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सर्वे भवन्तु सुखिन:

सर्वे भवन्तु सुखिन:

हम जीवन को जितना समझने का प्रयास करते हैं, वह उतना अधिक जटिल हो जाता है। इस जटिल जीवन में हमारे साथ घटित होने वाली हर अच्छी-बुरी घटना का हम गणित जैसा हिसाब करने बैठते हैं, कभी-कभी यह सब सहज गणित की तरह आसानी से सुलझ जाता है। कभी-कभी हमारा योग और वियोग हमारे हिसाब से बाहार हो जाता है, जैसे कि हम बचपन से यह सिखते आये हैं कि हमारे कर्मों का फल हमें मिलता है, हमारा कर्म हमारा भाग्य बनाता है, लेकिन कभी-कभी इसमें व्यक्तिक्रम दिखाई देता है। हमारे जीवन में जो भी कुछ घटता है वह हमारी सोच से बाहार हो जाता है। तब दिमाग में एक ख्याल आता है, शायद कुछ हिसाब पूर्वजन्म के भी हैं। जैसे गणित का हिसाब माइनस लगाकर सही हो जाता है, ठीक उसी तरह पूर्व जन्म को दृष्टि में रखकर हम जीवन के गणित को सुलझाने बैठते हैं। कभी-कभी यह एहसास होता है कि यहां जो कुछ होता है वह केवल परमात्मा की इच्छा से घटता है, हम केवल कठपुतली की तरह कार्य करते हैं, हमारे कर्म काफी हद तक हमारे भाग्य को बदलने का कार्य करते हैं। इससे हमें यह ज्ञात होता है कि जो हमारे साथ घटता है अथवा घटने वाला है उसे कोई टाल नहीं सकता, क्योंकि हमारे साथ घटने वाला बहुत कुछ हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों का ही फल होता है। हम अगर कुछ कर सकते हैं तो अपने मन को कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार कर सकते हैं।

हम बचपन से जिस वातावरण में पलते-बढ़ते हैं, हम सम्पूर्ण रूप से उसमें खो जाते हैं, हमारे समस्त आत्मियों में अपना स्वरूप ढूंढ़ते हैं। उनके सुख-दुख में अपना सुख-दुख  देखते हैं। बाल्यकाल से हमें यह बताया जाता है कि वही हमारे लिए सबसे अच्छा है। हमारे सामने उससे थोड़ा भी अलग घटता है तो हम दुखी हो जाते हैं। हमें इस बात को स्वीकार लेना चाहिए कि इस दुनिया में कभी भी कुछ भी घट सकता है। इस दुनिया में मौजूद कुछ वस्तुओं से हमें जरूरत से ज्यादा ही लगाव हो जाता है। जबकि हमें सदैव इस बात का एहसास होना चाहिए कि यह दुनिया, यह  परिवार, अपनी चीजें , यहां तक हमारा अपना शरीर भी हमारा नहीं होता है, इस शरीर को केवल हमारी आत्मा ही धारण किए हुए है। जब हम जीवन में सच्चाई को स्वीकार लेते हैं तो हमारे सामने आने वाली हर परिस्थिति का हम आसानी से सामना कर सकते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि हम सबको अपना माने, अपनी आत्मा में ही सबकी आत्मा का दर्शन करें। ‘वसुदेव कुटम्बकम’ समग्र विश्व मेरा ही परिवार है हमें हमेशा इसी भावना को अपने मन में रखना चाहिए, इस भावना को अपने मन में स्थान देना इतनी सहज बात नहीं है, लेकिन अभ्यास के द्वारा हम कुछ हद तक इस भाव को स्वीकारने में सक्ष्म हो सकते हैं। सबको अपना माने, किसी की भी खुशी हो उसमें शामिल हों। सबका भला चाहें। हमारे धर्म का यह मूल है जो हम सब आजकल भूल गए हैं। जिस मूल को मानकर हमारे पूर्वज खुश रहा करते थे, यही हमारा मूल तत्व है।

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दु:ख भाग्भवेत् ।।

उपाली अपराजिता रथ

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