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दुनिया भर में फैला आईएस का आतंकी साया

दुनिया भर में फैला आईएस का आतंकी साया

फ्रांस के शहर नीस में आईएसआईएस के हमले में 84 लोगों की हत्या ट्रक से कुचलकर की गई।  रमजान के दौरान सऊदी अरब में इस्लाम के पवित्र शहर मदीना समेंत तीन शहरों पर फिदायीनी हमला हुआ,  इराक की राजधानी बगदाद में 300 लोग आईएस के आतंकी हमले में मारे गए,  बांग्लादेश में हुई आतंकवादी वारदात में 20 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी गई,  इससे पहले इस्तांबुल में विमानतल पर फिदायीनी हमले में 32 लोग मारे गए, अमेरिका के ओरलैंडो में गे क्लब पर हमले में 50 लोगों की मौत – ये सभी घटनाएं इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि इस्लामिक स्टेट अब सचमुच में वैश्विक आतंकी संगठन बन चुका है, जो दुनिया के कई देशों में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का अध्ययन करने वाले शोध संस्थानों के मुताबिक आईएस ने इराक और सीरिया के अलावा 21 देशों में 75 हमले किए, जिसमें 1500 के लगभग लोग मारे गए और 2000 जख्मी हुए। अपने स्वरूप को वैश्विक बनाने के लिए आईएस ने अलकायदा की तरह का फ्रेंचाइजी आतंकवाद विकसित किया है। जिसमें आतंकवादी वारदातों को सहयोगी संगठनों को आऊटसोर्स किया जाता है। बांग्लादेश के ढाका में हुए आतंकी हमले इसकी मिसाल हैं।

हालांकि पिछले कुछ समय से इस्लामिक स्टेट अपने दुश्मनों से घिर गया है। रूस, पश्चिमी सैनिक गठबंधन और अरब देशों के आसमान से बरसती  हजारों मिसाइलों के कारण इराक और सीरिया की  अपनी जमीन पर ही हालत खस्ता है। वह इराक में 45 प्रतिशत और सीरिया की 20 प्रतिशत जमीन खो चुका है, मगर इसका बदला चुकाने के लिए वह दुनियाभर में आतंकवादी वारदातों को अंजाम देकर कई देशों को दहला रहा है। हाल ही में हुई बांग्लादेश की आतंकी वारदात और उससे एक हफ्ते पहले इस्तांबुल में हुई घटना ने स्पष्ट कर दिया कि आईएसआईएस ने दुनिया के कई देशों में अपने सेल्स स्थापित कर लिए हैं। जिनके जरिये वह आतंकी हमले करने में सक्षम है।

 आईएस के दुनियाभर में बढ़ते प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी के निदेशक जॉन ब्रेनान ने विदेशी मामलों की काउंसिल को बताया कि आईएस के हजारो समर्थक मध्यपूर्व से पश्चिमी अफ्रीका और दक्षिण पूर्वी एशिया तक फैले हुए हैं। इसके अलावा वह ऑस्ट्रेलिया, पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में भी आतंकी वारदातें कर चुका है। पिछले कुछ वर्षों में एशियाई देशों में उसकी ताकत बढ़ी है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले बांग्लादेश सरकार आईएस की देश में उपस्थिति से ही इंकार करती रही, लेकिन जब देश में आतंकवाद की घटनाएं होने लगीं तब तो मानना ही पड़ा। जिस आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश ने ढाका की घटनाओं को अंजाम दिया वह हाल ही के समय में आईएस प्रेरित कई वारदातें कर चुका है। दुनियाभर में मौजूदगी के कारण इराक और सीरिया में जमीनी लड़ाई में अपनी हार का बदला आतंकवादी तरीकों से हमले करके लेता है।

