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महात्मा की महानता का एहसास फिर-फिर

महात्मा की महानता का एहसास फिर-फिर

By रामनिवास मलिक

गांधीजी ने भारत आने से पहले ही स्वराज हासिल करने के लिए सत्याग्रह के प्रयोग को दोहराने का मन बना लिया था। स्वदेश लौटने के बाद वे यहां की सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य को जानने-समझने के लिए दो साल तक पूरे भारत का भ्रमण करते रहे। फिर, चंपारण (बिहार) और खेड़ा (गुजरात) में सत्याग्रह की दो जीत ने उन्हें देश भर में मशहूर कर दिया। उनके इर्द-गिर्द युवा नेताओं की भीड़ जुटने लगी। कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, अली बंधु, राजगोपालाचारी, अजमल खान, अंसारी, सुभाषचंद्र बोस,जयप्रकाश नारायण, महादेव देसाई, अब्दुल कलाम आजाद सहित सभी नेता ग्रहों की भांति गांधी रूपी सूर्य की परिक्रमा करने लगे। 

इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उसे करीब 1,400 वर्षों से विदेशी आक्रांताओं की गुलामी झेलनी पड़ी। इतने लंबे समय से गुलामी में जकड़े रहने से देश का मनोबल टूट गया। भगवान की कृपा से भारत बच तो गया लेकिन उसकी गुलामी उसकी सभ्यता, संस्कृति, धरोहरों, मनोबल, शैक्षिक विकास और धार्मिकता सभी पर कई तरह के अमिट दाग छोड़ गई। अगर भारत हर्षवद्र्धन जैसे अपने सम्राटों के अधीन ही रहा होता तो उसके विकास की कोई सीमा नहीं होती और आज, दुनिया के देशों में एक विशिष्ट स्थान रखता।

इस लंबे अंधेरे दौर को खत्म करने का मुख्य श्रेय महात्मा गांधी को जाता है। उन्होंने बेहद ताकतवर ब्रिटिश राज से आजादी का आंदोलन 32 साल तक चलाया और  आखिरकार 15 अगस्त 1947 को देश को अपनी नियति का मालिक खुद बना दिया। देश के लोगों और उनकी भावी संततियों को 14 सदियों की लगातार गुलामी से मुक्त कराने और नया सवेरा दिखाने का उनका योगदान कितना बड़ा है, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। असल में उनकी महानता बहुआयामी थी। उन्होंने विरले मानवीय गुणों को संपूर्णता में आत्मसात किया और उसका प्रदर्शन भी किया। ये गुण हैं सत्य, अहिंसा, आध्यात्मिकता, सादगी, राजनैतिक शुद्धता, अस्पृश्यता और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष, सभ्यता, विनम्रता, गरीबों का महिमामंडन, लालच तथा क्रोध पर नियंत्रण, ईष्र्या-द्वेष-ओछे विचारों से एकदम मुक्त। मानव में इन्हीं गुणों का उपदेश गीता के 16वें अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को ईश्वर तक पहुंचने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए देते हैं। शायद गांधीजी ने भी इन गुणों को सोने से पहले रोजाना भगवद्गीता के पाठ से सीखा होगा। इतने सारे मानवीय गुण किसी और ऐतिहासिक शख्सियत में शायद ही मिलें। कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें महात्मा की उपाधि दी और भारत ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिया, लेकिन उन्हें उस रूप में शायद ही किसी दौर में सच्चे मन से याद किया गया।

जब वे 9 जनवरी 1915 को भारत की धरती पर दक्षिण अफ्रीका से उतरे तो यह धरती राजनैतिक और सामाजिक रूप से बांझ जैसी हो गई थी। आर्थिक मोर्चे पर नहरों के जाल, रेलवे और शैक्षणिक संस्थाओं के कारण थोड़ी बहुत हरियाली जरूर थी। यहां के लड़के उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड जाने लगे (गांधी, पटेल, जवाहर, सुभाष वगैरह)। लॉर्ड कर्जन ने हजार साल तक भारत पर राज करने की योजना बनाई थी और भारत को ब्रिटिश ताज में एक नगीना बताया था। इसके लिए 1909 में मोर्ली आयोग के जरिए मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व देकर ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाई गई। उस दौर में राजनैतिक परिदृश्य पर बाल गंगाधर तिलक जैसे इकलौते नेता थे जो स्वराज हासिल करने के लिए कुछ आंदोलन चला रहे थे, लेकिन वे पांच साल तक मांडले जेल की तन्हा कोठरी की सजा भुगतने के बाद कुछ टूट से गए थे। सामाजिक तौर भारत हिंदू, मुसलमान और दलितों में बंटा हुआ था और उनमें आपस में अविश्वास की गहरी खाई थी। गांधजी ने इन तीनों बुराइयों (अंग्रेजी राज, हिंदू-मुसलमान द्वेष और अस्पृश्यता) से एक साथ लोहा लेने का फैसला किया।

