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मैं मच्छर महान

मैं मच्छर महान

मैं मच्छर हूं। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है। तुम्हें इन्सान होने पर शर्म हो सकती है पर मुझे अपने मच्छर होने पर गर्व है।

यह ठीक है कि तुम तो हर दूसरे आदमी को मच्छर कह कर उसकी खिल्ली उड़ाते हो। मच्छर की तरह मसल कर रख दूंगा’’ — जैसे ​​​फिल्मी डायलॉग बोलकर तुम अपनी शेखी बघारते फिरते हो! ऐसा कहकर अपने आपको तीसमारखां जताने की कोशिश करते हो। यदि तुम इतने ही शक्तिशाली हो और मुझे मसलकर रख देने की तुम्हारी हिम्मत है तो फिर स्वयं लड़ाई न लड़कर मच्छर भगााने की क्रीमों का, मच्छरदानियों का, रातभर जलने वाली मैट या लोशनों का सहारा क्यों लेते हो? बहादुर तो तुम बहुत बनते हो। अपने शौर्य के लम्बे—चौड़े किस्से, बड़े-बड़े ग्रंथ लिखते—लिखवाते हो। पर मेरे साथ दो—दो हाथ क्यों नहीं करते? मुझ से क्यों कायरतापूर्वक छिपते फिरते हो कि कहीं मैं न आ जाऊं? मुझ से डर कर अपने घर—दफ्तर के दरवाजे—खिड़कियों में जालियां लगवाते फिरते हो कि कहीं मैं अन्दर न आ जाऊं। कमरों में भी न जाने क्या—क्या जलाते—छिड़कते फिरते हो। पर हे वीर मानव, क्या तुम कहीं भी मुझे रोक पाने में सफल हुये हो? कभी नहीं, कहीं नहीं। मैं तुम्हारी तरह बुजदिल नहीं हूं। तुम्हारी तरह पीछे से वार नहीं करता। पीठ के पीछे से छुरा नहीं घोंपता। मैं आता हूं तो सामने से अपना सीना तानकर मारने—मरने के लिये तैयार होकर। तब तुम अपने आपको बचाने के लिये लगते हो हवा में ही हाथों की तलवारें चलाने, मुझे पकडऩे—मारने के लिये। पर मैं भी तो इतना कच्चा खिलाड़ी नहीं भईया, कि मैं इतनी जल्दी और आसानी से तुम्हारे हाथ आ जाऊं। कई बार तो मुझे मारने के लिये तुम अपने मुंह पर, अपने गालों पर, अपने सिर व माथे पर ऐसे तमाचे जड़ते फिरते हो जैसे कोई पागल हो गया हो और अपने आपको ही मार रहा हो। पर तब भी मैं क्या तुम्हारे हाथ आता हूं? बेवकूफों जैसी तुम्हारी इन हरकतों पर मैं मंद—मंद मुस्कराता हूं तो कभी अट्टहास करता हूं।

पर मैं तुम्हारे हाथों कब आता हूं? मैं तो बचकर निकल जाता हूं। फिर लौट कर आता हूं और भी अधिक जोश और जज्बे के साथ। तुम्हारे द्वारा सताये जाने पर भी मैं बदले की भावना से नहीं आता, घटिया हथियार नहीं अपनाता। तुम्हारे द्वारा सताये जाने पर भी यदि मुझे पीछे से आना पड़े या कभी सोये पर भी वार करना पड़े तो मैं अपने आगमन का शंखनाद पूरी शक्ति से कर देता हूं, ताकि किसी निहत्थे पर वार करने का पाप न लगे। फिर भी यदि तुम अपनी कुंभकरणी नींद से नहीं उठो तो मेरा कसूर नहीं।

