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आतंकवाद की बीमारी फैलानेवाला डाक्टर

आतंकवाद की बीमारी फैलानेवाला डाक्टर

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुए आतंकी हमले में एक सनसनीखेज बात सामने आई है। एक हमलावर मुंबई के इस्लामी धर्मप्रचारक डॉक्टर जाकिर नाईक के प्रवचनों से प्रभावित होकर पहले आतंकी बना और फिर उसने  कत्लेआम किया। जाकिर नाईक लंबे समय से अपने कट्टरतावादी प्रवचनों के कारण भारत में भी विवादों के घेरे में रहे हैं लेकिन किसी ने उनके प्रवचनों के इस पहलू पर गौर ही नहीं किया था। लेकिन इस धर्मप्रचारक के आतंकी कनेक्शन को लेकर नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। भारत को दहलाने की साजिश रच रहे आतंकियों को भी जाकिर नाईक के प्रवचनों से  इस्लामी कट्टरतावाद की खुराक मिल रही है। जांच एजेंसी एनआईए की पूछताछ में आईएस के हैदराबाद मॉड्यूल के सरगना माने जाने वाले मोहम्मद इब्राहिम याजदानी ने एनआईए को बताया है कि जाकिर नाईक की प्रवचनों को सुन कर ही उसने आतंक की राह पकड़ी थी। याजदानी 2010 में मुंबई में पूरे 10 दिनों तक डॉक्टर जाकिर नाईक के कैंप में शामिल रहा था, जहां से इसका झुकाव मुस्लिम कट्टरपंथ की ओर हुआ। कैंप से लौटने के बाद याजदानी सीरिया में सक्रिय आईएस के आतंकियों के संपर्क में आया और इसके बाद हिंदुस्तान को दहलाने की तैयारी में जुट गया, हालांकि इस खुलासे के बाद भी सरकार इस विवादित मुस्लिम धर्मगुरू के खिलाफ कुछ कहने से बच रही है। इधर बताया जा रहा है कि जांच एजेंसियां डॉक्टर जाकिर नाईक के वीडियो और चैनल के कंटेंट की गहराई से जांच कर सकती हैं।

जयपुर में पकड़े गए आईएस एजेंट सिराजुद्दीन की गिरफ्तारी के बाद भी ये सामने आया था कि वो जाकिर नाईक के भाषणों से प्रभावित था। अब हैदराबाद में आईएस के मॉड्यूल के मामले में एक बार फिर जाकिर नाईक का नाम विवादों में आने से जांच एजेंसियां सतर्क हैं।

ढाका में हुए आतंकी हमले की जांच में पता चला है कि रेस्तरां पर हमला करने वाले दो हमलावर जाकिर के अनुयायी थे। इस खबर ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि कहीं ये खतरा भारत में भी न आ धमके।

