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अपराध और उसका निराकरण

अपराध और उसका निराकरण

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य समाज से अलग रह कर जीवित नहीं रह सकता। उसके सारे काम समाज से बंधे हुए हैं और प्रत्येक मनुष्य के कार्यों का प्रभाव समाज पर अवश्य पड़ता है। जब एक-एक मनुष्य से समाज बनता है तो उन मनुष्यों के कार्य समाज के कार्य बन जाते हैं अत: व्यवस्था  बनाए रखने के लिए समाज कुछ नियम बनाता है जिन्हें सामाजिक नियम कहते हैं जिनके पालन करने से सामाजिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे परन्तु किसी भी सामाजिक देश में एक ही प्रकार का समाज नहीं रहता उसमें विभिन्न प्रकार के समाज होते हैं अत: राष्ट्र सुव्यावस्था कायम करने के लिए कुछ कानून बनाता है जो विधि सम्मत होते हैं और उस कानून का पालन उस देश में रहने वाले सभी नागरिकों को करना पड़ता है। वस्तुत: जो सामाजिक नियमों की अवहेलना करता है उसे पाप कहते हैं और जो देश में बनाए गए विधि सम्मत कानूनों का उल्लंघन करता है उसे अपराध कहते हैं । जिन कार्यों से अव्यवस्था उत्पन्न होती है वही अपराध है। चोरी, डकैती, व्यभिचार, अपहरण, बलात्कार, गबन, आग लगाना, लूटपाट करना, हिंसा करना, हत्या, घूसखोरी, झूठ, छल प्रपंच, किसी को ठगना आदि अपराध की श्रेणी में आते हैं। ये कार्य देश के कानूनों का उल्लंघन है और इनके दुष्कर्मों के कारण समाज में अव्यवस्था आती है और देश तथा समाज शक्तिहीन होता है।

भारत में अपराधों की संख्यां में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से अपहरण, हत्याएं, लूटमार और विशेष रूप से बलात्कार आदि जन-जीवन की एक सामान्य  सी घटना होती जा रही है। सन् 1920 से 1950 तक प्रति लाख आबादी पर 3.3 थी। सन् 1955 से 1967 तक बारह वर्षों की अवधि में यह प्रति लाख पर 2 ही रह गई, सन् 1967 से 1977 तक आबादी में वृद्धि का प्रतिशत तो 25.2 रहा, लेकिन हत्या की वारदातों में 37.2, अपहरण में 49.4, डकैती में 121.7 तथा लूटमार में 100 प्रतिशत की वृद्धि हो गई। भारत के पिछले रिकॉर्ड को उठा कर देखा जाए तो यह अनुभव होगा कि भारत में अपराधों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। स्वतंत्र भारत के प्रथम वर्ष के दौरान सन् 1948 में 625909 अपराध हुए। सन् 1962 तक इन अपराधों में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार 1963 में 658830 तथा 1964 में 759013 अपराध हुए, परन्तु 1972 में कुल अपराधों की संख्या 1267004 तथा 1978 में 1344978 हो गई, परन्तु उसके बाद तो सभी प्रकार के गंभीर अपराधों में वृद्धि होती गई।

14-08-2016

आज भारत में प्रति वर्ष बीस हजार कत्ल होते हैं जो प्रति लाख आबादी पर 3 है, इससे स्पष्ट होता है कि भारत में अपराधों की दर अधिक है। बड़े राष्ट्रों अमेरिका में ही भारत से अधिक अपराध होते हैं। नब्बे के दशक में बिहार अपराधों की श्रेणी में सबसे आगे था। वहां दिन-दहाड़़े सरेआम हत्याएं कर दी जाती थीं। इसी कारण उस प्रदेश को जंगलराज कहा जाने लगा था। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में बलात्कार की घटनाएं सबसे अधिक हो रही हैं। 16 दिसम्बर 2012 के निर्भया कांड ने सारे देश को हिला कर रख दिया था और यह कहा जाने लगा था कि दिल्ली में महिलाएं सुरक्षित नहीं है। केन्द्रं शासित दिल्ली में हर अपराधों में वृद्धि होती जा रही है। उसके बाद गोवा तथा दमन दीव का नंबर आता है। महानगरों में सर्वाधिक अपराध मुंबई में होते हैं, उसके बाद बैंगलोर (बंगलूरू) में होते हैं। मुंबई में हत्याएं सबसे अधिक होती हैं। बंगलूरू में सेंधमारी की घटनाएं सबसे अधिक होती है। बलात्कार की घटनाएं सबसे अधिक महानगरों में होती हैं। चैन्नई, कोलकाता, कानपुर और अहमदाबाद में अपेक्षाकृत कम अपराध होते हैं। बलात्कार की घटनाएं सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में होती है। सबसे ज्यादा डकैतियां तथा हत्याएं बिहार में होती हैं। चोरियां और विश्वा्सघात के मामले में महाराष्ट्र  अग्रणी है तथा नकली नोट तथा सिक्के बनाने के मामले में तमिलनाडु आगे है।