31-01-2015

इतिहास के ऐसे मोड़ पर उनके आगमन से लगा, मानो भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता के चौथे अध्याय के 7वें श्लोक में नया अवतार लेने के वादे को पूरा किया है। इस अवतार की देश में लंबे समय से प्रतीक्षा रही है, लेकिन देर आयद द़ुरुस्त आयद। गांधीजी का जन्मस्थान पोरबंदर, सुदामापुरी के रूप में भी विख्यात रहा है। गांधीजी ने अंग्रेजी राज के खिलाफ शांतिपूर्ण युद्ध किया और सत्याग्रह को अपना सुदर्शन चक्र बनाया। इसके पहले वे दक्षिण अफ्रीका में (1902-1914) सत्याग्रह के हथियार से ही जनरल स्मट्स की गोरी सत्ता को झुका दिया और भारतीयों के लिए नागरिक अधिकारों की बहाली हो गई थी। जब गांधीजी अफ्रीका से भारत के लिए चले तो स्मट्स ने उनके सम्मान में कहा था, ”मैं उनके भेंट किए जूतों को पहनने के काबिल तो नहीं महसूस करता, लेकिन मैं खुश हूं कि एक संत जा रहा है, मुझे उम्मीद है कि हमेशा के लिए।’’ इसके बाद 1942 में भी जनरल स्मट्स ने लंदन में चर्चिल से कहा था, ”वह देवदूत हैं। आप और मैं तो बस सामान्य आदमी हैं।’’

गांधीजी ने भारत आने से पहले ही स्वराज हासिल करने के लिए सत्याग्रह के प्रयोग को दोहराने का मन बना लिया था। स्वदेश लौटने के बाद वे यहां की सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य को जानने-समझने के लिए दो साल तक पूरे भारत का भ्रमण करते रहे। फिर, चंपारण (बिहार) और खेड़ा (गुजरात) में सत्याग्रह की दो विजयों ने उन्हें देश भर में मशहूर कर दिया। उनके इर्द-गिर्द युवा नेताओं की भीड़ जुटने लगी। कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, अली बंधु, राजगोपालाचारी, अजमल खान, अंसारी, सुभाषचंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण, महादेव देसाई, अब्दुल कलाम आजाद जैसे स्वतंत्रता सेनानी ग्रहों की तरह गांधी रूपी सूर्य की परिक्रमा करने लगे। यही सौरमंडल भारतीय इतिहास का स्वर्णिम दौर साबित हुआ। इन सभी महापुरुषों ने भारी त्याग किया (पटेल और प्रसाद ने अपनी वकालत छोड़ी, सुभाष ने आइसीएस, वगैरह)। वे सभी अपने तरह के देवदूत सरीखे थे। उनके मुकाबले आधुनिक दौर के नेता कहां ठहरते हैं!

अंग्रेजी राज से सीधे आमने-सामने टकराने की घड़ी अप्रैल 1919 में आई, जब गांधीजी ने रॉलेक्ट कानून के खिलाफ 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। हड़ताल बेहद सफल रही और अंग्रेजी राज के लिए झटका साबित हुई। यहीं से अंग्रेजों से सीधी और लंबी लड़ाई की शुरुआत हुई। गांधीजी ने अंग्रेजी राज पर तीन बड़े हमले (1920, 1930, 1942) में किए। इस बीच छोटी-मोटी लड़ाईयां चलती रहीं। मसलन, प्रिंस ऑफ वेल्स के दौरे और साइमन कमीशन का बॉयकाट।
इसके साथ हिंदू-मुसलमान खाई को पाटने और अस्पृश्यता मिटाने की उनकी लड़ाई भी चलती रही।