आखिर कौन है जाकिर नाईक? 1965 में मुंबई में जन्मे नाईक ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1991 में इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की थी। कोट-पैंट पहने जाकिर नाईक जब अपना मुंह खोलता है तो जहर निकालता है। बचपन में हकलाने वाले जाकिर नाइक ने मुंबई के टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज से अपनी एमबीबीएस के आखिरी साल में दक्षिण अफ्रीका के इस्लामिक उपदेशक अहमद दीदत का लेक्चर सुना था। ये 80 के दशक के आखिर की बात है। दीदत ने तब दूसरे धर्मों के मुकाबले इस्लाम को महान साबित करके काफी नाम कमाया था। दीदत को देखकर ही जाकिर बड़े इस्लामिक उपदेशक बने। जाकिर का सफर करीब से देखने वाले उनके एक दोस्त ने बताया वह अंग्रेजी में लेक्चर देने वाले दीदत का क्लोन बन गया है। 1991 में जाकिर नाईक ने ‘इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन’ नाम की एक संस्था शुरू की। इस संस्था के बैनर तले उन्होंने इस्लाम और कुरान पर लोगों से चर्चा करना शुरू किया। 15-20 लोगों के साथ शुरू हुआ इस्लाम पर सवाल-जवाब का यह सिलसिला इतनी तेजी से बढ़ा कि देखते ही देखते जाकिर नाईक के श्रोताओं की संख्या हजारों में जा पहुंची। फिर वे मंचों पर से प्रवचन करने लगे और उनके श्रोताओं की तादाद हजारों से लाखों में हो गई। आज ‘पीस टीवी’  ने उनके श्रोताओं की संख्या करोड़ों में पहुंचा दी। जाकिर नाईक ने पीस टीवी नाम के एक टीवी चैनल की भी शुरूआत की थी। इस्लामी रिसर्च फाउंडेशन की वेबसाइट का दावा है कि पीस टीवी का प्रसारण 125 देशों में हो रहा है। एशिया, मध्य पूर्व यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीकी महाद्वीपों में यह चैनल देखा जा रहा है। साल 2006 से इसका भारत में प्रसारण हो रहा था। साल 2009 में पीस टीवी का प्रसारण रोक दिया गया था। साल 2012 में इस टीवी चैनल को हिंदुस्तान में बैन कर दिया गया। अब हिंदुस्तान में इसका प्रसारण नहीं होता, लेकिन दावा किया जाता है कि दुनिया भर के करोड़ो प्रशंसक जाकिर नाईक के भाषणों को फोलो करते हैं। अपने लेक्चर में वे अक्सर इस्लाम और दूसरे धर्मों के बीच तुलना करते हैं।

पिछले कई सालों से वे पूरी दुनिया में घूम-घूम कर इस्लाम पर प्रवचन दे रहा है। यही नहीं जिस रफ्तार से वो पूरी दुनिया में तकरीरें दे रहा है, उसी रफ्तार से उसकी तकरीरों को सुनकर युवक आतंकी गतिविधियों में शामिल भी हो रहे हैं। 2009 में न्यूयॉर्क के सबवे में फिदायीन हमले की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार नजीबुल्ला जाजी के दोस्तों ने बताया कि वो काफी वक्त तक डॉ. नाईक के प्रवचनों को टीवी पर देखता था। 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में आरोपी राहिल शेख भी डॉ. नाईक से प्रभावित था। 2007 में बैंगलोर का एक शख्स कफील अहमद ग्लासगो एयरपोर्ट को उड़ाने की कोशिश करते हुए घायल हो गया। जांच में पता चला कि जिन लोगों की बातों से वो प्रभावित था उनमें से डॉ.जाकिर नाईक भी एक था।

जाकिर नाईक के इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन का मकसद था गैर मुस्लिम लोगों को इस्लाम के बारे में बताना। लेकिन इस्लाम की ऐसी जानकारी जाकिर नाईक परोसने लगा जिसे सुन दूसरे घर्म के लोगों का इस्लाम में दिलचस्पी लेना तो दूर, खुद मुस्लिम लड़के उसके नफरत फैलाने वाले प्रवचन सुनकर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने लगें। 2010 में जाकिर नायक ने कहा था कि मैं सारे मुस्लिमों से कहता हूं कि हम मुसलमानों को आतंकी होना चाहिए। आतंकी मतलब ऐसा आदमी जो पूरी दुनिया में डर फैलाए।

जाकिर नाईक के नाम अपनी सभा में अब तक सबसे ज्यादा लोगों को जुटाने का रिकार्ड है। उनके एक प्रसंशक की मानें  तो बिहार के किशनगंज में एक सभा में करीब दस लाख लोग पहुंचे थे। पूरी दुनिया में अबतक किसी भी धर्मगुरू की सभा में इतनी भीड़ नहीं उमड़ी। जाकिर अपने भाषणों में एक तरफ तो ये दावा करते है कि इस्लाम किसी की हत्या करना नहीं सिखाता। वहीं वो अलकायदा के सरगना रहे ओसामा बिन लादेन का समर्थन करते हुए कहते है कि अगर ओसामा ने इस्लाम के दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई की तो सही किया। अपने इन्ही बयानों कि वजह से जाकिर नाईक ब्रिटेन और कनाडा जैसे कई देशों में घुस नहीं सकता। कई देशों ने उसके अपने यहां आने पर रोक लगा रखी है। ढाका हमले के बारे में  यह खुलासा होने के बाद कि आतंकवादी जाकिर नाईक के विचारों से प्रभावित थे, जाकिर की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जाकिर के खिलाफ देश में प्रदर्शन होने लगे हैं। केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार उसके भाषणों की जांच कर रही है।

