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इस्लामी आतंकवाद का दार्शनिक

इस्लामी आतंकवाद का दार्शनिक

ग्यारह सितंबर दो हजार एक को विश्व के महाबली अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने इस्लामी आंतकवाद का प्रतीक बन चुके ओसामा बिन लादेन के बारे में उपलब्ध हर छोटी से छोटी जानकारी को खंगालकर यह सुराग पाने की कोशिश की, कि वह कौन सा प्रेरणा स्रोत है जिसने एक सामान्य, शांत और सुशील लड़के को दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी में तब्दील कर दिया। उन्हें पता चला कि वह है इस्लामी जिहाद का दार्शनिक सईद कुतुब। इस्लामी दुनिया के बाहर कम ही लोग उसे जानते हैं, लेकिन अपनी प्रखर बौद्धिकता और शहादत के बूते वह इस्लामी दुनिया के देशों के जिहादी नौजवानों का रहबर बन चुका है।

दुनियाभर के वामपंथी, उदारवादी बुद्धिजीवी सभ्यताओं के टकराव का विवादास्पद सिद्धांत देने के लिए अमेरिकी प्रोफेसर हटिंगटन को चाहे जितना कोसे हकीकत यह है कि उससे कई दशक पहले उग्रवादी इस्लाम के दार्शनिक सईद कुतुब ने प्रतिपादित किया था कि इस्लाम का पश्चिम ही नहीं सारी गैर-मुस्लिम संस्कृतियों से संघर्ष अवश्यंभावी है। जिसमें जिहाद मुसलमानों का सबसे कारगर हथियार बन सकता है।

अलकायदा तो सईद कुतुब के जिहाद के दर्शन से ओतप्रोत रहा है। ओसामा बिन लादेन के अफगान रब मुजाहिदीन, अलकायदा के सिद्धांतकार और नंबर दो अयमान जवाहिरी की अगुवाई वाले इजिप्तियन इस्लामिक जिहाद और इस्लामिक ग्रुप ये तीन संगठनों का विलयकर अलकायदा का गठन हुआ था। यह सभी मिस्र के इस्लामी पुनरुत्थानवादी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड  की अलग-अलग शाखाएं थी। इस संगठन के बौद्धिक प्रेरणास्रोत थे सईद कुतुब। इस्लामी आतंकवाद के ज्यादातर विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं कि मौजूदा इस्लामी आतंकवाद की जड़े कुतुब के दर्शन में पैठ बनाये हुये है।

मिस्र के सेक्युलर नेता राष्ट्रपति नासिर की सरकार ने जब 1966 में आतंकवादी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के सिद्धांतकार कुतुब को फांसी दी तो नासिर के एक मुखर विरोधी की जुबान भले ही बंद हो गई हो, लेकिन कुतुब की शहादत ने उनके आंदोलन में एक नई जान फूंक दी। उसी वर्ष आयमान जवाहिरी ने अपने आतंकवादी संगठन की नींव रखी थी जिसका मकसद मिस्र की सरकार का तख्ता पलटकर इस्लामी राज्य की स्थापना करना था। इस बीच सईद कुतुब का भी और उसके विचारों का कट्टर अनुयायी मोहम्मद कुतुब भागकर सऊदी अरब चला गया। वहां किंग अब्दुल अजीज यूनीवर्सिटी में इस्लामी दर्शन पढ़ाने लगा। उसके छात्रों में था ओसामा बिन लादेन। वह मोहम्मद कुतुब द्वारा सईद कुतुब के दर्शन में दीक्षित किए जाने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ गया। बाद में तो उसने कुतुब की राह पर चलते हुए जिहाद को जिंदगी का मकसद बना लिया। लंबे जेल जीवन ने कुतुब को और भी ज्यादा कट्टरवादी बनाया तो किन्ही मामलों में ज्यादा रचनात्मक भी। दुनिया की जिन हस्तियों ने अपने जेल जीवन में महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की उनमें कुतुब का नाम प्रमुख है। जेल में लिखी उनकी किताब ‘माइल स्टोनÓ एक तरह से उग्रवादी इस्लाम का घोषणापत्र है।