मनोविज्ञान और समाज विज्ञान दोनों ही दृष्टि से यह विचारणीय पहलू है कि आदमी अपराधी क्यों बनता है और अपराध क्यों  करता है? क्या वह जन्म  से ही अपराधी होता है या सामाजिक परिस्थिति उसे अपराधी बना देती है। यह एक उलझन भरी समस्या है। जहां तक मनोविज्ञान का संबंध है उसका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनुवंशिकता और चारों ओर की परिस्थितियों की उपज होता है। इसी को संस्कार और परिवेश की संज्ञा दी जा सकती है। प्राचीनकाल में इसी कारण कुलीनता पर अधिक जोर दिया जाता था। अब कुलीनता की अपेक्षा परिवेश पर अधिक ध्यान दिया जाता है पर मनोवैज्ञानिकों ने अनुवंशिकता की महत्ता को अस्वीकार किया है न परिवेश की महत्ता को। शायद अनुवंशिकता भी एक प्रकार का परिवेश है जो कि वर्तमान का न होकर भूतकाल का है। वैसे तो अपवाद हर जगह मिल जाते हैं जैसे राक्षस कुल में प्रहृलाद तथा पुलस्यल ऋषि के वंश में उनके पुत्र का पुत्र रावण जैसे उत्पन्नत हुए थे। सौम्यता, शुचिता और सुंदरता के लिए कमल से बढ़कर कोई फूल नहीं, परन्तु वह भी कीचड़ में पैदा होता है तभी से उसे पंकज अर्थात कीचड़ में उत्पन्न होने वाला कहा जाता है। महारथी कर्ण ने भी इसी बात को लक्षित करते हुए कहा था कि कुल में जन्म  होता है, यह तो दैव के अधीन है उसमें मेरा वश नहीं पर मेरे वश में पौरूष है और इसी पौरूष के बल पर सारे संसार को चुनौती देने की हिम्मत रखता हूं। इसी बारे में रामकृष्ण परमहंस का कहना है कि जैसे मैले शीशे में सूर्य की किरणों का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता वैसे ही जिसका अन्त:करण मलिन और अपवित्र है उसके हृदय में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता उनके कहने का तात्पर्य यह है कि असली प्रयोजन तो शीशे के साफ होने से है यदि वह जन्म से साफ है तो ठीक है अन्यथा उसे पॉलिश करके भी चमकाया जा सकता है। यह पॉलिश ही परिवेश है इस पॉलिश की संगति जिस शीशे को मिल गई वह चमक गया अन्यथा अंधे का अंधा।