06-08-2016इस बीच कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे जाकिर नाईक को शांतिदूत बता रहे हैं। वीडियो 2012 के एक कार्यक्रम का है। इसको लेकर दिग्विजय सिंह ने एक न्यूज चैनल को दिए बयान में कहा है कि हां मैं उस कार्यक्रम में गया था। मैंने वहां सद्भावना की बात की थी। अगर नाईक के बयानों में कुछ गलत है तो सरकार जांच कराए। जाकिर नाईक के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दिग्विजय ने कहा था कि मैंने जाकिर साहब का बहुत नाम सुना था। मिलने का मौका भी मिला और इस बात की खुशी है कि वे शांति का संदेश पूरे विश्व में फैला रहे हैं। शांति से ही प्रगति होगी। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि आज इस बात को स्वीकार करना पड़ रहा है कि कई कारण ऐसे बने जिस वजह से हमारे मुसलमान भाई और बहनों में एक भावना पैदा हुई है कि हमारे साथ इंसाफ नहीं हो रहा जो सही है। इसकी सारी जिम्मेदारी हमारी है। दिग्विजय आगे बोले कि देश में हर धर्म के लोग मिलकर रहना चाहते हैं लेकिन कुछ फितरती लोग हैं जो ऐसा नहीं चाहत। कुछ लोग हैं जो इस्लाम को गलत तरीके से पेश करते हैं। आज जरूरत है कि डॉ. साहब का शांति का संदेश मुल्क के कोने-कोने में पहुंचे। डॉक्टर साहब आप विदेश जाएं लेकिन हमारे मुल्क के उन कोनों में भी जाएं जहां फितरती लोग असुरक्षा बढ़ा रहे हैं। अब जब जाकिर के आतंकवादी कनेक्शन सामने आ रहे हैं तो दिग्विजय सफाई देते घूम रहे हैं।

जाकिर नाईक पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार करते हैं कि इस्लाम सर्वश्रेष्ठ हैं लेकिन जैसे ही दूसरे धर्मों की बात आती है तो फिर वह उनकी कमियां गिनाने लगते हैं। ऐसा ही एक बार उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग के गुरु श्री श्री रविशंकर को अपने कार्यक्रम में बुला कर किया। श्री श्री रविशंकर ने पहले तो कुछ जवाब दिए लेकिन फिर वो चुप हो गए। कार्यक्रम खत्म होने के कई दिनों बाद जब विवाद बढ़ा तो उन्होंने कहा कि रटे हुए कुतर्कों का जवाब वो कैसे देते।

06-08-2016लेकिन मामला इससे शांत नहीं हुआ था। जाकिर नाईक अब रविशंकर का नाम ले लेकर भाषण देने लगे कि हिंदू धर्मगुरु ने मान लिया है कि मूर्ति पूजा की मनाही है। इसके बाद श्री श्री रविशंकर को जवाब देना ही पड़ा। लेकिन यहां पर श्री श्री रविशंकर ने एक सवाल उठाया, ‘मक्का’ में काबा शरीफ का चक्कर लगाना और पत्थर को चूमना वो क्या है? क्या काबा की परिक्रमा मूर्ति पूजा नहीं है? यानी जाकिर नाईक हमेशा अपने तर्कों को सही मानते हैं और दूसरों के तर्कों को गलत ठहराने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। यानि चित्त भी मेरी और पट भी मेरी और उनका यही तरीका उनके विरोध की वजह भी बनता है।