अगर हम इस्लामी आतंकवाद का मुकाबला करना चाहते हैं तो उसके पीछे काम कर रही सोच के बारे में गहरी जानकारी रखनी होगी। दरअसल इस्लामी आतंकवाद के बारे में एक गलतफहमी यह है कि अफगानिस्तान, चेचेन्या, इराक, फिलस्तीन में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म से नाराज चंद धर्मार्थ और सिर फिरे नौजवानों का जवाबी हमला है। मगर इस्लामी उग्रवाद का अध्ययन करने वालों का कहना है कि यह आंशिक सच ही है। पूरा सच यह है कि मुसलमानों का हिस्सा इस्लाम को केवल धर्म नहीं राजनीतिक दर्शन भी मानता है। जिसके पास वैकल्पिक समाज की रूपरेखा है। अरब देशों में इस्लामावाद, इस्लामी उग्रवाद या राजनीतिक इस्लाम कहे जाने वाले आंदोलन के जनक और मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता हसन अल बन्ना ने नारा दिया था-कुरान हमारा संविधान है, जिहाद रास्ता और शहादत जज्बा। कुतुब इन्ही बन्ना के अनुयायी थे और सबसे मुखर प्रवक्ता भी। हर धार्मिक कट्टरपंथी की तरह कुतुब को भी आधुनिक सभ्यता रास नहीं आती। उन्हें उसके बुनियादी सिद्धांतों पर ही कड़ा एतराज था। आधुनिक सभ्यता के संकट को रेखांकित करते हुए कुतुब कहते हैं कि दुनियाभर में मनुष्य  एक असहनीय स्थिति में पहुंच गया है। हालांकि कुतुब आधुनिक सभ्यता की आर्थिक समृद्धि और वैज्ञानिक ज्ञान की तारीफ करते हैं लेकिन, समृद्धि और विज्ञान मानवता को नहीं बचा सकते। वे कहते हैं कि समृद्ध देश ज्यादा दुखी है। इस दुख की वजह यह है कि आधुनिक जीवन और मनुष्य की मूल प्रकृति के बीच विभाजन हो गया है। धर्म और भौतिकता का यह घातक विभाजन ही आधुनिक समाज के संकट-तनाव, भटकाव की भावना, निरूद्देश्यता और झूठे सुखों के पीछे भागने की होड़ का मूल कारण है। कुतुब का कहना है कि मानवता का नेतृत्व पश्चिम के हाथों में होने के कारण यह बीमारी मुस्लिम विश्व पर भी थोपी जा रही है।

कुतुब ने दुनियाभर के समाजों को दो हिस्सों में बांटा-जाहिलिया और इस्लामी। जाहिलिया वो हैं जो ईश्वर द्वारा भेजे गए निर्देशों और संहिता की उपेक्षा करते हैं और मनुष्य निर्मित कानूनों और जीवन पद्धतियों का पालन करते हैं। दूसरी तरफ इस्लामी समाज है जो हर मामले में पूरी तरह ईश्वरीय निर्देशों और संहिताओं का पालन करते हैं और ईश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। इस कसौटी पर उन्होंने पश्चिमी और पूंजीवादी मुल्कों सोवियत संघ और मिस्र आदि को परखा और पाया कि यह व्यवस्थाएं बुनियादी तौर पर एक जैसी यानी जाहिलिया हैं, क्योंकि वे मनुष्य और उसके कार्यों पर ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करती हैं। यहां उल्लेखनीय है कि वे उन मुस्लिम देशों को भी जाहिलिया मानते हैं जहां समाज व्यवस्था और जीवन पद्धति ईश्वरीय निर्देशों यानी कुरान और हदीस से संचालित नहीं होती। एक उदारवादी और लोकतंत्रवादी व्यक्ति को इस बात में कोई विरोधाभास नजर नहीं आएगा कि कोई व्यक्ति अपने धर्म का पालन करते हुए भी उनकी समाज व्यवस्था में रहे मगर कुतुब जैसे लोग इसे गलत मानते हैं। उनकी दलील है कि किसी भी मनुष्य द्वारा निर्मित सरकार को मानना उन लोगों की इबादत करना है, जिन्होंने उसे बनाया है। इस तरह मुसलमान जाहिलिया सरकार के सामने समर्पण करके अल्लाह को ठुकरा रहा है। कुतुब की दलील है कि अमेरिका में राष्ट्रपति, कांग्रेस, सुप्रीम कोर्ट और उनको शक्ति प्रदान करने वाला संविधान एक मुस्लिम के झूठे देवता होंगे। हालांकि एक मुस्लिम सचेतन रूप से उनको देवता नहीं मानता। लेकिन, एक मुस्लिम इन संस्थाओं की सत्ता को स्वीकार कर केवल अल्लाह की इबादत नहीं कर सकता। वह मनुष्य द्वारा निर्मित सिद्धांतों के आधार पर बनी सरकारों के कानूनों का पालन करके सभी व्यावहारिक मामलों में ईश्वरीय नियमों का पालन नहीं कर सकता। अगर मुस्लिम सार्वजनिक तौर पर अपने धर्म के निर्देशों के मुताबिक नहीं जी सकता, तो वह झूठ को जी रहा है। ऐसी स्थिति में उसकी इबादत केवल मस्जिद तक सीमित होकर रह जाएगी। वह अपने समाज में शरीयत के कानून को लागू नहीं कर सकता। इसलिए उसे मनुष्य निर्मित संविधान की सत्ता को स्वीकार करने के लिए अल्लाह की सार्वभौमिकता को नकारना होगा। इसलिए गैर-इस्लामी सरकारों के मातहत जीना एक तरह की गुलामी है। तर्कों के आधार पर कुतुब कहते हैं कि पश्चिम के जाहिलिया मुल्क ईश्वर की सार्वभौमिकता के खिलाफ विद्रोह हैं। मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को नकारकर उसकी पीड़ा को बढ़ाते हैं। पश्चिम के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष करने की जरूरत है।

