा?

अभी तक विपक्ष की भूमिका थी, उसे निभा रहा था। अब जो नयी भूमिका होगी उसको निभाऊंगा।


फिलहाल, मायावती दलितों से दूर हो गयीं या दलित अब भी उनके साथ हैं, यह आने वाला वक्त बतायेगा लेकिन, पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेताओं को वे अपने साथ नहीं रख सकीं। यह तो सच है। ‘भाजपा ने मुलायम सिंह के विरूद्ध उनका साथ देकर उन्हे, मुख्यमंत्री जरूर बनवा दिया। लेकिन इस मुगालते में वे अपने ‘आधार वोट बैंक’ को नजरअंदाज करने लगीं कि अब तो हमारे साथ ‘सर्वसमाज’ खड़ा है। लिहाजा उनका अपना दलित समाज भी तुनक मिजाज हो गया। सर्वसमाज की तुनकमिजाजी का शिकार तो उन्हे होना ही था। ‘प्रो. सुरेन्द्र प्रताप जो काशी विद्यापीठ में प्रोफेसर और  समाजिक चिंतक हैं, कहते हैं ‘मौजूदा समय में यदि राजनीतिक स्थिति का आकलन किया जाय तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि छह महीना पहले की अपेक्षा बसपा का ग्राफ गिरा है। चुनाव आते-आते स्थितियों में क्या बदलाव आयेगा, कहना मुश्किल है। लेकिन ऐसा आकलन है कि जहां पहले सपा और बसपा की सीधी फाइट दिख रही थी, अब सपा-भाजपा की सीधी लड़ाई दिख रही है और बसपा तीसरा कोण बनाने में लगी है।’

Kadri Gopinath, Saxophone Maestro, Senior Film Actor S Shivaram and AN Shrithi, 3D photographer launching the website of unique 3D foto club at a press conference in Bengaluru on Monday 27th May 2013. (Photo: IANS)

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. सोहन यादव का मानना है, ‘भाजपा के पास कुशल रणनीतिकार और प्रशिक्षित कार्यकर्ता हैं। भाजपा ने बसपा के जनाधार में सेंध लगाने की रणनीति बनायी और उसके पिछड़े वर्ग के मतदाओं को अपने साथ लाने के लिए कोइरी समाज से केशव मौर्य को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। दूसरा कदम स्वामी प्रसाद मौर्य को बसपा से खिसकाने के रूप में देखा जा रहा है। स्वामी भाजपा में जाते हैं तो भी, नहीं जाते हैं तो भी बसपा का नुकासान तो हुआ ही।’ बसपा के पिछड़ा वर्ग का एक बड़ा समुदाय कुर्मी अपना दल के रूप में उसके साथ पहले से ही जुड़ा है। वह पहले बसपा का ही वोट बैंक माना जाता था।


स्वामी प्रसाद की ‘औकात’ बसपा के कारण थी: शिवबोध राम


बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में दो तरह के कार्यकत्र्ता और नेता हैं। एक जो 2000 या इसके बाद पार्टी में आये और दूसरे वे जो 1980 या उसके पहले से काशीराम के सम्पर्क में रहे और बसपा (1984 में गठन) की स्थापना में उनका योगदान रहा। इन्हें बसपा का ‘फाउंडर मेम्बर कहा जाता है। दलित समाज और पार्टी के प्रति इनका ‘समर्पण’ ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। ‘सत्ता लोभ’ से ये एक हद तक निर्लिप्त माने जाते हैं। इसीलिए राजनीतिक उठापटक में ये लगभग प्रभावित नहीं होते और प्राय: संगठन का ही काम देखते हैं। बनारस के शिवबोध राम, ऐसे ही समर्पित ‘बसपाई’ हैं। ये उत्तर प्रदेश में ‘मिशन काशीराम’ के ध्वजवाहक माने जाते हैं। इनसे बातचीत की सियाराम यादव ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:-

 

बसपा में भगदड़ मची है। वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, आर. के. चौधरी के अलावा कई और लोग पार्टी छोड़ कर जा चुके है। चुनाव के पहले इस भगदड़ को किस रूप में देख रहे हैं?