डॉ. नाईक को कट्टरपंथी वहाबी विचारधारा का हिमायती माना जाता है। यही वजह है कि मुसलमानों का एक वर्ग भी इनका विरोध करता नजर आता है। मुंबई पुलिस विवादों में आए जाकिर नाईक के घरों और दफ्तरों के चक्कर लगा रही है। बताया जा रहा है कि मुंबई पुलिस ने इस्लामिक रिसर्च फांउडेशन के दफ्तर से संपर्क किया है।

साल 2007 में जाकिर नाईक ने मुंबई में 10 दिनों के पीस कांफ्रेंस का भी आयोजन किया था। मुसलमानों के बीच इस्लाम का संदेश फैलाने के लिए इन्होंने कई देशों की यात्रा भी की। हालांकि आतंकवाद के मसले पर उन्हें कई बार आलोचना का शिकार होना पड़ा है। कई देशों में तो इनकी एंट्री भी बैन है।- जाकिर नाईक पर ब्रिटेन, कनाडा और मलेशिया में  बैन हैं। एक खबर के मुताबिक, 2015 में सऊदी के किंग सलमान बिन अबुदुक अजीज ने जाकिर को 2015 किंग फैजल अंतर्राष्ट्रीय प्राइज फॉर सर्विस ऑफ इस्लाम दिया। इसमें उन्हें दो लाख डॉलर और एक गोल्ड मेडल मिला।

जाकिर के ऑफिस में उनकी एक बड़ी टीम उनके ईमेल, ट्विटर और फेसबुक अकाउंट को हैंडल करती है। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला नाइक सोशल मीडिया पर भी पूरी तरह एक्टिव रहते हैं और दावा करते हैं कि सिर्फ फेसबुक पर ही उनके 1 करोड़ 40 लाख फॉलोअर्स हैं।

बांग्लादेश जाकिर नाईक के भड़काऊ भाषणों पर प्रतिबंध लगा सकता है। बांग्लादेश के गृहमंत्री असदुजमां खान ने कहा, ‘वे हमारी सुरक्षा जांच के दायरे में हैं…हमारी सुरक्षा एजेंसियां उनकी गतिविधियों की छानबीन कर रही हैं क्योंकि उनके भाषण भड़काऊ जान पड़ते हैं। बांग्लादेश के सूचना प्रसारण मंत्री हसनुल हक इनु ने कहा है कि नाईक के विवादित भाषणों को देखते हुए सरकार उनके चैनल ‘पीस टीवी बांग्लाÓ पर भी प्रतिबंध लगाने की संभावनाओं पर विचार कर रही है।

डाक्टर जाकिर नाईक बुनियादी तौर पर इस्लामी प्रचारक हैं। उनके तमाम भाषणों और प्रवचनों का एक ही मकसद होता है: यह साबित करना कि इस्लाम ही एकमात्र सच्चा और सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इस्लाम को एकमात्र सच्चा धर्म साबित करने के लिए उन्हें बाकी धर्मों को झूठा भी साबित करना होता है। यह काम वे अपने तरीके से करते हैं। दूसरे धर्मो को इस्लाम के मुकाबिल तुच्छ साबित करने के लिए वे  अन्य धर्मो के कुछ सभ्य किस्म के सीधे-साधे धर्माचर्यो को अपने कार्यकर्मो में बुलाते थे और उनके धर्मो की कमियां बताकर इस्लाम की महानता को सिद्ध करने की कोशिश करते थे। आम मुस्लमान दूसरे धर्माचार्यो को लाजवाब होता हुआ देख कर जाकिर नायक से बहुत प्रभावित होते थे। जब उनके प्रशंसकों की संख्या बढऩे लगी तो वे अपने भव्य कार्यकर्मो में धर्मपरिवर्तन भी कराने लगे।

जाकिर नाइक की लोकप्रियता का मुख्य कारण यह है कि वे हर सवाल का जवाब धार्मिक ग्रंथों के हवाले से देते हैं। कई लोगों को उनकी यही विशेषता सबसे ज्यादा लुभाती है कि वे अपने तर्कों को सिर्फ कुरान या हदीस ही नहीं बल्कि बाइबिल से लेकर वेद, पुराण, गीता और उपनिषद तक के उदाहरण देकर सही साबित करते हैं। सिर्फ मुस्लिम धर्म ग्रंथ ही नहीं बल्कि कई धर्मों के ग्रंथ भी जाकिर नाईक ने कंठस्थ कर लिए हैं। वे किसी भी सवाल के जवाब में इन ग्रंथों का हवाला देते हुए उससे संबंधित पेज और पैरा नंबर तक बता डालते हैं।