ज्यादातर आतंकी हमले वह अपने सहयोगी संगठनों द्वारा कराता है। सहयोगी संगठन वे होते हैं, जो सार्वजनिक तौर पर आईएस के प्रति अपनी वफादारी का ऐलान कर चुके हैं। अब तक दुनियाभर के 43 संगठन अपनी वफादारी का ऐलान कर चुके हैं। इनमें कई देशों में तो कई संगठनों ने वफादारी का ऐलान किया है। वफादारी का ऐलान करने वाले संगठनों में अफ्रीका के अल शबाब, अल अंसार और बोको हराम जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन हैं। इसके अलावा मिस्र, लीबिया, यमन, अल्जीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, इंडोनेशिया, ट्यनिशिया, नाइजीरिया, फिलीपीन, सूडान, सोमालिया, रूस, सऊदी अरब, उजबेकिस्तान, कॉकेशस के संगठन शामिल हैं। भारत के अंसर अल तौहीद ने तो 2014 के अक्टूबर में ही वफादारी का ऐलान कर दिया था। अब जब दुनिया के कई देशों में आईएसआईएस प्रेरित आतंकी हमले हो रहे हैं तब यह कहा जा रहा है कि केवल आईएस को इराक और सीरिया में घेरने से काम नहीं चलेगा वरन उसके दुनियाभर में फैले सहयोगी संगठनों पर लगाम कसनी जरूरी है और यह काम आसान नहीं है। इनमें कई सारे संगठन तो ऐसे हैं कि वे पहले अलकायदा से जुड़े हुए थे, मगर जब उन्होंने आईएस का दबदबा बढ़ते देखा तो चढ़ते सूरज को सलाम करने में ही खैरियत समझी। आईएस इन सहयोगी संगठनों को विलायत कहता है। इस अरबी शब्द का मतलब होता है प्रांत। इन प्रांतों के जरिये आईएस के हाथ दुनिया के सुदूर हिस्सों तक पहुंच चुके हैं। रूसी विमान के क्रेश में जिसमें 224 लोग मरे उसे न तो आईएस ने कराया था, न ही वह लोन वोल्फ  की करतूत थी, वरन उसे सहयोगी संगठन ने अंजाम दिया था। इन दिनों इराक और सीरिया के बाद आईएस अगर सबसे ज्यादा ताकतवर है तो लीबिया में। वहां उसके सबसे ज्यादा यानी 6000 लोग हैं। कर्नल गद्दाफी के बाद लीबिया में भी गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। कई इस्लामी चरमपंथी सरकार को उखाडऩे में जुटे हैं। उन्होंने कुछ इलाकों पर कब्जा भी कर लिया है। जहां उन्होंने मिनी खिलाफत बना ली है और इस्लामी कानून लागू कर दिया है। इस तरह वे आईएस का अनुकरण कर रहे हैं। यह भी संभावना जताई जा रही है कि यदि आईएस को इराक और सीरिया का देश छोडऩा पडे तो लीबिया में आईएस के नेता डेरा जमाएंगे। कुछ सहयोगी संगठनों को आईएस आर्थिक मदद करता है और कुछ को केवल नैतिक समर्थन ही दे पाता है। कुछ का केवल आईएस से जुड़ जाने भर से दबदबा बढ़ जाता है।

