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”आतंक के खिलाफ धर्मगुरुओं का एकजुट होना जरूरी’’

”आतंक के खिलाफ धर्मगुरुओं का एकजुट होना जरूरी’’

आईएसआईएस के प्रति मुस्लिम युवकों का रुझान लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे देश में आंतरिक सुरक्षा पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। इसे कैसे रोका जाये और कैसे देश में शांति और सद्भाव कायम किया जाये, इस विषय पर ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के मुख्य इमाम उमर अहमद इलियासी से उदय इंडिया की संवाददाता प्रीति ठाकुर ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश।

आईएसआईएस के प्रति मुस्लिम युवकों का आकर्षण बढ़ता जा रहा है, इसका क्या कारण है?

पूरी दुनिया के अंदर जो हालात हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि दुनिया से इंसानियत खत्म होती जा रही है। इंसान-इंसान से प्यार नहीं करता और एक-दूसरे के प्रति इंसान के मन में जो हमदर्दी होनी चाहिए, उसकी कमी है। जो भी इस तरह के संगठन हैं चाहे वह आईएसआईएस हो या सोशल नेटवर्क के जरिए सामने आने वाले दूसरे संगठन जो लोगों को धर्म के नाम पर बरगला रहे हैं, उनमें ज्यादातर वही लोग सामने आये हैं जो उच्चतर शिक्षा पाए हुए हैं। ऐसे लोगों का धर्म के नाम पर ब्रेनवॉस करके इस्तेमाल किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि इसमें सबसे बड़ी कमी है इंसानियत की। हम सब एक हैं। हम सब आदम की औलाद हैं और हमें मिल-जुल कर रहना चाहिए। हमारे अंदर से एक-दूसरे के लिए प्यार खत्म हो गया है और ईष्र्या आ गई है कि ये तरक्की कर रहा है, हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं। हमें कुछ भी हासिल करना है तो बेईमानी से ही। आज का माहौल ऐसा हो गया है कि कोई सुखी है तो उसके सुख से हमें खुशी नहीं है, कोई दुखी है तो उसके दुख में हम खुश होते हैं। लोगों में इंसानियत का होना जरूरी है, इसलिए हमारे मन में ये भाव पैदा हुआ कि हम मजहबी रहनुमा हैं और हमारी ये जिम्मेदारी है कि जो लोग इस्लाम के नाम को बदनाम कर रहे हैं, इस्लाम के नाम पर या धर्म के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं, हमें इस सच को सबको बताना होगा, अब हमें आगे आना होगा। इस्लाम के सही रूप को सबके सामने लाना होगा। मिसाल के तौर पर मैंने कहा अस्सलाम अलैकुम, आपने कहा वअलैकुम अस्सलाम। इसके मायने हैं कि अल्लाह आपको सलामत रखे, खुश रखे, आपने भी इसका जबाव यही कह कर दिया कि अल्लाह आपको खुश और सलामत रखे। जिस धर्म में सलामती से शुरुआत होती हो वहां मासूम लोगों को कैसे मारा जा सकता है? ढाका में आपने देखा कि कैसे निर्दोष लोगों को मार दिया, पाकिस्तान में आपने देखा कि कैसे स्कूल और कॉलेज के बच्चों को मार दिया जाता है। क्या गुनाह है उन मासूमों का?  सीधी-सी बात है कि जिन्हें आतंक फैलाना होता है उनका कोई धर्म नहीं होता।

आपने कहा कि इस्लाम सलामती की बात करता है। लेकिन, जब भी कहीं आतंकी घटना होती है तो वहां मुसलीमों का नाम ही पहले आता है, ऐसा क्यों?

सच्चाई तो यह है कि इस्लाम के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह तो इस्लाम को सिर्फ बदनाम करने की साजिश है, क्योंकि इस्लाम धर्म तो शांति और सलामती का धर्म है। इस्लाम निगाह नीचे करके और नंगे पांव चलने का हुक्म देता है, आहिस्ता चलने का हुक्म देता है, ताकि चलने वालों के पैरों के नीचे दब कर चींटी भी न मर जाये। इस्लाम ये तालीम देता है। इस्लाम ये तालिम कैसे दे सकता है कि बम लगा कर मासूमों को मार दो। अरब मुल्कों को इसके लिये आगे आना चाहिए था, वहां के जो बड़े धार्मिक नेता हैं उनकी जिम्मेदारी बनती थी आगे आने की। लेकिन दुर्भाग्य से वह आगे नहीं आये। अरब देशों में इस्लाम को लेकर कोई खड़ा