जाकिर नाइक इस तरह इस्लाम की श्रेष्ठता साबित करते हैं। वे अक्सर कहते हैं कि केवल मुसलमान को ही जन्नत मिलती है। उनसे जब यह पूछा गया कि यदि कोई गैर मुस्लिम सारी उम्र दान-पुण्य का कार्य करे, कोई पाप न करे और मानवता की भलाई के लिए अपने प्राण तक त्याग दे तो क्या तब भी वो जन्नत में नहीं जाएगा? इसके जवाब में जाकिर नाइक कहते हैं, ‘मान लीजिये आपको दसवीं क्लास की परीक्षा देनी है। इस परीक्षा में आपके कुल पांच विषय हैं। यदि आप चार विषयों में पूरे सौ अंक हासिल कर लेते हैं और एक विषय में फेल हो जाते हैं तो क्या आप दसवीं क्लास पास कर पाएंगे? ठीक उसी तरह जन्नत जाने के लिए इस्लाम में विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। जिसे इस्लाम में विश्वास नहीं है, वह चाहे कितनी भी भलाई करे, जन्नत नहीं जा सकता। इस तरह वह लोगों को बताते हैं कि जन्नत पाने के लिए आपका अच्छा होना नहीं मुसलमान होना जरूरी है। बिना मुसलमान हुए स्वर्ग का टिकट नहीं मिलता।

वैसे जाकिर की बातों में कोई नयापन नहीं है। वे वही सारी बातें दोहराते है जो बाकी मुल्ला मौलवी दोहराते हैं। लेकिन जाकिर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं जिससे लोग प्रभावित हो जाते हैं। इसी बात को लीजिए। एक वीडियो में जाकिर नाईक फरमाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मुस्लिम से गैर-मुस्लिम बन जाता है तो उसकी सजा मौत है, यहां तक कि इस्लाम में आने के बाद वापस जाने की सजा भी मौत है। नाईक साहब फरमाते हैं कि चूंकि यह एक प्रकार की ‘गद्दारी’ है इसलिये जैसे किसी देश के किसी व्यक्ति को अपने राज दूसरे देश को देने की सजा मौत होती है वही सजा इस्लाम से गैर-इस्लाम अपनाने पर होती है। इसका एक मतलब यह भी है कि इस्लाम में ‘आना’ वन-वे ट्रैफिक है, कोई इस्लाम में आ तो सकता है, लेकिन जा नहीं सकता ।

 एक वीडियो में वे कहते हैं कि मुस्लिम देशों में किसी अन्य धर्मांवलम्बी को किसी प्रकार के मानवाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिये, यहां तक कि किसी अन्य धर्म के पूजास्थल भी नहीं बनाये जा सकते, सऊदी अरब आदि का उदाहरण देते हुए वे दोहराते हैं कि इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, बाकी सब बेकार हैं। जाकिर नाईक के अनुसार मुस्लिम लोग तो किसी भी देश में मस्जिदें बना सकते हैं लेकिन इस्लामिक देश में चर्च या मन्दिर नहीं चलेगा। इसकी वकालत वे इस तरह करते हैं कि जब आपको पता है कि दो और दो चार होते हैं तो आप ऐसे किसी व्यक्ति को टीचर क्यों रखेंगे जो कहता है दो और दो पांच होते हैं। तो ऐसे होते है जाकिर के बचकाने तर्क। उनकी नजर में धार्मिक स्वतंत्रता तो कोई मुद्दा ही नहीं है। इसके जरिये वे इस्लाम की असहिष्णुता की तारीफ ही करते है।