14-08-2016

कुसंगति से संत को असंत तथा सुसंगति से असंत को संत बनने में देर नहीं लगती। जैसे धुआं कुसंगति में पड़कर कालिख बन जाता है वही धुआं जब जल अग्नि तथा वायु के संपर्क में आता है तो बादल बनकर जीवन का जगदाता बन जाता है। जैसा विचार करोगे वैसा बन जाओगे- इस उक्ति में गहरा सत्य छिपा हुआ है। गौतम बुद्ध ने भी यही कहा था विचार ही मनुष्य की प्रेरक शक्ति है और विचार ही मनुष्यु का भाग्य निर्माता है। मनुष्य विचार करने में स्वतंत्र है इसलिए चरित्र अपने अनुकूल बनाने में स्वतंत्र नहीं, क्योंकि विचारों के अंतरजगत के अनुसार ही बाह्य जगत बनता है और यह बाह्य जगत ही चरित्र का निर्माण करता है। यदि अंतरजगत में बुरे विचार पनप गए और उन विचारों में ही आनंद आने लगा तो विचारों में व्यभिचार का आनंद लेने वाला व्यक्ति अपराधी प्रवृत्ति का हो जाता है और वह निरंतर अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है यह स्वाभाविक है प्रत्येक अपराध के पीछे यही इतिहास होता है। अपराध करने वाला मनुष्य आत्मबल के अभाव के कारण अपराधी प्रवृत्ति का बन जाता है। अनैतिक शिक्षा, कुसंस्कार, परावलंबन पराधीनता, भय, कुसंग, असंतोष, आत्महीनता का भाव, अर्थाभाव, व्यासन आदि के कारण भी मनुष्य अपराधी प्रवृत्ति का हो जाता है। समाज में उचित सम्मान न मिलना, अपमान और बदले की भावना, गरीब, कामुक वासना की पूर्ति करने के लिए भी मनुष्य अपराध की दुनिया में शामिल हो जाता है। बेरोजगारी, शहरीकरण, अपराधियों को उनके किए की सजा न मिल पाना कानून व्यवस्था की नपुंसकता भी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। असमाजिक तत्व मनमाने अपराध करते हैं और पुलिस उन्हें पकडऩे का साहस नहीं जुटा पाती, क्योंकि उन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है तो अपराधी बेफिक्र हो कर अपराध करते रहते हैं और अपराधों में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। आम आदमी राजनीतिज्ञ पूंजीपतियों तथा राजनीतिज्ञ अपराधियों इन दो पाटो के बीच पिस रहा है एक ने उसका सुख चैन छीन लिया तो दूसरे ने उसकी सुरक्षा। आम जनता स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रही है, क्योंकि जनता को न पुलिस पर विश्वास रहा न प्रशासन पर, विशेषकर ग्रामीण जनता ने तो प्रशासन की निष्पक्षता में अपना विश्वास खो दिया। सांप्रदायिक दंगे और जातियां दंगे (हरियाणा में हुई हिंसा 2016) इसकी जीती जागती मिसाल है। हमारी न्याय प्रणाली कुछ इस प्रकार की है कि निर्धन व्यक्तियों के लिए न्याय प्राप्त करना बड़ा कठिन काम है वहीं दूसरी ओर साधन संपन्न व्यक्ति न्यायिक दंडा से बच तो नहीं सकता परन्तु  सजा प्राप्त करने के बाद जेल में भी वह ऐश-ओ-आराम के साधन जुटा लेता है। उसे जेल में होने का कोई एहसास नहीं होता। यही कारण है कि अपराधों में बेतहाशा वृद्धि होती जा रही है। शास्त्र अधिनियम 1959 में ढील देने के कारण लाइसेंस प्राप्त तथा बिना लाइसेंस वाले आग्नेहय अस्त्रों-शस्त्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। अदालतों में पुराने मामलों की भरमार होने के कारण अपराधियों को सजा देने में विलम्ब होता है।

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास न करने वाले ज्योतिष को दिमागी दिवालियापन तथा अंधविश्वास ही मानते हैं, परन्तु अब वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि ग्रहों का मानव मस्तिष्क पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। दो भारतीय वैज्ञानिकों ने एक सर्वेक्षण में यह पाया कि चांद भी अपराधों का प्रेरक है जब चांद पूरे निखार पर होता है तो अपराधी प्रवृत्ति उभरती है ज्यों-ज्यों चांद घटता जाता है अपराधी प्रवृत्ती भी घटती जाती है। सबसे ज्यादा अपराध पूर्णमासी के दिन होते हैं, आत्महत्या भी पूर्णमासी के दिन अधिक होती है क्योंकि चांद उस दिन पूरे निखार पर होता है। इस सर्वेक्षण ने इस मान्यता को झुठला दिया कि अधिकतर अपराध अमावस को होते है।

अपराध को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  • वैधानिक : व्यभिचार, बलात्कार, घूसखोरी, गबन, हत्या, कर चोरी तथा कानून व्यवस्था का उल्लंघन।
  • सामाजिक : छल प्रपंच करना, ठगी करना, चोर बाजारी करना, असामाजिक कार्य करना, लेने-देन में धोखाधड़ी, व्यसन।
  • पारिवारिक : परिवार को कष्ट देना, कृतघ्नता, अपना स्वार्थ सिद्ध करना, पारिवारिक दायित्व न निभाना।
  • व्यक्तिगत दुव्र्यासन, मद्यपान, जुंआ खेलना, वेश्यावृत्ति करना।

