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काशी बुला रही है

काशी बुला रही है

यूं तो काशी (बनारस) अपनी प्राचीनता के अतिरिक्त धर्म, दर्शन, अध्यात्म और सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरी दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है, लेकिन पिछले दो-ढाई वर्षों में इसका महत्व कुछ अन्य कारणों से भी बढ़ा है। अन्य कारणों में सबसे महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी द्वारा इसे अपने संसदीय क्षेत्र के रूप में चुनना। प्रधानमंत्री द्वारा इसे अपना चुनाव क्षेत्र बनाये जाने के पीछे यह तर्क है कि ‘मां गंगा ने बुलाया है’, काशी के प्रति दुनिया के लोगों का कौतूहल बढ़ाने का एक नया सरंजाम बन गया। लिहाजा विदेशी ही नहीं, देसी पर्यटकों में भी बनारस के प्रति नया रूचिबोध विकसित हुआ। पर्यटकों के इस नये रूचिबोध को समझने का श्रेय लेने और इसे अपने पक्ष में भुनाने में केन्द्र सरकार ही नहीं, सूबे की सरकार भी जुट गयी है। लिहाजा न केवल पुरानी काशी बल्कि ‘नयी काशी’ (वरूणा पार) को भी नया कलेवर देने की दिशा में सरकारी स्तर पर भी तेजी दिखने लगी है। कहा जा सकता है कि मोदी को बुलवाया तो मां गंगा ने था अपने उद्धार के लिए, लेकिन लगे हाथों वरूणा का भी उद्धार हो रहा है।

काशी की जीवन्त संस्कृति और धरोहरों के संरक्षण को लेकर यहां के लोग लंबे समय से चिन्तित रहे हैं। न केवल संस्कृति व साहित्यकर्मी बल्कि इतिहास, धर्मशास्त्र और आध्यात्मिक क्षेत्र के लोग भी काशी की जीवन्तता के पीछे के सांस्कृतिक अव्यवों की अक्षुुण्णता बनाये रखने को लेकर अपनी चिंताओं को जाहिर करते रहे हैं। यह चिंताएं वैचारिक धरातल पर तो दिखती ही रहीं, काशी से जुड़े या यहां रह कर कुछ दिनों तक अपनी सेवाएं देने वाले सरकारी अधिकारियों द्वारा सरकार को प्रस्ताव के रूप में भी सामने आयीं। फिलहाल राज्य निर्वाचन आयोग में सचिव और लंबे समय तक वाराणसी में विभिन्न पदों पर रह चुके आर.विक्रम.सिंह (आईएएस) कहते हैं -काशी को ‘ओल्डर दैन हिस्ट्री’ (इतिहास से भी प्राचीन) कहा जाता है तो यह यूं ही तो नहीं होगा। इसकी जीवन्तता के पीछे ‘ कुछ तो जरूर है। ‘आखिर इस ‘कुछ’ को बनाये रखने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है? जो इतिहास से भी पुराना है उसे इतिहास के भरोसे छोड़कर हम अपनी जिम्मेदारी से ‘कैसे मुक्त हो सकते हैं?’ पर्यटन विभाग में संयुक्त प्रबंधक निदेशक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान आर.विक्रम ने काशी के विकास और हेरिटेज संरक्षण के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया था। फिलहाल उस प्रस्ताव पर तत्काल तो कोई पहल नहीं हुई लेकिन मौजूदा समय केन्द्र और राज्य सरकारों की पहल और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को देखकर संतोष जताया जा सकता है कि देर से सही, काशी का विकास करते समय उन सुझावों और सलाहों पर काफी हद तक ध्यान दिया जा रहा है।