42;िन तिलक की मृत्यु हुई) को शुरू हुआ। गांधीजी ने जालियांवाला बाग कत्लेआम की हंटर आयोग की कमजोर रिपोर्ट और ट्रीटी ऑफ सेवर्स के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू किया। चार चरणों का यह कार्यक्रम फौरन देश भर में शुरू हो गया और अंग्रेजी राज की चूलें हिला गया। पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों ने भाइयों की तरह हाथ मिलाकर आंदोलन को सफल बनाया। नए वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने कहा, ”हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई फिर पट गई है।’’ पहली बार अंग्रेजों को लगा कि अब उनके दिन गिने-चुने हैं।

दूसरा हमला मार्च 1930 में हुआ जब गांधीजी ने नमक कानून तोडऩे के लिए प्रसिद्ध डांडी मार्च किया। जब वे डांडी पहुंचे तो भीड़ जन समुद्र में बदल चुकी थी। अमेरिकी प्रेस ने गांधीजी के बारे में लिखा, ”ईसा मसीह ने भारत में पुनर्जन्म लिया है।’’ चर्चिल ने लॉर्ड इरविन की यह कहकर खिंचाई की कि ”यह देखकर मिचली-सी आती है कि एक बागी मामूली-सा वकील फकीर का वेश बनाकर अधनंगे हालत में वायसरीगल पैलेस की सीढिय़ां चढ़ रहा है और ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के सामने खड़े होकर बराबरी से बात कर रहा है।’’ इस आंदोलन के असली फायदे दो हुए। एक, अमेरिकी सरकार भारत के मामलों में रुचि लेने लगी। दूसरे, ब्रिटिश सरकार को एहसास हो गया कि उसके विदाई के दिन नजदीक आ रहे हैं।

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आजादी की लड़ाई का तीसरा चरण 9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ। गांधीजी ने अंग्रेजों से कहा भारत छोड़ो। इस तरह ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की शुरुआत हुई। जैसे ही गांधीजी, कस्तूरबा और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की गिरफ्तारी की खबर अगली सुबह फैली, लोग गुस्से में सड़कों पर उतर आए। लोगों ने डाकघर जला डाले, रेल की पटरियां और बिजली के खंभे उखाड़ डाले। समूचा देश उबलने लगा। हजारों लोगों को लंबे समय तक जेल में डाल दिया गया। गांधीजी चिकित्सा के आधार पर 26 महीने बाद जेल से रिहा हुए। दूसरे नेता 34 महीने बाद छूटे। देश के लोग उबल रहे थे। लोगों के गुस्से को देखकर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड ने तो 1944 में भारी विद्रोह की हालत में अंग्रेज अधिकारियों को निकाल ले जाने के लिए एक जहाज भी तैयार रखा था।

सौभाग्य से, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लेबर पार्टी की नई सरकार सत्ता में आई। ब्रिटेन कर्ज में डूब चुका था और वहां भारी आर्थिक संकट शुरू हो गया था। ब्रिटेन भारत का एक अरब पाउंड का देनदार बन गया था। यह पता नहीं कि वह कर्ज चुकाया गया या नहीं। खाद्य सामग्री की भारी कमी हो गई थी और दुकानों के सामने लंबी-लंबी कतारें लगने लगी थीं। ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री लॉर्ड एटली ने भारत को आजाद करने का फैसला किया और सत्ता हस्तांतरण के लिए 30 जून 1948 की तारीख तय की। एटली ने तब कहा था, ”युद्ध में लड़े भारतीय सैनिकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए भारत के लोगों को उपहार देने का यही सही वक्त है और दूसरे भारत में राज करने के लिए जिस विशेष प्रयास की जरूरत है, वह अब अंग्रेज लोग करने को तैयार नहीं लगते।’’

नए ऊर्जावान वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने काफी पहले ही 15 अगस्त 1947 को इस काम को अंजाम दे दिया। जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। लेकिन इस लड़ाई को जीतने वाले असली जनरल तो सांप्रदायिक आग बुझाने के लिए कलकत्ता की एक संकरी गली के एक मुसलमान के घर में उपवास कर रहे थे।