जाकिर भाई ओसामा बिन लादेन के बड़े हमदर्द हैं। किसी ने उनसे पूछा कि वे ओसामा के बारे में क्या सोचते हैं तो उन्होंने कहा- ‘अगर ओसामा ने सबसे बड़े दहशतगर्द अमेरिका को खौफजदा किया है तो में उसके साथ हूं, चलो अमेरिका तो दहशतगर्द ठहरा सो ठहरा, भारत (जो कि जाकिर भाई का अपना मुल्क है) को धमकाने वाले के खिलाफ जाकिर भाई कुछ क्यों नहीं बोले? इस वजह से भी बहुत से वतनपरस्त मुसलमान उनसे नाराज हैं। देवबंद ने इस बात पर जाकिर नाईक के खिलाफ फतवा भी जारी किया। उसका कहना है कि वे धर्म उपदेशक बनने के योग्य नहीं है क्योंकि इस्लाम के किसी मदरसे में से जुड़े नहीं हैं। जिस तरह वे ओसामा के बारे में पूरा सोचविचार किए बिना बोल गए उसी तरह एक बार रौ में आकर यह भी कह दिया कि हर हिन्दुस्तानी को आतंकवादी बन जाना चाहिए। ऐसी अपील करना आसान है पर जब जांच शुरू हुई और आतंकवादियों के साथ जुड़े होने के आरोप लगने लगे तो अक्ल आई और अब सफाई देते घूम रहे हैं।

06-08-2016

यदि आप उनके भाषणों के कुछ वीडियों सुन लीजिए तो एक बात महसूस होती है कि उनकी बहुत सारी बातें या तो बेसिरपैर की होती हैं या कुतर्क होती है। यह जवाब सुनकर तो आपको हंसी आएगी। किसी ने सवाल किया -इस्लाम में सुअर का मीट खाना क्यों हराम है? वे पूरी विद्वत्ता के साथ जवाब देते हैं। सुअर गंदगी खाता है लिहाजा उसका गोश्त खाने से 70 तरह की बीमारियां हो सकती हैं। साथ ही सुअर खाने के नैतिक और मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में वे बताते हैं, ‘साइंस आज ये कहती है कि सुअर इस प्रथ्वी का सबसे बेशर्म जानवर है। वो एक अकेला जानवर है जो अपने दोस्तों को बुलाता है, अपनी बीवी के साथ संभोग करने के लिए और देखकर खुश होता है। साइंस कहती है कि जो आप खाते हैं उसका असर आपके बर्ताव में होता है। अमेरिका में अधिकतर लोग सुअर खाते हैं। इसलिए वहां अक्सर डांस पार्टियों के बाद वाइफ-स्वैपिंगÓ होती है, यानी बीवियों की अदला-बदली।

औरतों के बारे में जाकिर नाईक के जवाब और चौकानेवाले हैं। एक बार उन्होंने बीवी को पीटने तक का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था बीवी पर हाथ उठा सकते है मगर हल्के से, इस मार के कोई निशान नहीं रहने चाहिए। यह कहकर वे इस्लाम के कट्टरतावादी सोच की वकालत ही करते है।

हर बात पर धर्मग्रंथों के उदाहरण देने की जो शैली जाकिर नाइक ने अपनायी है, उस पर भी सवाल उठते रहे हैं। कई लोग यह दावा कर चुके हैं कि जाकिर नाईक अक्सर इन ग्रंथों का गलत और झूठा संदर्भ देते हैं। इंटरनेट पर जाकिर नाईक से जुड़ा एक वीडियो आसानी से मिल जाता है जिसमें उनके एक भाषण की समीक्षा करते हुए बताया गया कि है कैसे उन्होंने 5 मिनट के वीडियो में 25 गलत हवाले दिए। ऐसे कई वीडियो और भी हैं जिनमें लोग उनसे उनके गलत प्रवचनों का जवाब मांग रहे हैं और वे इन सवालों से बचते नजर आ रहे हैं।