06-08-2016

यूं तो आईएस ने सोशल मीडिया के जरिये अपनी ग्लोबल पहचान बनाई थी। सोशल मीडिया पर उसके प्रचार से प्रभावित हो कर तीस के लगभग देशों के  हजारों नौजवान वहां पहंचे हुए थे। दुनिया में आतंक फैलाने के लिए और यह साबित करने के लिए कि आईएस अभी खत्म नहीं हुई है आईएस ने लोन वोल्फ  या अकेले आतंकी के रणनीति सफलतापूर्वक अपनाई है। अमेरिका के ओरलैंडों में गे क्लब में 50 लोगों की हत्या इसका सबसे नया उदाहरण है। इस जरिये वह अब तक कई आतंकवादी वारदातें कर अपनी धाक जमा चुका है। यह रणनीति इतनी अचूक है कि इसके बारे में सुरक्षा अधिकारी मानते हैं कि इन्हें रोका नहीं जा सकता। इसे आईएस बड़े पैमाने पर अपनाने की सोच रहा है। पिछले दिनों आईएसआईएस ने एक किल लिस्ट जारी की है जिसमें 8,000 से ज्यादा नाम हैं। सबसे ज्यादा अमेरिकी और फिर कनाडा के नागरिकों के नाम इस लिस्ट में हैं। लेकिन लिस्ट में करीब 285 भारतीयों के नाम भी हैं। वहीं इंटेलीजेंस ब्यूरों के अधिकारियों की मानें तो आईएसआईएस का मकसद इस लिस्ट के जरिए लोगों में डर और दहशत का माहौल बनाना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये लोन वोल्फ  सोशल मीडिया पर किए जाने वाले प्रचार के कारण आईएस से जुड़े हैं। विडंबना यह है कि अपने को इस्लामीक स्टेट कहने वाला आईएस मुसलमानों के लिए ही भस्मासुर बनता जा रहा है। हाल ही के समय बड़ी तादाद में मुसलमान ही उसका निशाना बने हैं। दुनियाभर के मुसलमान रमजान बहुत हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं। लेकिन इस बार इस्लामिक राज्य या आईएस के कारण रमजान का महीना रक्तरंजित रहा। रमजान के दौरान सऊदी अरब में इस्लाम के पवित्र शहर मदीना में फिदायीनी हमला हुआ, इराक की राजधानी बगदाद में 200 लोग हमले में मारे गए, ढाका में 20 लोगों की गला रेतकर हत्याकर दी गई, इस्तांबुल में विमानतल पर फिदायीनी हमले में 32 लोग मारे गए। आईएस ने रमजान के पवित्र महीने को खून बहाकर नापाक कर दिया। अगर ढाका की घटना को छोड़ दें तो बाकी सभी घटनाओं में मारे गए मुसलमान ही थे। फिर इस्लामी कहलाने वाले आईएस ने मुसलमानों की हत्याएं करके क्या हासिल किया? अब आ रही खबरें बताती हैं कि आईएस ने जानबूझकर ऐसा किया। रमजान की शुरूआत में आईएस के प्रवक्ता ने कह दिया था कि यह महीना काफिरों के संकट लेकर आएगा। लेकिन आईएस की नजर में काफिर केवल गैर मुस्लिम ही नहीं है। वरन वे सभी मुसलमान भी काफिर या शिर्क हैं जो इस्लाम में संशोधन कर रहे हैं। इस तरह आईएस ने मुसलमान की परिभाषा ही बदल दी है।

06-08-2016

इराक और सीरिया के एक हिस्से पर बनें इस्लामिक राज्य ने हाल ही में दो साल पूरे कर लिए हैं। इस दौरान आईएस ने जिस तरह नृशंसता का प्रदर्शन किया उससे सारी दुनिया उसे हैवानियत का पर्याय मानने लगी है। रूस, पश्चिमी सैनिक गठबंधन और अरब देशों के आसमान से बरसते हजारों मिसाइलों के कारण उसकी अपनी जमीन पर उसकी हालत खस्ता है। वह इराक में 45 प्रतिशत और सीरिया की 20 प्रतिशत जमीन खो चुका है मगर इसका बदला चुकाने के लिए वह दुनियाभर में आतंकवादी वारदातों को अंजाम देकर कई देशों को दहला रहा है। आईएस की शैतानी हरकतों की मुस्लिम जगत में ही तीखी आलोचना हो रही है। मगर आईएस इस्लाम की उसकी अपनी व्याख्या पर डटा हुआ है। आखिर आईएस चाहता क्या है? क्या है उसका दर्शन? या वह केवल पागलपन भर है।

