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मदर टेरेसा की सेवा निस्वार्थ नहीं

मदर टेरेसा की सेवा निस्वार्थ नहीं

By मोहन राव भागवत

आज अपने-अपने तरीके से सब लोग अपनी सेवा दे रहे हैं। मैं अपने तरीके से एक छोटी सी सेवा दे रहा हूं। यहां आकर जो देखेगा, वो सेवा करने वाला बन जाएगा। यहां सेवा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। सेवा की अपनी जो कल्पना है, उसका दर्शन होता है।

युधिष्ठिर महाराज ने युद्ध जीतने के बाद राजसूय यज्ञ किया। यज्ञ में पूर्णाहुति होने के बाद वहां एक नेवला आ गया। नेवला यज्ञ कुंड के आसपास की धुली में लोटपोट होने लगा। उसका आधा शरीर सोने के था। नेवला वापस जाने लगा तो युधिष्ठिर ने उससे पूछा कि यहां क्यों आये थे? यहां लोटपोट होने का मतलब क्या है और वापिस क्यों जा रहे हो? नेवले ने कहा कि आपके यज्ञ से मुझे पुण्य लाभ होगा, ऐसा मुझे लगा, क्योंकि आप बड़े धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध हैं, लेकिन मैं निराश होकर वापस जा रहा हूं। युधिष्ठिर ने पूछा मतलब क्या है? नेवले ने उत्तर दिया, देखो मेरा आधा अंग सोने का बन गया। यह कैसे बन गया? अकाल के दिनों में एक परिवार को खाने को सत्तू मिला, उसी समय परिवार के समक्ष अपना कुत्ता लेकर तथाकथित चांडाल आ गया। उसने खाने को मांगा। पहले गृह स्वामी ने अपना हिस्सा चांडाल को दे दिया, बाद में पत्नी, लड़के सभी ने अपना हिस्सा दे दिया। स्वयं भूखे रहे। फिर चांडाल ने पानी मांगा। पानी पी लिया, अपने कुत्ते को भी सब दिया और वहां से चला गया। परिवार भूखा रहा और परिवार की भूख के कारण मृत्यु हो गई। बाद में मैं वहां गया और वहां की धूल में सना मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। इतना उनका पुण्य था। मैंने सोचा आपके यज्ञ में भी उतना ही पुण्य होगा, लेकिन नहीं मिला।

वास्तव में नेवला युधिष्ठिर को यह बताने गया था कि अपनी सेवा पर गर्व मत करो। सेवा में अहंकार नहीं होता। दुनियादारी में सेवा करना हम लोग बहुत बड़ी बात मानते हैं। माननी भी चाहिये और अनुकरण भी करना चाहिये। हम लोग मनुष्य के नाते जन्म लेते हैं, तो विकारों की गठरी भी साथ में मिलती है। दुनिया की चकाचौंध में खुद को भुलाने वाले हिंदू लोग भी मिलते हैं। इसके चलते बहुत लोग आते हैं और बिना सेवा किये चले जाते हैं। ऐसे जगत में सेवा करने वाले लोगों का सदा प्रोत्साहन करना चाहिये। लेकिन, सेवा करने वाले क्या सोचते हैं, हमने सेवा की तो कौन सा बड़ा काम किया।

मनुष्य को मनुष्य क्यों कहते हैं? मनुष्य वह होता है जो अपने जीवन से दूसरों की सेवा करता है। पशु सेवा नहीं करता। पशु स्वयं के लिए सोचता है। भगवान ने उसको वैसी ही प्रकृति दी है। उसको जन्म मिलता है तो वो सोचता नहीं कि उसको जन्म क्यों मिला। उसे जन्म मिला है और जब तक मौत नहीं आती है, तब तक जीवित रहता है। पशु सदा पशु रहता है, वो शैतान नहीं बनता और न ही वो भगवान बनता है। उसे जहां से रोटी मिलेगी, वहां से खाएगा। अपमान मिले, मान मिले, दूसरों की छीननी पड़े, चोरी करनी पडे तो भी वो खाएगा। भूख लगी है तो खाएगा और भूख नहीं है, तो देखेगा भी नहीं।

मनुष्य के पास बुद्धि है। बुद्धि को स्वार्थ में लगाए तो राक्षस बन जाएगा और परोपकार में लगाए तो नारायण बन जाएगा। ये ताकत दी होने के कारण मनुष्यों के सामने अपनी करनी से नारायण बनने का मार्ग प्रशस्त करने वाले काम जो-जो लोग करते हैं, उनकी हमें सराहना करनी चाहिये तथा उनका सहयोग करना चाहिये। परंतु वो ऐसा नहीं सोचते हैं। वो कहते हैं कि हम मनुष्य हैं तो हम यही करेंगे, पशु थोड़े ही हैं। हमको भगवान ने बुद्धि दी है भगवान बनने के लिये, हम बनेंगे।