दुनिया के कुछ प्राचीन शहरों जैसे-क्योटो (जापान), रोम, लंदन में शुमार बनारस (काशी) का विकास कैसा हो, किस रूप में उसे विकसित किया जाये, इस पर लगभग मतैक्य है। काशीवासियों की अपेक्षा और धारणा के मुताबिक जापानी शहर ‘क्योटो’ की तरह इसकी पुरातनता को बरकरार रखते हुए आधुनिक बनाने की शुरूआत हो चुकी है। स्थानीय नगर निगम के मेयर राम गोपाल मोहले सहित कुछ आर्किटेक्ट, जिलाधिकारी, विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, सचिव और भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों के दल ने क्योटो का दौरा कर अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश की। क्योटो से भी वहां के अधिकारियों, कलाकारों, शिल्पकारों और बुद्धिजीवियों की टीम ने वाराणसी का दौरा किया और काशी के विकास का ‘ब्लू प्रिंट’ तैयार करने में  मदद की। वाराणसी के मेयर राम गोपाल मोहले कहते हैं – ‘काशी दुनिया का सबसे प्राचीन शहर है, इसी तरह क्योटो भी पूरी दुनिया में अपनी पुरातन सांस्कृतिक धरोहरों और शिल्प के लिए विख्यात है। इसीलिए प्रधानमंत्री जी ने काशी के विकास के मॉडल को फाइनल करने से पहले क्योटो को देखने -समझने की अपेक्षा की।’

खैर, प्राचीन और ठहरी हुई काशी को स्मार्ट सिटी बनाने की दिशा में पहल तो मोदी जी ने की, लेकिन राज्य सरकार भी इस मामले में चुप नहीं बैठी रही। मोदी जी के ‘गंगा ने बुलाया’ का जवाब देने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने स्वयं वाराणसी में वरूणा की दीन-हीन दशा पर दुख व्यक्त करते हुए इसके उद्धार के लिए संकल्प लिया। मुख्यमंत्री का यह संकल्प कुछ महीनों के भीतर व्यावहारिक रूप में सामने आने लगा जब ‘वरूणा कॉरीडोर’ पर काम शुरू हो गया। वरूणा कॉरीडोर को वाराणसी में मुख्यमंत्री का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कहा जा रहा है। इसके अंतर्गत कृशकाय हो गयी वरूणा नदी को गंदे नाले से उबार कर पौराणिक स्वरूप में वापस लाना मुख्यमंत्री का संकल्प है।’ कहते हैं सपा के जिलाध्यक्ष सतीश फौजी।

यह सच है कि काशी के विकास के लिए प्रधानमंत्री की पहल महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रदेश सरकार की तात्कालिक और व्यावहारिक सक्रियता ने इसे गति प्रदान की है। वाराणसी के विकास, खासकर वरूणा कॉरीडोर के जरिए एक उपेक्षित नदी के घाटों को आकर्षण का केन्द्र और ‘देशी-विदेशी पर्यटकों के देखने लायक’ बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री की खास दिलचस्पी चर्चा का विषय बन गयी।

उल्लेखनीय है कि बारिश के मौसम का आगमन नजदीक होने के बावजूद मुख्यमंत्री ने ‘वरूणा कॉरीडोर’ की न केवल शुरूआत कर दी बल्कि पर्यटन, सिंचाई, पीडब्ल्यूडी सहित लगभग आधा दर्जन विभागों की मशीनरी को इसमें लगा दिया, ताकि बारिश आते-आते नदी के तट बदले हुए रूप में नजर आने लगें। प्रदेश सरकार के पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश सिंह कहते हैं – ‘असल में हमारे मुख्यमंत्री की दिलचस्पी पूरे काशी क्षेत्र के विकास में है। वे वाराणसी को स्मार्ट सिटी बनाने के साथ ही समूचे पूर्वांचल में पर्यटन सुविधाएं बढ़ाने, मिर्जापुर में विंढम फॉल, चंदौली -सोनभद्र स्थित बंधों, प्राकृतिक झरनों तक पहुंचने के लिए सड़कों के निर्माण, पुनरूद्धार कार्यक्रमों के प्रति बहुत सचेत हैं। इसके लिए लगभग पचास करोड़ रूपए का बजट रिलीज हो गया है। वाराणसी में घाटों के लिए 429 करोड़ रूपए हमारी सरकार ने दे दिए हैं। उन्हें गंगा घाटों पर छतरियां लगाने, बेंच लगाने, जेटी लगाने में खर्च किया जाना है। घाटों पर यात्री सुविधाओं जैसे -महिलाओं के लिए कपड़े बदलने के लिए बाथरूम, प्रकाश व्यवस्था आदि का कार्य भी होना है।’

