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अपेक्षा

अपेक्षा

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो अन्य सभी प्राणीयों से स्वभाव, हाव-भाव और मानसिकता में भिन्न है। हम अनेक गुणों के अधिकारी हैं। भगवान ने प्रत्येक मनुष्य को  ऐसे गुण दिए हैं कि उसके द्वारा वह महान बनते हैं। कोई-कोई मनुष्य तो इतनी प्रतिभा  के अधिकारी होते हैं कि वह अन्य मनुष्यों से खास नजर आने लगते हैं। लेकिन सोचने का विषय यह है कि समस्त अच्छाईयों के बाद भी  मनुष्य खुश क्यों नहीं रह पाता? यदि सुख पाने का प्रयास करते हैं, तो पूरा जीवन बीत जाता है, लेकिन असली सुख का अनुभव नहीं कर पाते हैं। कुछ मनुष्य तो क्षणिक सुख को सुख मान बैठते हैं। जिसकी वजह से उनके मन में दुख जन्म ले लेता है। हम चाहे कितने भी ज्ञान के अधिकारी क्यों न हों, लेकिन अपने स्वभाव के कारण हम हमेशा एक असंतोष के भाव में जीते रहते हैं। हमारे अंदर छुपे अवगुण जैसे ईष्र्या, असहिष्णुता, किसी की उपेक्षा करना, हमें दुख के रास्ते पर ले जाता है। देखा जाए तो ये समस्त अवगुण जो हमारे मन को प्रताडि़त करते हैं, प्रत्यक्ष रुप से हमारे जीवन में कोई प्रभाव नहीं डाल पाते हैं। जैसे कई बार किसी का अच्छा हो तो हम दुखी हो जाते है, जो हमारी मूर्खता ही है। कभी-कभी  शारीरिक यंत्रणा हमें प्रत्यक्ष रूप से दुखी करती है, लेकिन शारीरिक यंत्रणा कम समय के लिए होती है और शारीरिक कष्ट मनुष्य को अधिक दुखी नहीं कर पाता है, लेकिन ऐसा जरूर होता है कि उसका दुख ही उसके शारीरिक कष्ट का कारण बनता है। इसी प्रकार अनेक कारण जो हमें सुख पाने से निवृत करते हैं उनमें से अधिकतर ‘अपेक्षा’ की बात करते है।

 देखा जाए तो ‘अपेक्षा’ एक प्रकार की व्याधि है जो एक बार मन में बैठ जाए तो आसानी से नहीं जाती। धीरे-धीरे इतनी बढ़ जाती है कि हमारे दुख का कारण बन बैठती है, यह हमें रोगग्रस्त कर देती है।

शिशु जब पैदा होता है उसी क्षण माता-पिता के मन में उसके लिए अपेक्षा का जन्म होता है, माता-पिता सब कुछ भुलकर शिशु की परवरिश करते हैं फिर भी कहीं-न-कहीं उनके मन में अपेक्षा बढ़ती जाती है। जब बाद में उससे थोड़ा सा भी व्यतिक्रम होता है वह माता-पिता को दुखी कर देता है। बच्चों से अपेक्षा रखना उनका अधिकार है, लेकिन वह उनकी मानसिकता नहीं होनी चाहिए। जब हम किसी से कोई संपर्क बनाते हैं उस समय हम कुछ देकर या कुछ करके रिश्ते की शुरुआत करते है, उसी क्षण हमारे मन में अपेक्षा जन्म लेती है। सबका स्वभाव एक जैसा नहीं होता है या सबके हालात भी समान नहीं होते हैं। जब हमें सामने वाले से जितनी अपेक्षा करते हैं उतना नहीं मिलता तब भी हम दुखी हो जाते हैं।

जब हम अपने से कम सामर्थ व्यक्ति की मदद करते हैं या उसकी कुछ सेवा करते हैं तो उस समय हमारे मन में उससे किसी तरह की अपेक्षा नहीं रहती, लेकिन उससे तारीफ और समाज से बड़ी-बड़ी सुनने की अपेक्षा रहती है। हम हमेशा सामने से जितने की अपेक्षा करते हैं उतना अधिक मिल नहीं पाता है यह हमारे दुख का कारण बनता है। अपेक्षा रहित कार्य वास्तविक रूप से बहुत कठिन है, लेकिन आदत के द्वारा हम ऐसी स्थिति में आ सकते है। प्रकृति की हर वस्तु केवल हमें कुछ बेहतर करने की ही सीख देती है। जैसे सूर्य आलोक देता है, बादल बारिश देते हैं, पेड़ फल और छाया देते हैं। ये सब हमसे कभी अपेक्षा नहीं करते। बिना अपेक्षा रखकर देने से अथवा कुछ भी करने से दिनों-दिन हमारा हृदय विस्तृत होता है और वस्तुत: हृदयवान व्यक्ति को दुख स्पर्श नहीं कर सकता है।

उपाली अपराजिता रथ

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