ये दोष मानसिक कायिक तथा वाचिक भेद से तीन प्रकार के होते हैं। पहले मन में बुरे विचार आते हैं, फिर वे वाणी और फिर कार्यों द्वारा क्रियान्वित हो जाते हैं यहीं से बुराई की बुनियाद पड़ जाती है। इसलिए बुरे विचारों को पनपने मत दीजिए। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है: ‘ध्यारयतो विषयान्पुस: सड्गस्तेुषुजायते’ : विषयों के चिंतन से ही मनुष्य की संगति शुभ कार्यों में होगी, यह चिंतन ही मनुष्यि को कर्मों में प्रवृत करता है। विख्यात दार्शनिक इमर्सन ने भी यही कहा है –विचारों को स्वतंत्रता दीजिए, विचार कामनाओं का रूप धारण कर लेंगे, कामनाओं को स्वतंत्र मार्ग दीजिए वे कार्य में परिवर्तित हो जाएगी, कार्य को स्वतंत्रता दीजिए वे आदतें बन जाएंगी, आदते ही चरित्र बनाती हैं।

14-08-2016

अनाज के बीज से बबूल का पौधा उत्पन्न नहीं होगा इसी प्रकार बबूल के बीज से अनाज पैदा नहीं होगा, उसमें कांटे ही प्राप्त होंगे। यह सत्य है कि अच्छे विचार कभी बुरे कार्यों के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। ईमानदार व्यक्ति को अपने सदगुणों का परिणाम अवश्य मिलेगा किंतु अपने दुर्गुणों के अनिष्ट परिणाम से बच नहीं सकेगा, यह प्रकृति का नियम है, प्रकृति के नियम किसी का पक्ष नहीं लेते, मनुष्य- मनुष्य को धोखा दे सकता है, प्रकृति की आंखों में धूल नहीं झोंक सकता।

सत्य बात तो यह है कि अपराधी को क्षणिक सुख बेशक मिल जाए परन्तु अपराध करने के बाद उसे अपराध बोध होता रहता है और वह स्वयं भी अपने को घृणित व्यक्ति  समझने लगता है। समाज तो उसे घृणा की दृष्टि से देखता ही है। वह इस घृणा भावना को भूलाने का प्रयत्न करता है, किंतु मन उसे क्षमा नहीं करता और वह सदैव बेचैन रहता है। सामाजिक अव्यवस्था उत्पन्न करने वाला अपराधी समाज को घोर क्षति पहुंचाता है इसलिए देश और समाज के लिए वह निरर्थक है। वह समाज के लिए अनावश्यक बोझ है। इसलिए अपराधियों का समूल नष्ट हो जाना ही समाज के लिए कल्याणकारी है। ऐसे अपराधियों का जीने से मरना अच्छा है, क्योंकि वह समाज के लिए कोढ़ है। यह आवश्यक नहीं कि जो एक बार अपराधी हो गया वह जीवन भर अपराधी ही रहेगा। यदि अपराधी को दिल से पश्चाताप हो जाता है और वह सुधरना चाहता है तो वह सुधर सकता है। सुधार का दृढ़ निश्चय घोर से घोर अपराधी की पुण्यात्मा बना सकता है। इतिहास पुराण और अनुश्रुतियों में ऐसे कई उदाहरण हैं : आदिकवि वाल्मीकि, महाकवि तुलसीदास आदि जो अपराध कोटि से उठकर महात्मा बन गए। वर्तमान समय में भी ऐसे अनेक उदाहरण है जो पहले खूंखार दस्यु थे, परन्तु अब वे सामान्य नागरिक बन गए हैं और समाज ने भी उनको अपना लिया है जैसे डाकू फूलन देवी, मलखान सिंह, तहसीलदार सिंह आदि।

परिस्थितियों को देखते हुए अपराधों की रोकथाम के लिए सरकार को गंभीर होना पड़ेगा। एक दीर्घकालिक योजना बनानी पड़ेगी। राजनीतिज्ञों के कार्यकलापों पर अंकुश लगाना होगा। अपराध कम-से-कम हो इसके लिए उपयुक्त सामाजिक वातावरण पैदा करना होगा। साथ ही जनता में सरकार, पुलिस और न्यायालय के प्रति बनी अविश्वास की खाई को पाटना होगा। यदि पुलिस मस्तैद और ईमानदार हो तो अपराधियों के मन में भय पैदा होना स्वाभाविक है।

 श्रीकृष्ण मुदगिल

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