आईएसआईएस के पीछे मध्यकालीन धार्मिक सोच काम कर रही है। उसके नेता और खलीफा अल बगदादी युद्धशास्त्र का ही नहीं धर्मशास्त्र का भी ज्ञाता है। वह बगदाद विश्वविद्यालय से धर्मशास्त्र का पीएचडी है। आईएस द्वारा वीडियो, और उसकी पत्रिका दबिक और अन्य प्रचार साहित्य को पढऩे पर एक बात उभर कर आती है कि आईएस एक वहाबी आंदोलन है जो इस्लाम के मूलरूप पर विश्वास करता है। उसका मानना है कि  इस्लाम के चौदह सौ साल पहले की पहली पीढ़ी के यानी मोहम्मद और उनके साथियों की सोच और तरीके ही शुद्ध इस्लाम है। इसमें किसी तरह का संशोधन करने का मतलब है कि आप इस्लाम के मूलरूप की शुद्धता पर विश्वास नहीं करते। यह धर्मद्रोह है और धर्मद्रोह की इस्लाम में एक ही सजा है मौत। उसका मानना इस्लाम की पहली पीढ़ी ने जो व्यवस्थाएं पैदा की वे ईश्वरीय व्यवस्थाएं हंै, जबकि अन्य व्यवस्थाएं मानव निर्मित हंै। वह इन मानव निर्मित व्यवस्थाओं को पूरी तरह से नकारता है। यही वजह है कि वह उन इस्लामवादी दलों को भी गुनहगार मानता हैं जो चुनाव में हिस्सा लेते हैं। उसके मुताबिक इस्लाम के दो स्तंभ है खिलाफत और ईश्वरीय कानून शरीया जिसे वह ठीक उस तरह लागू करना चाहते हैं जैसे मोहम्मद और उनके साथियों ने अपने समय में लागू किया था। वैसे आईएस बाकी मुसलमानों के विपरीत इस धारणा को खत्म करना चाहता है कि इस्लाम शांतिपूर्ण धर्म है। उसका कहना है कि इस्लाम से शांति आएगी, मगर इस दुनिया के दारुल इस्लाम बन जाने के बाद। जब बाकी सारे धर्मों को खत्म किया जा चुका होगा।

06-08-2016

कुछ अर्से पहले जानी-मानी पत्रिका- एटलांटिक में अमेरिकी प्रोफेसर ग्राहम वुड  का इस्लामिक राज्य पर लिखा लेख बौद्धिक हल्कों में बहुत चर्चा में था। इस्लामिक राज्य द्वारा किए गए हर फैसले और कानून में वह पैगंबर के तौर तरीकों को अपनाते हैं। यानि मोहम्मद की भविष्यवाणियों और उदाहरणों  तक का पूरी तरह से पालन करते हैं। मसलन आईएस की ऑनलाइन पत्रिका का नाम दबिक (Dubiq) है। दबिक वह जगह है जिसके बारे में मोहम्मद पैंगंबर ने भविष्यवाणी की थी कि इस्लाम की सेनाओं का रोम की सेनाओं से आखिरी युद्ध होगा।

ग्राहम वुड कहते हैं अगर हम इस्लामिक स्टेट जैसी प्रवृत्ति से लडऩा चाहते हैं तो इसके बौद्धिक विकास को समझना होगा। इस्लाम में तकफीर यानी बहिष्कार की अवधारणा है। जिसके तहत एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को धर्मद्रोही कहकर गैर मुस्लिम करार दे सकता है। हर वो मुस्लिम धर्मद्रोही भी है जो इस्लाम में संशोधन करता है। कुरान या मोहम्मद के कथनों को नकारना पूरी तरह से धर्मद्रोह माना जाता हैं, लेकिन इस्लमिक राज्य ने कई और मुद्दों पर भी मुसलमानों को इस्लाम से बाहर निकलना शुरू कर दिया है। इसमें शराब, ड्रग बेचना, पश्चिमी कपड़े पहनना, दाढ़ी बनाना, चुनाव में वोट देना, और मुस्लिमों को धर्मद्रोही कहने में आलस बरतना आदी शामिल है। इस आधार पर शिया और ज्यादातर अरब धर्मद्रोह के निकष पर खरे उतरते हैं। क्योंकि शिया होने का मतलब है इस्लाम में संशोधन करना और आईएस के अनुसार कुरान में कुछ नया जोडऩे का मतलब है उसकी पूर्णता को नकारना। आईएस के मुताबिक शियाओं में जो इमामों की कब्र की पूजा करने और अपने को कोड़े मारने की परंपरा है उसकी कुरान या मोहम्मद के व्यवहार में कोई मिसाल नहीं मिलती। इसलिए धर्मद्रोही होने के कारण करोड़ों शियाओं की हत्या की जा सकती है। यही बात सूफियों पर भी लागू होती है जो सुन्नी हैं। इसी तरह राज्यों के प्रमुख भी धर्मद्रोही हैं। जिन्होंने दिव्य माने जाने वाले इस्लामी कानून शरीया के बाद मनुष्य निर्मित कानून बनाया और उसे लागू किया। इस तरह आईएस इस विश्व को शुद्ध करने के लिए  बड़े पैमाने पर लोंगों की हत्या करने के लिए प्रतिबद्ध है। उसके नजरिए से जो भी मूल इस्लाम में संशोधन करता है वह धर्मद्रोही है इसलिए हत्या ही उसका दंड है। लेकिन अब तक जो जिहाद केवल काफिरों के खिलाफ था उसे आईएस नें मुसलमानों के खिलाफ भी शुरू कर दिया। वह गैर मुस्लिमों की तरह कथित तौर पर धर्मद्रोही मुस्लिमों की भी हत्या कर रहा है।