हम सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं और हम में अटूट धैर्य है। जो राजनीतिक लाभ के लिए पार्टी में आते हैं, हित पूरा नही होते देख धैर्य टूटने लगता है। हम बसपा के लोग बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम के मिशन पर बहन मायावती के नेतृत्व में आगे बढ़ रहे हैं। किसी के पार्टी में आने-जाने से विचलित नहीं होते। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे लोगों के जाने से विचलित नही हैं। तीन-चार चुनावों में मुंह की खाने के बाद, बहन मायावती ने उन्हे तबज्जों दिया, एमएलसी बनाया, नेता विरोधी दल बनाया, पार्टी में ऊंचा पद दिया। उनके बेटा-बेटी को टिकट दिया। वे दोनो बुरी तरह हार गये। फिर भी स्वामी की महत्वकांक्षा बढ़ती जा रही थी।

स्वामी प्रसाद का आरोप है कि मायावती दलित की बेटी नही दौलत की बेटी हो गयी हैं।

मैंने पहले ही कहा कि कुछ लोग बसपा में राजनीति करने आये हैं। हम सामाजिक परिर्वतन के लिए लड़ रहे हैं। कुछ ताकते हैं जो इस परिवर्तन को बधित करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं। वे सामाजिक परिवर्तन नहीं चाहते। अम्बेडर से लेकर कांशीराम, बहन मायावती तक सब उन्हें दुश्मन नजर आते हैं। पार्टी के महत्वाकांक्षी लोग उनके ‘टूल’ बन जाते है। स्वामी प्रसाद उनके ‘टूल’ बन गये हंै। वे कुछ भी आरोप लगा सकते हैं। बसपा इससे विचलित नहीं होने वाली।

SHIVBHOD RAM

पिछड़े समाज का एक कद्दावर नेता आपकी पार्टी छोड़ कर जाये और आरोप यह लगाये कि मायावती पैसा लेकर टिकट बांट रहीं हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

मैंने कहा न, स्वामी प्रसाद पिछड़े समाज के क्या है। कौन इन्हें जानता था? बसपा के वे फांउडर मेंबर नहीं हैं। उन्हे राजनीति करनी है, कर रहे है। दलित समाज, पिछड़े समाज के विकास के विरोधी ‘हमारा मिशन’ बाधित करने के लिए ऐसे लोगों कों ‘यूज’ करते हैं। वे कर रहे है। हम इस सच्चाई को समझते हैं, वे फिर मूस (चूहा) हो जायेंगे जैसे पहले थे। इससे पहले भी बसपा छोड़कर 23 लोग (विधायक) गये थे। उसमें से कितने लौटकर फिर विधानसभा आये? केवल 3 तो स्वामी को भी औकात पता चल जायेगी।

आप कह रहे थे ये लोग ‘टूल’ बन जाते है? किसके टूल बने हैं स्वामी प्रसाद?

वर्णवाद-जातिवाद के पोषकों के निशाने पर हम सदैव रहे हैं। बसपा के 23 एमएलए को तोड़कर बहन मायावती की सरकार गिराने वाले भी यही लोग थे। केशरीनाथ त्रिपाठी तब विधानसभा अध्यक्ष थे और संविधान दल-बदल कानून की अनदेखी कर उन्होंने इन विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी।

बसपा ने ब्राह्यणों को साथ लेकर सरकार भी तो बनायी थी। फिर आधे-आधे समय तक राज करने के मुद्दे पर झगड़ा हुआ और उन्होनें मायावती की सरकार गिराने में मदद कर मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया।

हमें सब याद है। वर्णवादियों का चरित्र जो है, वह रहेगा। वे समाज के गैर-वर्णवादियों की एकता को विख्ंडित करने के लिए कोई कसर नहीं छोडऩे वाले।

भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लडऩे या चुनाव के बाद कोई तालमेल?

मैंने अपनी बात कह दी।

पिछड़े व दलित समाज से बसपा क्या कह कर वोट मांगेगी? क्योंकि बसपा के चरित्र में आये बदलाव और ‘पैसे से टिकट’ वाली बात को लोग गंभीरता से लेने लगे हैं?

हमारी लड़ाई के मूल मुद्दे अपनी जगह पर हैं। आरक्षण हम ही लागू करा सकते हैं। प्रमोशन में खत्म हुए आरक्षण को फिर लागू कराना हमारा उद्देश्य होगा। गैर-बराबरी जाति व वर्णवाद को खत्म करके समतालूक समाज बनाने की लड़ाई हम निरंतर लडते रहेंगे।

 


अभी चुनाव में 6-7 महीने बाकी हैं लेकिन, कुशल रणनीतिकार तो सालभर पहले ही मोर्चा खोलकर अपने हथियारों की तैनाती करने लगते हैं। अपने योद्धओं की पीठ थपथपाने के साथ ही विपक्षी शिविर में खलबली मचाना भी कुशल सेनापति की खासियत होती है। देखना है कि बसपा अपनी सेना में स्थिरता कायम रख पाती है या विपक्षी उसके शिविर को अस्थिर कर खलबली मचाने में कामयाब हो जाते हैं।

लखनऊ से सियाराम यादव

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