मनुष्य के हृदय का गुण है संवेदना, करुणा, प्रेम। उससे दूसरों का दुख नहीं देखा जाता। इसलिए राजा रंती देव से जब पूछा गया कि क्या चाहिए तो उसने कहा मुझे राज्य नहीं चाहिये, ना स्वर्ग चाहिए, न मुक्ति चाहिये। दुखतप्त प्राणियों के दुख को दूर करने के लिये मुझे इसी लोक में जिंदा रखो। अकाल में राजा रंती देव, रानी, राजकुमार, राज कन्या थे, थोड़ा अन्न था। एक भिक्षु आ गया, उसने सारा मांगकर खा लिया। पानी पी लिया, राजा की आंख में आंसू देखे तो कहा कि तुमको बुरा लगता था तो क्यों दिया। राजा ने कहा कि बुरा आपके खाने का नहीं लगा, मेरे पास सब समाप्त हो गया और तुम अभी गए नहीं दरवाजे के सामने से। तुमको अभी अधिक आवश्यकता होगी और तुमने मांग लिया तो मेरे पास है नहीं कुछ देने के लिये, इसका दुख है। इसी दौरान इंद्र देव प्रकट हो गये और बोले तुम्हारी परीक्षा ली थी, जिस पर तुम पूरा उतरे। बोलो तुम्हें क्या चाहिये, कौन सा लोक चाहिये। इच्छानुसार तुम्हें जो पद चाहिये वो मिलेगा। राजा ने कहा भगवान ये सब नहीं चाहिये। दुखतप्त प्राणियों के दुख को दूर करने के लिये मुझे इसी लोक में जिंदा रखो, ले मत जाओ, जिंदगी ऐसी चाहिये।

हमारे यहां सेवा ऐसे की जाती है, कुछ नहीं चाहिये। जो दुखी है, उसका दुख दूर करना। मदर टैरेसा की जगह यहां नहीं होगी। उनकी सेवा बहुत अच्छी होती होगी, लेकिन उसके पीछे एक उद्देश्य रहता था। जिसकी सेवा होती थी कि वह कृतघ्नता से इसाई बन जाए। सेवा की आड़ में ऐसा किया जाता है तो उस सेवा का अवमूल्यन हो जाता है। हमारे यहां तो ऐसा कुछ नहीं है। हमारे देश में सेवा ऐसे की जाती है, निरपेक्ष, पूर्ण निरपेक्ष। उसमें भावना यह कि जिनकी सेवा की जाती है वह मानते होंगे कि सेवा करने वाले के रूप में भगवान मिला, लेकिन सेवा करने वाला कहता है कि सेवा का अवसर देकर मेरे जीवन को स्वच्छ करने वाला भगवान मेरे सामने है। मैं इनका उद्धार नहीं कर रहा हूं, पर ये मुझे सेवा का अवसर देकर मेरे जीवन का उद्धार करने के लिये एक सुविधा दे रहा है, एक साधन दे रहा है।  समाज में ऐसी संवेदना जब हम एक दूसरे के प्रति रखते हैं तो फिर उस समाज को कोई तोड़ नहीं सकता। उस समाज को कोई गुलाम नहीं कर सकता। उस समाज का सर्वथा दुनिया में भला ही होता है। अगर अपने देश के लोगों के बारे में कुछ षड्यंत्र चल रहे हैं, और अपने देश के होने के बावजूद हममें कोई संवेदना नहीं, वहां जाएंगे नहीं तो फिर जो होना है, वो होता है। हां, जाने में कभी ताकत रहती है, कभी नहीं रहती है। कई बार जाने की परिस्थिति रहती है, कई बार नहीं रहती है।

मेरा जीवन मेरे लिये नहीं है। मेरा जीवन मेरे अपनों के लिये है और ऐसा आदमी बनाना यह सर्वश्रेष्ठ सेवा है। चारों प्रकार की सेवाओं का एकत्रित दर्शन यहां मिल रहा है। जिनका अभाव है, उनका अभाव दूर करने का प्रयास करना। अभाव दूर होने के बाद उन लोगों के मन में आ रहा है कि हम भी इसी काम में लग जाएं। एक जगह केवल दो व्यक्ति सेवा नहीं कर रहे हैं, धीरे धीरे इसका विस्तार कर रहे हैं, ताकि सब लोग इसको करने लगें। इसमें से हम भी शिक्षा ले रहे हैं कि यह करना चाहिये, मुझे भी करना चाहिये। शिव भावे सेवा वाले स्थान पर कार्यों का दर्शन हमने कर लिया तो समझो जीवन में पवित्रता आ गई, और यदि हम भी उसी काम में लग जाएंगे तो तीर्थ में डुबकी लगाकर तीर्थ रूप हो जाएंगे।

(भरतपुर, राजस्थान में दिए गए लेखक के भाषण पर आधारित)

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