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जीएसटी की सियासत

जीएसटी की सियासत

अभी सियासी शतरंज बिछी हुई है इसलिए एकाध शह से मात का ऐलान कर देना जल्दबाजी ही हो सकती है। वैसे भी सियासी बिसात पर चालें इतनी अनिश्चित होती हैं कि बाजी शायद ही कभी खत्म होती है। पूरे देश में एक सार्वभौम वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लागू करने का मामला अगर महज सियासी श्रेय लेने के मुकाम पर ठहरा हुआ था तो विपक्ष के दूसरे मामलों में तमाम तीखे विरोधों के बावजूद इसे पास करवा ले जाना मोदी सरकार की बड़ी जीत कही जा सकती है। हालांकि अभी राजनैतिक चतुराइयों के लिए मैदान खुला हुआ है। इसका संकेत अगले ही दिन इससे संबंधित अगले विधेयकों को धन विधेयक (मनी बिल) के तौर पर पेश किया जाए या वित्त विधेयक (फाइनांस बिल) के रूप में, इसको लेकर शुरू हुई रस्साकशी से मिल रहा है। धन विधेयक अगर राज्यसभा में गिर भी जाए तो लोकसभा उसे आगे बढ़ा सकती है, जहां भाजपा और एनडीए का बहुमत है। वित्त मंत्री अरुण जेटली राज्यसभा में बहस के दौरान अगले विधेयकों को वित्त विधेयक के रूप में पेश करने पर विचार करने के अपने वादे से मुकरते नजर आए तो कांग्रेस के जयराम रमेश ने इसके लिए राजनैतिक नेताओं का हस्ताक्षर अभियान छेड़ दिया।

फिर भी इस जीत के मायने कई हैं। इसी वजह से वित्त मंत्री अरुण जेटली लंबे समय से नाक का सवाल बने इस संविधान संशोधन विधेयक को राज्यसभा में लगभग निर्विरोध पास होने के फौरन बाद मिठाइयां खाते-खिलाते ही नजर नहीं आए, बाकायदा केक भी काटा गया, मानो नई और आधुनिक पीढ़ी को किसी नए आकांक्षित दरवाजे के खुलने का संकेत दे रहे हों। जेटली के लिए यह निजी सफलता भी इस मायने में है कि वे इससे अपनी पार्टी में चल रही नुक्ताचीनी का मुंह बंद करने में कामयाब हो सकते हैं। लेकिन इसका जिक्र करने से पहले यह जानें कि जीएसटी की यह सियासत क्या है और क्यों यह इतना महत्वपूर्ण हो गई थी?

बेशक, यह मौजूदा नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था के मायने में महत्वपूर्ण है। इसी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के लिए एक नए दौर की शुरुआत कहा। हालांकि बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी के मुखर विरोध से ही यूपीए-2 सरकार के दौर में यह लटका रहा। तब बाकी कई राज्यों के साथ गुजरात की दलील थी कि जीएसटी से राज्यों को राजस्व घाटा होगा। इसी वजह से नए विधेयक में उत्पादन वाले राज्यों को 1 प्रतिशत राजस्व हिस्सेदारी का प्रावधान किया गया था लेकिन कांग्रेस की जिद के आगे उसे छोडऩा पड़ा। जाहिर है, गुजरात, महाराष्ट्र उन राज्यों में हैं, जहां उत्पादन इकाइयां ज्यादा हैं और वह प्रावधान कहता था कि माल का उत्पादन जहां होगा, उसे 1 प्रतिशत ज्यादा कर मिलेगा। इसके बदले कांग्रेस ने राज्यों के राजस्व घाटे की केंद्र से पांच साल तक भरपाई करने का प्रावधान डलवा दिया। बहरहाल, इस समझौते के बावजूद जीएसटी पास करवाना मोदी के लिए बतौर प्रधानमंत्री बेहद जरूरी हो गया था। शायद इसका एक मतलब राज्य और देश की कमान संभालने का फर्क भी है लेकिन भाजपा के लिए इसे यूपीए के राज में पास न होने देने और अब पास कराने का मतलब अपना सियासी आधार मजबूत करना भी है।

14-08-2016

इसे हम तब बेहतर समझ सकते हैं जब नब्बे के दशक के बाद की राजनीति पर एक हल्की नजर डाल लें। 1991 में कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री बनाए गए अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह जब विश्व व्यापार संगठन के लिए बनाए गए डंकल ड्राफ्ट और विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की सिफारिशों के मुताबिक लाइसेंस-कोटा-परमिट राज के खात्मे का ऐलान किया और धीरे-धीरे निजीकरण और विदेशी पूंजी की राह आसान करने लगे तो भाजपा और संघ परिवार समेत लगभग सभी दल उसके विरोधी थे। संघ परिवार के संगठनों ने तो उसे आर्थिक गुलामी तक कहा था।

लेकिन 1996 के चुनावों में कांग्रेस हारी तो 161 सीटें लेकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार 13 दिनों में ही गिर गई। कांग्रेस के समर्थन से बनी संयुक्त मोर्चा सरकार के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ड्रीम बजट लेकर आए तो वह भी आर्थिक उदारीकरण की उसी दिशा में था। इन वजहों से भाजपा और संघ परिवार ने मुख्यधारा में शामिल होने के लिए अपने प्रिय मुद्दों को किनारे करना जरूरी समझा। यह भी माना गया कि उदारीकरण से लाभान्वित उभरते मध्यवर्ग और उच्च वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए नई अर्थ नीतियों की पैरोकारी अहम है। भाजपा नेताओं ने कहना शुरू किया कि हम आर्थिक सुधार तेजी और मजबूती से करेंगे। सो, 1999 में दोबारा बनी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने आर्थिक सुधारों की गति तेजी की।