नहीं हुआ। अमेरिका, इंग्लैंड, यूरोप भी आगे नहीं आये। इंडोनेशिया जिसमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है वह भी आगे नहीं आया। हिंदुस्तान ही ऐसा शांतिप्रिय देश है जहां से इसकी शुरुआत हुई है। हमने सरकार के साथ आगे बढ़कर आतंक को रोकने की एक शुरुआत की है। ये हमारी शुरुआती कोशिश है।

मुस्लिम युवकों का आकर्षण दिन-ब-दिन आईएसआईएस की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में आप उनमें शांति और सद्भाव की भावना कैसे पैदा करेंगे?

देखिये, ये सब धर्म के नाम पर हो रहा है तो धर्म के लोग ही इसे सुधार सकते हैं। धार्मिक गुरुओं की जिम्मेदारी बनती है कि धर्म के नाम पर जो गलत हो रहा है उसके लिए हम आवाज उठाएं। इस आवाज को उठाने के लिए हमारी कोशिश ये होनी चाहिए कि मस्जिद एक ऐसी जगह है जहां एक साथ मुस्लिम समाज नमाज अदा करने के लिए जुटता है। रोज नहीं भी आते हैं तो शुक्रवार को तो जरूर आते हैं। ऐसे वक्त में जब बड़ी तादद में लोग वहां जमा होते हैं तो  मस्जिद के इमाम की जिम्मेदारी बनती है कि वे मुस्लिम युवकों को सही-गलत का फर्क समझायें। अब हम सरकार के साथ मिलकर और भारत के सभी समाज के लोग मिलकर आगे आयेंगे तभी ये संभव होगा। इन लोगों को रोकने के लिए सभी यह सोचते हैं कि ये सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है, इसके लिए हम सब को साथ मिलकर आगे आना होगा, तभी ये संभव हो सकेगा।

मुस्लिम धर्म के दूसरे संगठन इस दिशा में क्या योगदान कर रहे हैं?

अभी तो सरकार से चर्चा हुई है। इस शुरुआत के महज कुछ दिन ही हुये हैं, वक्त लगेगा हमें अभी। हमारे साथ और भी दूसरे संगठन आगे आये हैं। मुझे लगता है ये जो प्रयास हमने मिलकर शुरू किया है वो आगे बढ़ेगा, मगर हमें इस पर ईमानदारी से और मेहनत से काम करना होगा। जब हम अल्लाह के पास जायेंगे तो हम क्या कहेंगे कि हमने अपने लिये तो सब कुछ किया अच्छा पहना, अच्छा खाया, अपने रिश्तेदारों के लिए अच्छा किया, अपने समाज के लिये अच्छा किया, लेकिन अपने देश के लिए क्या किया? देश हमारा घर है, हमारे घर में परेशानी आयेगी तो हम भी परेशान होंगे। इसलिए मैं तमाम अपने हिंदुस्तानियों से गुजारिश कर रहा हूं कि हमारे नौजावानों को सही दिशा दिखायें। इसके लिए मस्जिद एक सही जगह है। हमारे लिये इंसानियत और देश पहले है। इसके लिये मैं उन सभी संगठनों से अपील करूंगा कि वे आगे आयें और हमारा सहयोग करें।

हिंदुस्तान के मुस्लिम संगठन आपका साथ देने को तैयार हैं,  लेकिन क्या अरब मुल्क जो इस्लाम का गढ़ हैं वह भी आतंक को रोकने के लिए किसी तरह की मदद करेंगे?

देखिये, अभी तक हमारी हिंदुस्तान के बाहर के संगठन से कोई बात नहीं हुई है। अलबत्ता हमें तो भारत सरकार के गृह मंत्री ने बुला कर इस मुद्दे पर चर्चा की थी। इसमें मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी और जो बड़े संगठन हैं खासतौर पर जमियत उलेमा हिंद, जो कि मदरसों का बड़ा संगठन है, ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन, जो मस्जिदों का बड़ा ऑर्गेनाइजेशन है और दूसरे संगठनों को भारत सरकार ने एक साथ लाकर बातचीत की और  हमारा नजरिया समझने की कोशिश की। ये जानने की कोशिश की कि देश में इस तरह के हालात हैं तो इनसे किस तरह निपटा जाये। इसके सिवाय मुस्लिमों संगठनों और सरकार के बीच जो गैप है उसके सिलसिले में भी बातचीत हुई। ये गृह मंत्रालय का पहली अच्छी पहल थी। उन्होंने इस चीज को समझा की हमें मिलजुल कर बातचीत करने की जरूरत है। इससे हमारी भावनाएं भी उन तक पहुंचती हैं। इससे अच्छा समन्वय बनता है, राष्ट्र मजबूत बनता है, राष्ट्रीयता मजबूत होती है।

आईएसआईएस की तरफ मुस्लिम युवाओं का बढ़ता आकर्षण देश के लिये कितनी बड़ी चुनौती है?