इस संदर्भ में पश्चिम और इस्लाम के बीच टकराव का संकेत दिया था कुतुब ने और कहा था कि अल्लाह का मकसद दुनिया में उसकी व्यवस्था और जीवन पद्धति लागू करना है। यह सामाजिक व्यवस्था शरीयत कानून और कुरान के आध्यात्मिक नियमों से संचालित होगी। जीवन व्यवहार की संहिता होने के कारण इस्लाम को केवल सैद्धांतिक दायरे में नहीं डाला जा सकता। ऐसा होने पर वह निरर्थक हो जाएगा। कुतुब लिखते हैं अल्लाह के लिए शहीद होने वाले उसके मकसद को आगे बढ़ाते हैं जो उनके खून से फलता-फूलता है। इसलिए वे अपने समाज की शक्ति को आकार और दिशा देनेवाली शक्ति बन जाते हैं।

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इस दर्शन ने न जाने कितने मुस्लिम नौजवानों के जीवन की दिशा बदल दी, उन्हें आतंकवाद की तरफ मोड़ दिया। कुतुब के दर्शन से प्रेरित आतंकवादियों को लगता है कि सारी दुनिया में वही है जो इस्लाम को लुप्त  होने से बचा सकते हैं। वे मरने से नहीं डरते, कुतुब ने उनके जज्बे को मसकद दिया है। मुस्लिम युवाओं के मन में एक बात भर दी है कि धार्मिक जीवन संघर्ष का जीवन है। इस्लाम के लिए जिहाद, संघर्ष यानी शहादत का जीवन है। हमें ये विचार पागलपन भरे लग सकते हैं मगर यह गौरवगान ही आज के आतंकवादियों को आत्मघाती बम विस्फोटों के लिए प्रेरित करता है। कुतुब जैसे लोगों ने अपने लेखन से उसे गौरवपूर्ण और आनंददायी विजय के स्रोत तक पहुंचा दिया है।

कुतुब जैसे लोगों का उग्रवादी इस्लाम के लिए योगदान ही है कि उन्होंने इस्लाम को उग्रवादी इस्लाम या राजनीतिक इस्लाम में तब्दील कर दिया। शरियत जैसी संहिता को ईश्वरी द्वारा दी गई जीवन पद्धति बताकर उसे मुस्लिमों के सामने एक यूटोपिया के तौर पर पेश किया। इस्लामी आतंकवादी और उग्रवादी उन्हें अपने दार्शनिक आधार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। कुतुब और इस्लामी उग्रवादियों के लिए शरियत पर आधारित समाज व्यवस्था केवल पश्चिम का विकल्प नहीं वरन एक ऐसा आदर्श है जिसके लिए हर मुस्लिम अपनी जान न्यौछावर कर सकता है। इसलिए इस्लामी उग्रवाद को केवल पश्चिम के खिलाफ प्रतिरोध की विचारधारा के तौर पर ही नहीं नफरत और धार्मिक कट्टरता से युक्त राजनैतिक आंदोलन के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। उसका यह रूप किसी भी समाज के लिए खतरनाक है, क्योंकि यह लोगों या जनता की इच्छा के मुताबिक सामाजिक व्यवस्था बनाने की बात पूरी तरह से नकार देता है और किसी काल्पनिक अल्लाह द्वारा कथित रसूल के जरिये भेजी गई आचार संहिता के आधार पर समाज व्यवस्था का निर्माण करना चाहता है। ऐसी कपोल कल्पनाओं और अंधविश्वासों पर टिकी विचारधारा मनुष्य की वास्तविक समस्याओं और संकटों का समाधान करना तो दूर रहा उल्टा मनुष्य पर एक सर्वसत्तावादी और अधिनायकवादी व्यवस्था का शिकंजा और कड़ा कर देंगी।

सतीश पेडणेकर

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