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घाटी में हिंसा

घाटी में हिंसा

आतंकवादी बुरहान बानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी में हिंसा का दावानल भड़क उठा है। कश्मीर में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों के 1671 जवानों के घायल होने के मद्देनजर 1948 प्रदर्शनकारियों का घायल होना अधिक नहीं कहा जाएगा। अगर किसी दूसरे देश में ऐसा कुछ होता तो यह आंकड़ा काफी ज्यादा होता, सिर्फ इसलिए नहीं कि अधिक घातक हथियारों का इस्तेमाल हुआ होता, बल्कि इसलिए कि जिस पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुआ, वह किसी भी पैमाने से कमतर नहीं है। आतंकवादी प्रदर्शनकारियों को ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और सुरक्षा बलों पर हथगोले फेंक रहे हैं। इस सच्चाई को तथाकथित सेकुलर मीडिया लोगों के सामने नहीं ला रहा है।

साथ ही आतंकियों से सहानुभूति रखने वाले पाकिस्तानी और दूसरे लोगों का भी खुलासा हो गया है कि वे पत्थरबाजों को शह देने और पैसे से मदद करने में जुटे हुए हैं। ‘सेकुलर’ मीडिया उन बेकसूर जवानों की बात नहीं कर रहा है जो अपनी ड्यूटी निभाने के लिए देशहित में अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं। भला उनकी गलती क्या है? उनसे क्या अपेक्षा है? वे संयम बरतें, जब इन बहादुर जवानों का सामना पत्थरबाजों और हथगोला फेंकने वालों से होता है तो उस हालात में किसी जवान से क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वह जवाब न दे?

आखिर इस देश में ‘सेकुलर’ मीडिया जवानों का साथ क्यों नहीं दे रहा है? क्यों पत्थरबाजों की निंदा नहीं की जाती है? यह तो फैशन जैसा बन गया है कि उस हर किसी की हिंसा का बचाव किया जाए जो हिंदू नहीं है। चाहे हिंसा और ‘गुस्से’ की जो वजह हो, पहले तो उसकी निंदा होनी चाहिए। क्या पत्थरबाजी जायज है? क्या देश में हर घटना के बाद ऐसा ही कुछ किया जाना चाहिए? क्या हम बांग्लादेश में मारे जाने वाले हिंदुओं के खिलाफ पत्थरबाजी शुरू कर दें? यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि देश में कई लोगों के लिए इन घटनाओं को जायज ठहराना पेशा-सा बन गया है। ये लोग देश की खुशहाली से नफरत करते हैं और उसके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन आरामतलब लोगों को सुरक्षा मुहैया कराने वाले जवानों या उस देश की कतई चिंता नहीं है जो उन्हें भोजन मुहैया कराता है। कोई और देश होता तो ऐसे लोगों पर ताले जड़ देता,  लेकिन भारत अहिंसक और सहनशील है इसलिए ये अपनी बेहद निंदनीय हरकतें पूरी निर्लज्जता से जारी रखे हुए हैं। हम सभी कश्मीरियों के इस रवैए से हैरान हैं कि कैसे एक आतंकी को हीरो बना दिया गया है। उसी कश्मीर में भारतीय प्रशासनिक सेवा में अव्वल स्थान पाने वाले शाह फैसल जैसे पहले कश्मीरी भी हैं जो युवाओं को  पढऩे-लिखने की प्रेरणा दे रहे हैं और दूसरी ओर बुरहान बानी जैसे भी हैं।

कोई समाज उसी तरह की पुलिस (या सुरक्षा) हासिल करता है जिसके वह लायक है। शांतिपूर्ण समाज में पुलिस आम तौर पर शांत रहती है और सेना को कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए नहीं उतरना पड़ता है। लेकिन जिस समाज का एकमात्र मकसद आतंकवाद ही हो, वहां पुलिस को कड़ाई से पेश आना होगा और सेना को बैरकों से बाहर आना होगा। घाटी में जो लोग सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, वे बार-बार यही साबित करते हैं कि वे पीठ में छुरा भोंकने वाले हैं। उन्हें तब सुरक्षा बलों से मदद लेने में कोई झिझक नहीं हुई, जब पूरी घाटी में बाढ़ तबाही मचा रही थी। लेकिन जब जिंदगी पटरी पर आ गई तो वे निर्लज्ज होकर सुरक्षा बलों पर हमला बोलने लगे। तथाकथित सेकुलर मीडिया लंबे समय से कश्मीरी अलगाववादियों का समर्थन कर रहा है। यह जानना दिलचस्प होगा कि क्या इन मीडिया वालों के परिजन सुरक्षा बलों में हैं। ज्यादातर संभावना यही है कि ऐसा कोई नहीं होगा, क्योंकि ये मीडिया वाले पैसा तो यहां से बनाते हैं और अब खुद को ‘बुद्धिजीवी’ साबित करने के लिए हर राष्ट्र विरोधी गतिविधि का समर्थन करते हैं।

हिंसक भीड़ पर काबू पाना आसान नहीं होता। फिर भी सुरक्षा बलों की ड््यूटी है कि यथासंभव न्यूनतम घातक हथियारों के साथ उसका सामना करें। अब सवाल उठता है कि ड्यूटी निभाते वक्त दो विपरीत स्थितियों में कैसे संतुलन कायम किया जाए? भीड़ को काबू में करने की प्रक्रिया के जानकार कानून पालन कराने वालों को सख्त रुख आखिरी उपाय के रूप में ही अपनाना चाहिए। जो लोग हिंसक घटनाओं में शामिल हैं, उन पर भी इसका दोष जाता है। ऐसी तस्वीरें आम हैं कि पत्थरबाज सुरक्षा बलों पर निर्ममता से हमला करते देखे जाते हैं। हिंसक भीड़ का सामना करने की ये सामान्य दिक्कतें हैं, लेकिन ऐसी रिपोर्टें बेहिसाब दिखती हैं जिनमें कहा जाता है कि हिंसक भीड़ के साथ नरमी से पेश आना चाहिए, भले ही इस चक्कर में सुरक्षा बलों को अपनी जान गंवानी पड़े।

आइए जरा रिकॉर्ड पर गौर करें। 2010 में चार महीने तक पत्थरबाजी और उत्पात के दौरान भड़की हिंसा में सुरक्षा बलों की तुलना में पत्थरबाजों के घायल होने की तादाद मामूली थी। मुझे पूरा यकीन है कि जब हिंसा थम जाएगी तो वही आंकड़ा फिर उभरेगा। इसलिए ऐसे संपादकीय पढ़कर क्षोभ होता है कि हमलावरों के सामने तो राज्य को नरमी बरतनी चाहिए मगर ‘ज्यादतीÓ के लिए सुरक्षा बल  दोषी हैं। श्रीलंका में एलटीटीई के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का समर्थन, लेकिन जम्मू-कश्मीर में ‘घुटनों के नीचे गोली चलाने’ की मांग करना पाखंड है। आखिर यह किसी बाजार या पर्व-त्यौहार पर भीड़ को काबू में करना नहीं है, बल्कि पतथरबाजों की भीड़ को काबू में करना है जो आप पर जानलेवा हमले करने पर उतारू हैं। इसलिए जरा ध्यान से सोचने की दरकार है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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