आपने देखा होगा कि कुछ वक्त पहले इन्होंने कश्मीर में अपना झंडा लहराया। या कहीं भी दूसरी जगह अपना झंडा लहराते हैं। इसका मतलब है कि वो हमें बता देते हैं कि उनकी प्रोग्रेस हो रही है। हम अपने देश के लिए वफादार हैं। इस्लाम में हुब्बल वतनी मिनल ईमान का हिस्सा है, जिसका अर्थ है वतन से मुहब्बत ईमान का हिस्सा है। हम जिस देश की खाते हैं, जिस देश में रहते हैं उसका ध्यान रखते हुए, हमें अपने ईमान को ध्यान में रखते हुए, अपने देश के साथ बैर नहीं करना चाहिए। जो लोग नौजवानों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं वह सोशल मीडिया से या और कहां से उनके संपर्क में हैं, ये हमें पता करना होगा और हमें इस पर काम करना होगा, ताकि हम सब लोग उन बुराइयों को जो वायरस की तरह हमारे देश में फैल रही हैं उन्हें रोक सकें। ये हम धर्मगुरुओं की जिम्मेदारी है। इसमें दूसरे धर्मगुरुओं को भी जुडऩा चाहिए, ताकि देश की एकता, अखंडता, भाईचारा कायम रहे। नफरत खत्म हो और हमारे बीच भाईचारा बढ़े,  हमारे  भारतीय संस्कार बने रहें। पार्टियां आती-जाती रहती हैं पर हमें अपने संस्कार नहीं भूलने चाहिए।

अकबर ने दीन-ए-इलाही बनाया था। क्या हिंदू धर्मगुरु और मुस्लिम धर्मगुरु भी शांति और सद्भाव के लिए मिलकर ऐसा कुछ करने का सोच रहे हैं? क्या आप इसका नेतृत्व करेंगे?

बहुत अच्छी बात पूछी आपने। कुछ समय पहले हमारी राजनाथ जी से बातचीत हुई थी। उसमें हमने उन्हें एक राय दी थी कि जिस तरह से मुजफ्फरनगर में हिंदू, मुस्लिम फसाद हुआ, फसाद होते ही वहां कफ्यू लगा दिया गया। हिंदू, मुसलमानों के हालात खराब हो गये। हम वहां स्वामी चिदानंदजी, आचार्य लोकेश मुनिजी, बंगला साहिब के चेयरमैन और ईसाइयों के धर्म गुरुओं को लेकर फौरन पहुंचे। इसका फायदा यह हुआ कि सभी धर्म गुरुओं ने वहां जाकर भाईचारे का पैगाम दिया,  जिससे सभी लोग साथ में आ गये और दंगा शांत हो गया। वहां अमन और शांति कायम हो गई। जिन्हें ये दंगा फैलाना था उन्होंने फैलाया। लेकिन, हम सभी धर्मगुरु शांति कायम करने के लिए एक साथ खड़े हुए तो इसके परिणाम भी देखने को मिले। ये उदाहरण देते हुए राजनाथ जी से कहा कि एक ऐसी कमेटी बना देनी चाहिए, जिसमें सारे धर्म के दो-दो धर्मगुरु मौजूद रहें। इस तरह केंद्र सरकार की एक धर्मगुरुओं की हाईपावर कमेटी बना देनी चाहिए। इसका फायदा ये होगा कि जब भी कहीं हिंदू-मुस्लिम फसाद होगा तो ये कमेटी तुरंत वहां अमन कायम करने के लिए पहुंच जाएगी। जैसे फसाद होते ही वहां रैपिडे एक्शन फोर्स पहुंच जाती है, अगर दंगा इससे भी काबू में नहीं आता तो आर्मी फोर्स पहुंच जाती है। वैसे ही ये कमेटी भी वहां पहुंचेगी और शांति कायम करेगी। आज देश को असल जरूरत इसी बात की है कि सभी धर्म के धर्मगुरु एक मंच पर आकर भारतीयता और भारतीय संस्कारों को कायम रखने में मदद करें। इससे सभी का भला होगा।

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