वास्तव में मेरी तो आदमी जात से ही दुश्मनी है। मैं तो सदा तुम्हारे साथ युद्ध की स्थिति में रहता हूं। मैं तो तुम्हारे खून का प्यासा हूं और सदा रहूंगा। मैं इन्सान का कितना भी खून क्यों न चूस लूं, पर मैं सदा रहता हूं अतृप्त, सदा प्यासा। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मुझे तो हर हाल में, हर स्थान पर, हर सूरत में तुम्हें काटना ही है। तुम्हारा खून पीना—चूसना है, चाहे कुछ भी हो।

तुम तो हर मरे हुये जानवर व पक्षी का मांस मिर्च—मसाला लगाकर चटकारे लगाकर खा जाते हो। पर मैं जब खून पीता हूं तो स्वयं काट कर जीवित इन्सान का। मैं दूसरे के मारे हुए शिकार का स्वाद नहीं चखता। जिनका लहू साफ नहीं होता, स्वच्छ नहीं होता, मीठा नहीं होता या स्वादिष्ट नहीं होता, मैं उसका खून नहीं चूसता। तुम ने कई लोग देखे होंगे जो हांक मारते हैं कि उन्हें तो मच्छर काटता नहीं। ये वही लोग होते हैं जिनसे मैं नफरत करता हूं। यह तो बस इन्सान ही है जो करेला भी खा जाता है और कड़वे घूंट भी पी जाता है। तुम तो मुझे कमजोर कहते हो पर अपने दिल से पूछो कि तुम कितने बहादुर हो। शेर—बाघ तो क्या, तुम तो एक गीदड़ का भी मुकाबला नहीं कर सकते। हाथी—शेर सामने आ जाये तो तुम्हारे प्राण खुश्क हो जाते हैं। और मैं? मैं उनसे भी नहीं डरता। किसी से नहीं डरता। मैं सीना तान कर उनके सामने जाता हूं। मैं उन्हें भी उसी तरह काटता हूं जैसे कि तुम्हें। मैं उन पर भी पीछे से नहीं सामने से वार करता हूं।

   मेरी पहुंच, मेरी शक्तिका तुम अंदाजा नहीं  लगा सकते। तुम अपनी, अपने देश की  कितनी भी सुरक्षा मजबूत कर लो, लोहे के पर्दे लगा लो, पुलिस खड़ी कर दो, सेना तैनात कर दो, पर मैं सारी सुरक्षा में सेंध लगा कर घुस ही जाता हूं। मैं दुनिया के सब से सुरक्षित अमेरीका के राष्ट्रपति के व्हाइट हाउस भी पहुंच जाता हूं। रूस के राष्ट्रपति के निवास पर तो मैं जब चाहे चला जाता हूं। कोई शाही महल ऐसा नहीं है जो मेरा जाना—पहचाना नहीं है। दुनिया के परमाणु बम का जखीरा कहां—कहां पर है यह मुझे सब मालूम है। पर मेरा आदर्श है। मैं इन्सान की तरह बेईमान नहीं कि कुछ डॉलर और पौंड के चक्कर में आकर एक देश को दूसरे देश के राज बताता फिरूं, पैसे कमाता फिरूं।

ऐसा करने पर मुझे तो इतने पैसे मिल सकते हैं कि मैं अपनी सारी मच्छर जाति का ही कायाकल्प कर दूं। पर मैं इतना गिरा नहीं हूं। मेरे भी कोई आदर्श हैं। हर तीसरे दिन हम अखबारों में पढ़ते हैं कि अमुक व्यक्ति ने अरबों—करोड़ों डॉलर लेकर एक देश को दूसरे देश की गुप्त बातें व दस्तावेज पहुंचा दिये। पर आपने कभी पढ़ा कि किसी मच्छर ने ऐसा घृणित अपराध किया हो? यही है इन्सान और मच्छर में फर्क।

तुम इन्सान जो मर्जी कर लो। चांद पर जा सकते हो। मंगल तक पहुंच सकते हो। पर मेरा मुकाबला नहीं कर सकते। तुम प्रयास करो, फायदा मैं ही उठाऊंगा। जब तुम चांद पर, मंगल पर पहुंच जाओगे तो देखना मैं भी तुम्हारे साथ ही वहां पहुंच जाऊंगा।