आखिर में वह बात जो तकरीबन आधी मुस्लिम आबादी के जाकिर नाइक से नफरत करने की वजह है, वो है उनका औरतों के प्रति रवैया। उनका कहना है कि औरतों को सदा हिजाब और बुरका पहनना चाहिए। जाकिर भाई एम बी बी एस के ही साथी डॉक्टर यह मानते हैं कि इस तरह के रिवाज औरतों में विटामिन डी की कमी की वजह बनते हैं। मगर इससे उन्हें क्या। इस्लाम पर भाषण देते हुए उनके अंदर का डाक्टर दुबक कर छुप जाता है। जाकिर भाई का मानना है कि औरतों को दफ्तरों में काम नहीं करना चाहिए क्योंकि वहां पर मुमकिन है कि उन्हें गैर मर्दों के साथ अकेले में मिलना पड़े। जाकिर नाइक के मुताबिक केवल वही मर्द किसी औरत के साथ अकेले रह सकता है जो या तो उसका शौहर हो या जिसने उसकी छाती का दूध पिया हुआ हो। जाकिर भाई की नजरों में मर्द का एक से ज्यादा बीवियां रखना जायज है लेकिन इसका उल्टा उन्हें कुबूल नहीं। वह कहते हैं कि दुनिया में औरतें मर्दों से ज्यादा हैं इसलिए ज्यादा बीवियां रखी जा सकती हैं। जाकिर भाई यह यकीन करते हैं कि औरतों का दिमाग मर्दों से कमजोर होता है और इसलिए दो औरतों की गवाही एक मर्द के बराबर होती है। यही नहीं उनका मानना है कि दोजख में जलने वाली ज्यादातर औरतें ही होंगी क्योंकि वे आदमियों के दिमाग फेर देती हैं और धोखेबाज होती हैं।

आज देश और दुनिया में यह जरूरी है कि धार्मिक सदभावना बढ़े यह तभी संभव है जब सभी धर्मों के बीच सद्भाव और मेलजोल बढ़े लेकिन जाकिर नाईक जैसे लोग नफरत फैलाने पर आमादा हैं। वे मुसलमानों से कहते हैं हिन्दुओं से प्रसाद ग्रहण करना हराम है। अपने किसी दोस्त को मेरी क्रिसमस कहकर शुभकामनाएं देना हराम है। यहूदियों के बारे में तो कहते हैं कि वे तो हमेशा इस्लाम के दुश्मन रहे हैं। भगवान बुद्ध ने कभी मूर्तिपूजा का समर्थन नहीं किया इसलिए अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध की मूर्तियां तोडऩा बौद्धों को सीख देने के लिए जरूरी है। इसी तरह दिग्विजय सिंह ने जिस जाकिर नाईक को शांति का दूत कहा था वह असल में नफरत और कट्टरपंथ के दूत है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू उनके बारे में कहते हैं, ‘मैं नहीं मानता कि जाकिर नाईक एक आतंकवादी है, वह एक धार्मिक कट्टरपंथी है लेकिन यह धार्मिक कट्टरपंथ ही आतंकवाद को जन्म देता है।

एक पत्रकार ने लिखा है-जाकिर नायक दूसरे धर्मो को तुच्छ साबित करके इस्लाम को एक महान धर्म के तौर पर पेश करने की कोशिश में ऐसी आग से खेल रहे है जिसमे ना केवल उनका बल्कि मुस्लिम सम्प्रदाय का भी हाथ जल सकता है। मिसाल के तौर पर वे बाइबल से लेकर उपनिषदों में त्रुटियां निकालते है। अगर दूसरे धर्मो का कोई प्रचारक इस्लाम में त्रुटिया निकालने लगे तो क्या सूरत होगी? क्या जाकिर नायक और उनके मानने वाले इस तरह की किसी बहस को तैयार है? यह प्रश्न इसलिए बहुत अहम है क्योंकि जाकिर नायक से बहस करने वाले एक पादरी ने कहा था की वे (जाकिर) तो बाइबल और जीसस में कीड़े निकाल रहे थे क्या मैं भी इस्लाम के लिए ऐसा ही करू? मेरी राय में पादरी का यह सवाल सिर्फ जाकिर नायक से ही नहीं उन तमाम मुसलमानो से है जो जाकिर  के दीवाने हैं।

(उदय इंडिया ब्यूरो)

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