06-08-2016

इस्लामिक राज्य के लड़ाके इस्लाम के प्रारंभिक युग की सारी बातों को लागू करना चाहते हैं, जिनमें से बहुत सी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में आधुनिक मुसलमान मानना चाहते हैं कि यह उनके धर्म का अपरिहार्य अंग नहीं है। गुलामी, सूली चढ़ाना, सर कलम करना, सेक्स स्लेव आदि मध्य युगीन बाते हैं जिन्हें आईएस के लड़ाके थोक के भाव में आज के जमाने में ले आए हैं। कुरान में साफ तौर पर इस्लाम के शत्रुओं के लिए सूली पर चढ़ाना एकमात्र दंड बताया गया है। ईसाइयों के लिए जजिया और इस्लाम के वर्चस्व को स्वीकार करने का प्रावधान किया गया है। यह नियम पैगंबर ने लागू किए हैं। आईएस के नेता जो पैगंबर का अनुसरण करना अपना कर्तव्य मानते हैं उन्होंने इन दंडों को फिर लागू किया जिनकी कोई परवाह नहीं कर रहा था। हाईकेल कहते हैं कि इस्लामिक राज्य के समर्थकों ने इस्लाम के धर्मग्रंथों को केवल उनके शाब्दिक अर्थ को ही ग्रहण किया। जब इस्लामिक राज्य ने लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया तो कुछ लोगों ने विरोध जताया, लेकिन इस्लामिक राज्य ने कोई अफसोस जताए बगैर गुलामी और सूली पर चढ़ाना जारी रखा। इस्लामिक स्टेट की ऑनलाइन पत्रिका- दबिक- में तो गुलामी की पुनस्थापना पर एक पूरा लेख लिखा है। इस लेख में लिखा गया था – यजदी महिलाओं और बच्चों को शरीया के मुताबिक सींजर में भाग लेने वाले लड़ाकों के बीच बांट दिया गया है। काफिरों के परिवारों को गुलाम बनाकर उनकी महिलाओं को रखैल बनाना शरीया का स्थापित हिस्सा है। अगर कोई कुरान के इन आयतों और मोहम्मद की बातों को नकारेगा या उनका मजाक उड़ाएगा तो इस्लाम का द्रोही होगा।

बगदादी ने अपने भाषण में खिलाफत के बारे में कहा था कि संस्था ने पिछले एक हजार साल से कोई काम नहीं किया। खलीफा का एक दायित्व शरिया को लागू करना है। दूसरा काम है हमलावर जिहाद शुरू करना। इसका मतलब है गैर मुस्लिमों द्वारा शासित देशों में जिहाद को फैलाना। खिलाफत का विस्तार करना खलीफा का कर्तव्य है। वही आजकल आईएस कर रहा है।

इस तरह इस्लामी राज्य के समर्थक लोगों को  इस्लाम की चौदह सौ साल पुरानी दुनिया में ले जाना चाहते हैं, जहां ईश्वरीय कानून शरिया पूरी तरह से लागू होगा। इस सपने की भी दुनिया के कुछ मुसलमानों में अपील है। एक इस्लामी राज्य के समर्थक का बयान अखबार में छपा था कि ईश्वरीय कानून यानी शरिया में जीने का अपना आनंद है। इसी आनंद का आस्वाद लेने दुनिया के कई देशों के हजारों मुसलमान वहां पहुंच रहे हैं। यह बात अलग है कि बाकी लोग इस्लामी राज्य की करतूतों को हैवानियत मानते हैं।

सतीश पेडणेकर

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