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आखिर मां तो मां ही होती है

आखिर मां तो मां ही होती है

आधुनिक सभ्यता-संस्कृति ने आज सबको अपने में ही सीमित कर दिया है। आजकल अधिकतर लोग भोग-बिलास और जिंदगी की रोजमर्रा में डूबे रहते हैं। सबके जीवन का लक्ष्य यही बन चुका है कि अच्छी नौकरी मिल जाए, सभी आधुनिक वस्तुओं का उपभोग करने को मिल जाए और कोई बड़ा बंगला बना लिया जाए। सब कुछ अपने लिये सोचना और अपने लिये करना यह अधिकतर अधुनिक आदमी की सोच बन चुकी है। लेकिन दूसरों के लिये जीना और परायों को अपना मानना, यह भारत देश की संस्कृति है। ऐसे ही माहौल में ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले में पैदा हुए एक बच्चे की चार साल की उम्र में ही उसके पिता का स्वर्गवास हो गया। जिस गांव में वह रहता था, वहां न तो सड़कें थीं, न ही बिजली-पानी की सुविधा। अपनी विधवा मां और छोटे भाई-बहनों के साथ जीवन बिताना चारों तरफ अंधकार के बीच जीने के समान था। ऐसे ही अच्युत सामंत के लिये अपनी मां का चेहरा कभी-कभी भगवान जैसा बन जाता। न जाने, भगवान की क्या इच्छा थी कि एक दिन बालक अच्युत ने उस अंधकार भरे जीवन से निकलने का संकल्प लिया।

गांव में कोई जमीन-जायदाद भी नहीं थी कि खेती से गुजारा चले। गरीबी क्या होती है अगर कोई अच्युत से पूछे तो वे रो पड़ते हैं। धीरे-धीरे समय के साथ अच्युत बड़े होने लगे। अपनी मां के साथ गांव में इधर-उधर किसी तरह दो पैसे कमाना शुरू किया। इसी तरह उनकी मां ने अपने बच्चों को बड़ा किया। उनके स्वर्गीय पिता आनंदी चरण कोलकाता में काम करते थे। पिता का देहांत माता नीलिमा रानी के लिये किसी चुनौती से कम नहीं था। अपने सात बच्चों के साथ निलिमा रानी ने कभी भी हौसले का साथ नहीं छोड़ा और अपनी जिम्मेदारी निभाती रहीं। कलराबांका गांव में पढऩे की भी सुविधायें नहीं थीं। दूर-दूर तक अच्युत सामंत को पैदल चल कर स्कूल जाना पड़ता था। भगवान के आशीर्वाद से अच्युत सामंत ने स्कूल समाप्त करने के बाद राजधानी भुवनेश्वर में उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके मन में हमेशा उमंग छाई रहती थी। हर वक्त वे सोचते थे कि कैसे मैं अपने जीवन में बिताये हुये दुख को समाज को बताऊं। न अच्छा खाने को मिलता और न ही कोई अच्छी जगह जाना हो पाता था। अच्युत की छोटी बहन इति रानी उनकी दुलारी थीं। मां के आशीर्वाद से अच्युत ने भुवनेश्वर में ट्यूशन करके धीरे-धीरे दो पैसे कमाने लगे। फिर उन्होंने भुवनेश्वर स्थित एक कॉलेज में अध्यापक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। कमाई कम हो या ज्यादा अपनी मां को बताते थे और जब मां पूछने लगी ”अरे बेटा अब तो मैं बहुत ऐश कर रही हूं। मेरा बेटा कमाने लगा है।’’ लेकिन अच्युत हंसते-हंसते कहते, ”मां अब तू इन पैसों का क्या करेगी? तेरे सब बच्चे बड़े हो गये हैं।’’ जबसे उन्होंने कमाना शुरू किया, वह पैसा भी गरीब दोस्तों की पढ़ाई अथवा उनके खाने के लिये दे देते थे।

अच्युत ने धीरे-धीरे पैसे इक्ट्ठे करके एक डिप्लोमा कॉलेज शुरू किया भुवनेश्वर में और फिर भगवान के आशीर्वाद से डिग्री कॉलेज भी चलने लगा। अच्युत ने अपने जीवन के साथ-साथ यह प्रण लिया कि उनके जैसा जीवन किसी और को न मिले। उन्होंने धीरे-धीरे कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रीयल ट्रेनिंग (किट) विश्वविद्यालय की स्थापना की। तब अच्युत के पास पैसे की कमी नहीं थी। सबने सोचा अब वे किट विश्वविद्यालय के जरिए अपने परिवार को बड़ा करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके जीवन का प्रण था गरीब बच्चों के चेहरे पर हंसी देखना और उनकों शिक्षित करना। अपने इस सपने को साकार करने के लिये उन्होंने कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (किस) आदिवासी बच्चों के लिये शुरू की। इसमें पूरे ओडिशा से 25 हजार आदिवासी बच्चों को मुफ्त भोजन, आवास और शिक्षा मुहैया कराई जाती है। अपने व्यस्त जीवन में भी वे अपनी मां और जगन्नाथ जी को कभी नहीं भूले। कभी भी अच्युत को नया कपड़ा पहनना होता था, तो उससे पहले अपनी मां के पैर धोते थे। नीले रंग की एक जींस, सफेद शर्ट और जेब में पांच रुपये का एक कलम उनकी पहचान बन गई है। उनके नाम पर न कोई बैंक एकाउंट है, न ही अपना कोई घर और न गाड़ी। हर मां की तरह नीलिमा रानी ने बार-बार शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन अच्युत ने मना कर दिया। उनकी मां ने उनके दोस्तों से भी कहा कि मेरे बेटे को समझाओ और उसकी शादी करवाओ। लेकिन सामंत नहीं माने और अपनी मां को बार-बार समझाते थे कि ”अरे पगली, तेरे बेटे का कोई मकान भी नहीं है, शादी कहां से करूंगा।’’ मां तो मां ही होती है अपने जीवन के अंतिम समय तक उन्होंने कई प्रयास किये। लेकिन इस बेटे को समझाते-समझाते मां समझ गई कि बेटे को अपने नहीं, दूसरों को आनंद देने में ही खुशी मिलती है।

14-08-2016

अच्युत ने अपने जीवन को दूसरों के लिये इतना व्यस्त कर दिया कि अपनी मां को भी अपने पास नहीं रख पाये थे। लेकिन हर दिन मां कि खबर लेना और त्यौहार पर मां का आशीर्वाद लेना कभी नहीं भूलते थे। अच्युत के लिये उनकी मां एक बहुत बड़ी दुनिया थी। शायद मां से अलग होने के बाद हजारों अनाथ बच्चे उनकी दूसरी दुनिया थी। सारी दुनिया का सहारा मिलने के बाद अच्युत हमेशा अपनी मां की गोद में सिर रख कर लेट जाते थे। मां के हाथ को अपने सिर पर रख लेते थे। समाज में जो बेटा, हजारों लोगों के चेहरे पर हंसी ला सकता है, ऐसा भाग्य कुछ ही मांओं का होता है। आज अच्युत के लिये मां की वह गोद नहीं रहीं।  ”ऐ पगली मां, तुम्हें दुनिया के बारे में क्या मालूम है, लेकिन मां मन ही मन में सोचती होगी कि मैंने तो तुमको नौ महीने पेट में रखा था और आज तुम मुझे दुनिया के बारे में समझाते हो। ‘‘ बेटा कितना बड़ा ही क्यों न हो, मां के सामने बच्चा बच्चा ही रहता है। आखिर मां, मां ही होती है।

 प्रीति ठाकुर

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