मैं यह भी बता दूं कि इन्सान का जीवन भी मेरे बिना अधूरा है। इन्सान को पति का साथ चाहे न मिले मेरा साथ तो सदा मिलेगा और मिलता रहेगा।

तुम तो मेरा मुकाबला किसी भी बात में नहीं कर सकते। तुम बड़े महंगे टिकट खरीदते हो वातानुकूलित राजधानी व शताब्दी ऐक्सप्रेस में सफर करने के लिये। कई बार तो आपको सीट भी नहीं मिलती। पर मैं हूं कि मुझे रेलवे ने बिना टिकट ने खुली छूट दे रखी है कि मैं  जहां मर्जी बैठू और जहां चाहे उतर जाऊं। मुझे कोई टोकने वाला नहीं है। मैं अपनी पसंद का ब​ढिय़ा से बढिय़ा खाना खाता हूं।

अजीब विडम्बना है कि इन्सान में छूतछात है। कोई किसी का जूठा नहीं खाता, यहां तक कि पत्नी अपने पति का भी नहीं। पर हम सभी इन्सान का चखा खाना बड़े शौक से बिना झिझक खाते हैं।

हवाई यात्रा का तो मजा ही कुछ और है। सुन्दर-से-सुन्दर एयरहोस्टेस हाथ जोड़ कर सवारियों का स्वागत करती हैं। पर उनकी यह हिम्मत नहीं कि वह मुझ से टिकट मांग बैठें। उन्हें पता है कि यदि वह ऐसी हिमाकत करेंगी तो मैं उनके गाल पर एक ऐसा टीका लगा दूंगा जैसे कि अस्पताल में परीक्षण के लिये खून लेते हैं। गाल पर ऐसी खुजली पैदा कर दूंगा कि वह गाल को रगड़ती रह जायेंगी और वह लाल हो जायेगा। सब पूछेंगे कि क्या हुआ। वह शर्माती रह जायेंगी। जहाज के अन्दर मैं जहां चाहूं बैठ जाता हूं।

चाहे जहाज हो या रेल, आपको जो मांसाहारी या शाकाहारी भोजन परोसा जाता है पहले मैं ही उसे चखता हूं और आपको परोसे जाने योग्य समझता हूं। फर्क केवल इतना है कि तुम सब चटखारे मार कर खा जाते हो और मैं चुन—चुन कर खाता हूं।

सब से बुरी बात जो इन्सान में है वह है जातिभेद व रंगभेद। पर हमारा समाज इतना महान है कि इसमें कोई भेदभाव नहीं होता। मच्छर चाहे भारत का हो या चीन का या अमेरीका का। चाहे वह जनतंत्र का निवासी हो या तानाशाही का। सब एक होता है, एक जैसा होता है। उस पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। इन्सान तो कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं गुलाम अवश्य रहा पर मच्छर सदैव स्वतंत्र ही रहा है।

मेरे गौरव की गाथायें अनेक हैं। मैं किसी में भेदभाव नहीं बरतता। मैं निर्धन को भी काटता हूं और धनी को भी। छोटे को भी और बड़े को भी। मैंने हिटलर को भी काटा है, चर्चिल को भी, स्टॉलिन को भी, माओ को भी। मैंने भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का खून चखने का गौरव प्राप्त किया है।

इन्सान और मच्छर का तो चोली—दामन का साथ है — जहां आदमी वहां मच्छर और जहां मच्छर वहां आदमी। यही कारण है कि कई सरकारें आईं और चली गईं।

कई नेता आये और चले गये। सब कहते गये कि वह मच्छर का नामोनिशान मिटा देंगे। वह तो चले गये पर मैं मच्छर आज भी हूं और रहूंगा।

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