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क्या आंसू ही मेरा जीवन है?

क्या आंसू ही मेरा जीवन है?

आज हमारे समाज में रेप जैसे शर्मनाक जुर्म आये दिन घटित होते रहते हैं। कुछ लोग इन घटनाओं के लिये पुरूष मानसिकता को दोषी ठहराते हैं, तो कुछ लोग महिलाओं और युवतियों के पहनावे को। दोषी कोई भी हो लेकिन इस जुर्म की सजा हमेशा लड़कियों को ही भुगतनी पड़ती है। युवतियां भले ही आज के दौर में मुक्त वातावरण में सांस ले रही हैं, लेकिन एक अनजाना डर उन्हें हमेशा सताता रहता है। बलात्कार जैसे शर्मनाक जुर्म को समाज में बढ़ता देख कर हम सब चिंतित हो जाते हैं, लेकिन उस युवती का क्या दोष जिसके साथ यह घटना घटित हुई है। इस घटना के जख्म जितने गहरे तक उसे मिलते हैं उससे कहीं ज्यादा दर्द समाज के लोग उसे दे देते हैं। समाज के लोग इस घटना पर दुख जरूर व्यक्त करते हैं लेकिन उस युवती के साथ इंसाफ नहीं करते जो बलात्कार के बाद की पीढ़ा को लेकर जी रही है। बल्कि उल्टा समाज की दुहाई दे कर उन लाचार और बेबस लड़कियों पर एक और जुर्म तब कर दिया जाता है। जब उनकी शादी उसी व्यक्ति से कर दी जाती है, 14-08-2016जिसने उनके अरमानों और ख्वाबों को चकनाचूर कर दिया है। समाज के दकियानूसी विचारों के आगे अपने आप को बेबस पाते हुए अपनी जिंदगी के साथ समझौता करना पड़ता है।

मेरे आंसुओं को जुबान दे दो

लेखिका                  : कौसर वसीम

प्रकाशक             : रिगी पब्लिकेशन

मूल्य                      : 170 रु.

पृष्ठ                        : 102

लेखिका कौसर वसीम की पुस्तक ‘मेरे आंसुओं को जुबान दे दो’ ऐसी ही एक युवती तमन्ना की कहानी है जो अपने मां-बाप की इकलौती होनहार बेटी है। वह अपने सपनों में रंग भरने के लिये पंख लगाकर आसमान में उड़ जाना चाहती है। बचपन से ही वह पायलट बनने की ख्वाहिश बुनते हुये बड़ी होती है। लेकिन उसके अरमान पूरे होते उससे पहले ही वह एक वहशी की हवश का शिकार हो गई। उसने उसे जितने जख्म दिये वो कम नहीं थे कि उसके लाख मना करने पर भी उसकी शादी उसी व्यक्ति राज से कर दी गई जिसने उससे उसके सारे सपने छीन लिये। आखिर उसे थक-हार कर अपने घरवालों के सामने झुकना पड़ा उसे राज को अपने जीवनसाथी के रूप में न चाहते हुए भी स्वीकारना पड़ा। राज ने उसे उसी दिन मार डाला था जब उसकी इज्जत को तार-तार किया, लेकिन फिर भी समाज और लोगों के डर से उसे उसी कातिल के साथ जीने को मजबूर होना पड़ा।

राज की दरिंदगी यहीं खत्म नहीं हुई शादी के बाद वह हर दिन तमन्ना के लिये एक मौत लेकर आता था। तमन्ना रोज एक मौत मरती रही, लेकिन समाज का कोई उसके जख्मों पर मरहम रखने आगे नहीं आया, बल्कि राज का ही साथ देते रहे समाज के लोग और तमन्ना तिल-तिल मरती रही। तीन बच्चों की मां बनने के बाद तो वह अपने बच्चों से भी दुत्कारी जाने लगी। उसके दोनों बेटे भी राज का ही साथ देते रहे। इसके बाद तो तमन्ना के जीवन में कुछ नहीं बचा था। वह चाहती थी तो बस न्याय। इसकी तलाश में वह नारी उत्थान केन्द्र भी गई, लेकिन वहां से भी मायूस होकर ही वापस लौटना पड़ा। आखिर यह सब सहते-सहते तमन्ना एक दिन अपने हैवान पति के आखिरी हमले को झेलते हुए मौत का दामन थाम लेती है।

तमन्ना की तरह ही हमारे समाज में ना जाने ऐसी कितनी युवतियां हैं जो इस तरह की जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिलता, बल्कि समाज की बेरूखी ही मिलती है। लेखिका कौसर वसीम की पुस्तक  ‘मेरे आंसुओं को जुबान दे दो’ ऐसी ही युवतियों पर आधारित है। यह पुस्तक समाज में घट रहीं ऐसी ही घृणीत घटनाओं पर प्रकाश डालने की एक कोशिश है।

प्रीति ठाकुर

 

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