उस समय देश में 565 रियासतें देश के लगभग आधे हिस्से में थीं। इस भारत विलय को सरदार पटेल ने लॉर्ड माउंटबेटन की मदद से बखूबी अंजाम दिया। यह भारत की आजादी की दूसरी लड़ाई की तरह था। कश्मीर को भी उन्होंने बचाया जब पाकिस्तान ने उस पर हमला किया। देश का बंटवारा और टाला नहीं जा सकता था। इसकी एक वजह यह भी थी कि क्रिप्स मिशन के मुताबिक 565 रियासतों और सांप्रदायिक तनाव के साथ इतने बड़े देश का प्रशासन चलाना मुश्किल था। क्रिप्स मिशन ने भारत को एक देश नहीं, बल्कि भारत के संयुक्त संघ के रूप में प्रस्तावित किया था।

दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी की भूमिका वाकई देवदूत की तरह थी। किसी भी चरण में उनसे कोई चूक नहीं हुई। हालांकि भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की अगुआई में उनसे कुछ गलतियां हुईं। वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस की तरह कभी जल्दबाजी में नहीं रहे। वे इस कहावत में यकीन करते थे कि ”जब समय आएगा तो विचार से ताकतवर और कुछ नहीं होगा।’’ और विचार 1942 में समय आने पर आया। उनके सभी फैसले अपने मन से होते थे, सुनियोजित कतई नहीं होते थे और उनके अनुयायी उनमें काफी भरोसा करते थे। कांग्रेस कार्यसमिति में कभी कोई मास्टर प्लान बनाने के लिए भारी माथपच्ची नहीं हुआ करती थी। साइमन कमीशन का बॉयकाट गैर-जरूरी और समझदारी भरा नहीं था। इसमें लाला लाजपत राय की जान चली गई और अंतत: भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी का कारण भी बना।

अक्सर लोग गांधीजी की आलोचना जवाहरलाल नेहरू को 1945 में कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए सरदार पटेल को कुर्बान कर देने के लिए करते हैं। गांधीजी ने शायद यह दो वजहों से किया। उन्हें वाकई यकीन था कि नेहरू अंतर्राष्ट्रीय मामलों को बेहतर संभाल पाएंगे और सरदार पटेल के ऊपर होने से अल्पसंख्यकों में एक तरह की आशंका बनी रहेगी। लेकिन यह सब जिस तरीके से हुआ, वह परेशान करने वाला था। ऊंचे दर्जे के राष्ट्रवादी होने के नाते सरदार पटेल ने बिना किसी शिकायत के गांधीजी की इच्छा के आगे सिर नवां दिया। हालांकि संगठन पर उनकी पूरी पकड़ थी। पी.डी. टंडन का कांग्रेस अध्यक्ष पद पर और राजेंद्र प्रसाद की देश के राष्ट्रपति पद पर जीत उन्हीं की वजह से हुई।

इसके अलावा गांधीजी की चार और भूलें ये हैं: 1928 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में हिस्सेदारी से अली बंधुओं को न रोकना, सरदार पटेल को (नेहरू और पटेल के दबाव में) संपत्ति बंटवारे के एवज में पाकिस्तान को 55 करोड़ रु. देने पर मजबूर करना, 1944-45 में जिन्ना के घर पर सात बैठकें करके उनको तवज्जो देना, और 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस में गंभीर रूप से बीमार सुभाषचंद्र बोस की आलोचना से अपने साथियों को न रोकना तथा उन्हें हताशा में कांग्रेस अध्यक्ष पद छोडऩे पर मजबूर करना।

हालांकि गांधीजी भी एक मनुष्य थे और हर मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। इन गलतियों की तुलना अंग्रेजों से लोहा लेने के महती कार्य और बिना एक गोली चलाए स्वतंत्रता हासिल करने में उनके विराट योगदान से करना चाहिए। ऐसी हस्तियां सदियों में एक बार पैदा लेती हैं। आज हम आजादी की चांदनी का आनंद उनके और उनके साथियों के योगदान से ही ले पा रहे हैं। हालांकि अंग्रेजों को 1858 में विभाजित भारत को एक करने और शैक्षणिक संस्थाओं के निर्माण का श्रेय देना चाहिए, जिनसे तिलक, गांधीजी जैसे महापुरुष शिक्षित होकर निकले।