बनारस में विदेशी पर्यटकों की दिलचस्पी को देखते हुए यहां के पर्यटन उद्योग को सुदृढ़ आधार देना खास मायने रखता है। केन्द्र ही नहीं राज्य सरकार भी इस नजरिये से काम कर रही है। केन्द्र सरकार ने इस दिशा में कई योजनाओं को अंतिम रूप दे दिया है, कुछ पर काम शुरू हो गया है। मेयर राम गोपाल मोहले कहते हैं-घाटों के लिए ‘नमामि  गंगा योजना’ में चेंजिंग रूम, बायो टॉयलेट, तेज और आकर्षक प्रकाश वाली दूधिया लाइटें, 14 महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों पर फ्लड लाइटें, छह घाटों पर फाउंटेन शीघ्र ही बन जायेंगे। मशीन के जरिए गंगा की गंदगी को त्वरित गति से साफ करने का काम भी शुरू हो जायेगा। इस सबसे जहां टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा, वहीं काशी की पौराणिकता को अक्षुण्ण रखने और उसे ‘हाई लाइट’ करने का प्रयास भी सफल होगा।’

बनारस शहर से सटे सारनाथ की ऐतिहासिकता और पुरातात्विक महत्व निर्विवाद है। सारनाथ के विकास के बिना काशी का विकास अधूरा रह जायेगा। आर विक्रम कहते हैं -‘गंगा के 84 घाटों का संरक्षण, शहर का सुन्दरीकरण, वरूणापार का व्यवस्थित विकास जितना जरूरी है, उतनी ही जरूरी है सारनाथ के विकास की महायोजना। इसके अंतर्गत बाबतपुर एयरपोर्ट से लालपुर होते हुए सारनाथ तक फोरलेन मार्ग। इससे विदेशी पर्यटक एयरपोर्ट से सीधे सारनाथ पहुंच जायेंगे। उन्हें शहर जाने की परेशानियों, ट्रैफिक आदि की रूकावटों से निजात मिल जायेगी।’ आर.विक्रम के प्रस्ताव के मुताबिक प्रधानमंत्री की रिंग रोड योजना पर तेजी से काम हो रहा है। यही नहीं सारनाथ में लाइट एंड सॉग सिस्टम के लिए पर्यटन विभाग ने 7 करोड़ 33 लाख रूपए दे दिए हैं। इस पर काम शुरू  हो गया है। जल्दी ही लेजर शो के जरिये गंगा और घाटों का नजारा दिखाने का कार्यक्रम भी शुरू हो जायेगा। इसके लिए 18 करोड़ की योजना पर काम जल्दी ही शुरू हो रहा है। सारनाथ में बुद्धा थीम पर 2.2 करोड़ रूपये खर्च कर इस ऐतिहासिक धरोहर को यादगार बनाने की योजना पर काम शुरू हो चुका है। पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश सिंह कहते हैं -’ दरअसल अभी तक विदेशी पर्यटक यहां आकर काशी में सूर्योदय देख गंगा घाटों को निहारते हुए नौका बिहार करते हैं। फिर सारनाथ पहुंचकर बुद्ध मंदिर धमेक स्तूप, पुरातत्व संग्रहालय आदि देख शाम तक वापस चले जाते रहे हैं। अब उन्हें एक दिन और काशी में रूकने के लिए मजबूर करने की हमारी योजना है। इसके लिए अस्सी में गंगा अवतरण पर, सारनाथ में बुद्धा थीम पर लेजर शो की शुरूआत शीघ्र की जानी है।

फिलहाल प्राचीन काशी की ऐतिहासिकता को बरकरार रखते हुए उसे आधुनिक और स्मार्ट सिटी बनाने की दिशी में काम शुरू हो चुका है। गंगा घाटों के सुन्दरीकरण, पुरातात्विक इमारतों के रखरखाव और लाइटिंग का काम भी अंतिम चरण में हैं। वरूणा कॉरीडोर, सारनाथ में बुद्धा थीम, गंगा अवतरण कहानी पर लेजर शो आदि के जरिए काशी के प्रति दुनिया के लोगों में एक नया आकर्षण पैदा करने की शुरूआत हो चुकी है। ऐसे में काशी वासियों से अपने व्यवहार और आचरण के जरिए विश्व को शान्ति एवं सद्भाव का संदेश देने की उम्मीद कुछ बढ़ जाती है।

काशी से सियाराम यादव

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