 उसी दौर 2003 में पूरे देश में खासकर व्यापार और उद्योगों की शह के लिए एक कर प्रणाली कायम करने का विचार उभरा था। बाद में यूपीए सरकार के 2007 में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पूरे देश में एक सार्वभौमिक कर प्रणाली का प्रस्ताव रखा। 2009 में यही वस्तु और सेवा कर संविधान संशोधन के रूप में पेश किया गया। तब भाजपा ने लगातार इसका विरोध किया। सबसे तगड़ा विरोध गुजरात से आया। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अभियान शुरू किया तो उनके सिपहसालारों ने उनकी छवि विकास पुरुष की बनाई और बड़े उद्योगों के प्रश्रय के गुजरात मॉडल को उसका आधार बनाया गया।

मोदी इसके पहले पश्चिम बंगाल के सिंगूर से टाटा का नैनो कारखाना हटाए जाने के बाद उसके लिए फौरन गुजरात में जमीन मुहैया कराके अपनी छवि उद्योग समर्थक बना चुके थे। इसी वजह से प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण आसान करने, पर्यावरण संबंधी बाधाओं से अटकी पड़ी बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने, एफडीआइ के लिए ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों को खोलने और जीएसटी को लागू करने के मामलों को अपनी प्राथमिकता में रखा। लेकिन भारी विरोध के कारण जमीन अधिग्रहण के मामले में उन्हें पीछे हटना पड़ा। उनकी मेक इन इंडिया और पूंजी निवेश बढ़ाने तथा विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ाने की योजना और कार्यक्रमों का खास असर नहीं दिख रहा था। ऐसे में जीएसटी उनके और उनकी सरकार के लिए अहम हो गया था।

हाल में कुछ आलोचना का शिकार हुए और सरकार तथा पार्टी में कमजोर हुए वित्त मंत्री जेटली के लिए अपना कद बढ़ाने के खातिर भी यह अहम हो गया था। जहां तक कांग्रेस या दूसरे दलों का सवाल है तो उन्हें शायद सरकार के आधे कार्यकाल में जीएसटी को पास कराना कोई गैर-मुनासिब नहीं लगा। वजह यह कि अभी कुछ और विधेयक लाने होंगे। खासकर जीएसटी में कर निर्धारण से संबंधित विधेयक पर पचड़े की गुंजाइश का कांग्रेस संकेत दे ही रही है। कम से कम 15 विधानसभाओं से इसे पास कराना अनिवार्य होगा। उसके बाद राष्ट्रपति की संस्तुति मिलेगी तब जीएसटी परिषद का गठन होगा। उसके नियम वगैरह तैयार करने होंगे। जीएसटी नेटवर्क का गठन किया जाएगा। इस सारी प्रक्रिया में 28 से 30 महीने गुजर जाएंगे। तब तक इस सरकार का आखिरी वक्त आ जाएगा।

यही नहीं, इससे शुरुआत में महंगाई बढ़ेगी क्योंकि सेवाकर मौजूदा 15 प्रतिशत से बढ़कर कम से कम 20 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। इसी तरह कृषि उपज की कीमतें भी बढ़ जाएंगी। उत्पाद शुल्क और तरह-तरह के राज्य करों तथा चुंगी और प्रवेश करों के हटने से कारखाने में उत्पादित सामान जरूर सस्ते हो सकते हैं। लेकिन गरीबों के लिए भोजन सामग्रियों की महंगाई ज्यादा मायने रखेगी, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए कांग्रेस या विपक्षी पार्टियों ने अपनी सियासी डोर भी पकड़ रखी है।

हालांकि कांग्रेस उद्योग जगत को भी नाराज नहीं करना चाहती। इसका संकेत उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाल में संसद में दिए ”अरहर मोदी’’ भाषण में भी स्पष्ट था। उन्होंने कहा था कि सरकार उद्योगपतियों के कर्ज माफ कर रही है जिसका  हम विरोध नहीं करते  लेकिन उसे गरीबों का भी ख्याल रखना चाहिए। जाहिर है, कांग्रेस को यह एहसास होने लगा कि ज्यादा विरोध से खासकर उच्च वर्ग और मध्यवर्ग में गलत संदेश जा सकता है, जो उसका कभी मुरीद रहा है और जिसके हीरो मोदी से कभी मनमोहन सिंह रहे हैं।

बहरहाल, इस सियासी बाजी में देश का कितना भला होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। अगर वाकई इससे कारोबार को सहूलियत होती है और रोजगार बढ़ता है तो देश का अर्थिक माहौल सुधर सकता है। जैसा कि दावा किया जा रहा है कि इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 0.9 से लेकर 1.9 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। विश्व बैंक कि एक रिपोर्ट कहती है कि माल ढुलाई में चुंगीनाकों और हर जगह रोकटोक से एक-चौथाई समय जाया हो जाता है क्योंकि अब करीब 90 प्रतिशत ढुलाई ट्रकों से होती है। यह समय बचेगा तो व्यापार तेज होगा और बाजार तथा पूंजी निवेश बढ़ेगा। उम्मीद यही है कि ये कयास पूरे हों मगर सरकार को इसके उपाय भी ढूंढने चाहिए कि महंगाई न बढ़े, ताकि गरीबों को और ज्यादा न सहना पड़े।

हरिमोहन मिश्र   

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