गांधीजी का समूचा जीवन आध्यात्मिक था। उनके जीवन के अनेक संदेश सूर्य की किरणों की तरह प्रकाश फैलाते हैं। उनका सबसे प्रमुख संदेश यही है कि अगर किसी का हृदय नि:स्वार्थ भाव से प्रेरित हो तो अकेला आदमी भी चमत्कार कर सकता है। मानव व्यवहार के लिए उनका प्रसिद्ध सूत्र है, ”दूसरों से वैसा ही व्यवहार करो जो तुम्हें अपने लिए अच्छा लगता है।’’ ऐसे महात्मा के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

अस्पृश्यता के खिलाफ उनका संघर्ष देवदूत की तरह था। उन्होंने निचली जाति के दादाभाई और उनकी पत्नी को जून 1915 में अपने आश्रम में रखा और ऐलान किया, ”हिंदू पराए राज से आजादी के तब तक काबिल नहीं हैं जब तक वे अपने ही एक हिस्से को अछूत मानते हैं। अगर अछूतों ने विरोध किया तो सवर्ण हिंदुओं को कभी स्वराज नहीं मिल पाएगा। मेरे लिए अस्पृश्यता से संघर्ष स्वराज पाने के संघर्ष से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।’’ उन्होंने अछूतों को नया नाम हरिजन दिया। हरिजनों को अलग मताधिकार देने के खिलाफ गांधीजी के जेल में आमरण अनशन की वजह से ही 24 सितंबर को पूना पैक्ट पर समझौता हुआ था। इस समझौते से हरिजनों और हिंदुओं के बीच घृणा की दीवार टूटी थी। डॉ. अंबेडकर गांधीजी की हमेशा आलोचना किया करते थे, लेकिन गांधीजी ने उन्हें 1946 की अस्थायी सरकार में मंत्री बनवाया।

शांति के दूत के रूप में उनका आखिरी मौका अक्टूबर 1946 में आया जब वे सांप्रदायिक आग बुझाने और लाखों लोगों की जान बचाने नोआखाली पहुंचे। वहां वे रहे, गांववालों के साथ बात की, उनके साथ चले। जब तक शांति स्थापित नहीं हो गई, चार महीने तक वे गांववालों की झोपडिय़ों में रहे। उसके बाद मार्च 1947 में वे बिहार पहुंचे। वहां भी शांति स्थापित होने तक कुछ हफ्तों तक रुके। वे फिर 9 अगस्त को सांप्रदायिक आग बुझाने कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता मैदान के फुटबाल ग्राउंड पर उनकी सभा में करीब पांच लाख हिंदू-मुसलमान पहुंचे। उन्होंने तीन दिनों तक उपवास किया और 1 सितंबर को शांति स्थापित हुई। लॉर्ड माउंटबेटन ने बंगाल और बिहार में सांप्रदायिक आग बुझाने में उनके योगदान की भारी प्रशंसा की। उन्होंने कहा, ”पंजाब में 55,000 सैनिक थे पर बड़े पैमाने पर दंगे हुए। बंगाल में एक आदमी (गांधीजी) की फौज थी और वहां कोई दंगा नहीं हुआ। मुझे उस एक व्यक्ति के सुरक्षाबल और उनके दूसरे सहयोगी सुहरावर्दी के प्रति अभार प्रकट करने की इजाजत दी जाए।’’

इतिहास के पन्नों में महान त्रासदियों और विसंगतियों की भरमार है। ऐसी ही एक विसंगति 30 जनवरी 1948 को घटी जब नाथुराम गोडसे ने इस शांति के महान दूत को गोली मार दी (भगवान कृष्ण की भी एक शिकारी के तीर से मृत्यु हुई थी), वह भी बिड़ला भवन के प्रार्थना सभा में। उनकी यह शहादत अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग और कैनेडी बंधुओं सरीखी ही थी, लेकिन उनकी असली मृत्यु तब हुई जब हम भारतीयों (कांग्रेस पार्टी सहित) ने उन्हें और उनके आदर्शों को पूरी तरह भुला दिया। आधुनिक दौर में उनके आसपास बस नेल्सन मंडेला ही खड़े हो पाते हैं। आश्चर्य यह भी है कि गांधीजी के नाम का तीन बार नामांकन के बावजूद उन्हें नोबल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। वे दुनिया के इतिहास में एकमात्र ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने बिना एक गोली चलाए दो देशों को स्वतंत्रता दिलाई।

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