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आतंक के साए में कश्मीर

आतंक के साए में कश्मीर

आतंकी बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत से अलगाववादियों, मुख्यधारा की राजनीति के आवरण में छुपे नरमपंथी अलगाववादियों और बौद्धिक जगत तथा मीडिया में उनसे सहानुभूति रखने वालों की मानसिकता उजागर कर दी है।

बुरहान को शहीद बताने वाले नवाज शरीफ की राय उसके भारतीय हितैषियों से मेल खाती है। ये लोग भी एक खूंखार आतंकी के सफाए से खुश नहीं हैं। उन सुरक्षा बलों या पुलिसवालों के लिए उनके मन में रत्ती भर सम्मान या अफसोस नहीं है, जिन्हें पाकिस्तान समर्थकों की भीड़ ने उनकी गाडिय़ों के साथ उफनती झेलम में फेंक दिया।

यह विचित्र है कि भारत में ऐसे लोगों के मन में हिजबुल मुजाहिदीन आतंकी के लिए दर्द और आंखों में आंसू हैं जो सुरक्षा बलों की ही नहीं, अपने मुस्लिम विरोधियों (सरपंचों) की हत्या का भी जश्न मनाता था। कई कश्मीरी लड़कियां उसकी वासना का शिकार हो चुकी हैं। ऐसे लोगों के रवैए से सिर्फ पाकिस्तान में हिजबुल मुजाहिदीन को ही ताकत मिलती है, जो 1989 से ही भारत और कश्मीर में कहर बरपा रहा है।

बुरहान की मौत से आतंक घाटी में खुलकर बाहर आ गया। कश्मीर घाटी में प्रदर्शनकारियों के वेश में छुप कर सामने आने का तरीका जेहादी लंबे अरसे से अपना रहे हैं। ये आतंकी सुरक्षा चौकियों पर सुरक्षा बलों पर जानलेवा पत्थरबाजी करते हैं। यह पत्थरबाजी हथगोलों से ज्यादा घातक है। किसी नदी के किनारे राष्ट्र-विरोधियों की भीड़ की यह हरकत सुरक्षा बलों का कोई गैरतमंद जवान बर्दाश्त नहीं करेगा, जिस पर देश की एकता की रक्षा की जिम्मेदारी है। ये राष्ट्रविरोधी तत्व घाटी को पाकिस्तान में मिलाने की ख्वाहिश रखते हैं, लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं है कि ऊंचे पर्वतों से चारों ओर उन पर देशभक्तों की नजर है। इस हकीकत से कश्मीरियत छुप नहीं जाती कि मुसलमान बहुसंख्या में हैं। घाटी में ऐसे लोग भारी संख्या में हैं जो पाकिस्तान का राग नहीं अलापते। इनमें वे लोग हैं जो मुसलमान होने के बावजूद अपने हिंदू पुरखों और कश्मीरियत की गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रति आदर रखते हैं। कश्मीरियत ही घाटी की संस्कृति और पहचान है, न कि इस्लाम। आखिरकार महान शायर मोहम्मद इकबाल, जो बाद के दिनों में पाकिस्तान की विचारधारा के प्रबल समर्थक बन गए थे, मशहूर तेज बहादुर सप्रू के खानदान से ही थे। आजाद भारत की कल्पना ‘भारतीय इस्लाम’ के साथ की गई थी, जिसका कश्मीरियत अभिन्न अंग है।

इसी कश्मीरियत पर पाकिस्तान के शह से इस्लाम की अपनी कट्टर वहाबी धारा के साथ हमला बोला और घाटी से कश्मीरी हिंदुओं को भगाकर उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया। कश्मीरी  हिंदुओं की संख्या 5 लाख थी। वह भारत में आतंक का सबसे खूंखार दौर था। फिर भी कश्मीरी हिंदुओं को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने दो दशक से अपने आंसुओं और दर्द को आतंक में नहीं तब्दील होने दिया। उनके भीतर से एक भी ‘बुरहान’ पैदा नहीं हुआ, लेकिन इस ‘जातीय सफाए’ के बाद घाटी में जेहादियों की कमी नहीं रही। तो, वजह क्या है? क्या जेहाद भारत के खिलाफ है? आखिर एक ‘नाकाम’ राज्य और धरती पर नरक के समान पाकिस्तान के लिए इतनी ख्वाहिश क्यों है? तो, क्या मामला मजहबी नहीं है? पाकिस्तान जेहाद को अपने छद्म युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है, यह सबको पता है, लेकिन घाटी में इस हथियार का कारखाना कौन चला रहा है, जो जेहादियों के लिए चारा और  पाकिस्तान के लिए फिदायीन मुहैया  करा रहा है? क्या ये कारखाने घाटी की राजनैतिक पार्टियों और नेताओं की गुपचुप शह के बिना चल सकती हैं? इस मामले में बुरहान वानी के सफाए पर उमर अब्दुल्ला की राय से सारे भ्रम दूर हो जाते हैं।

उमर अब्दुल्ला के मुताबिक बुरहान की कब्र (एक आतंकवादी की कब्र) घाटी में नौजवानों की नई एकजुटता की वजह बनेगी। उमर भारतीय सुरक्षा बलों की सुरक्षा में जीते हैं। सुरक्षा बलों का यह कर्तव्य है कि भारत के खिलाफ युद्ध छेडऩे वाले आतंकवादियों को उनके अंतिम मुकाम यानी कब्र में पहुंचा दिया जाए, बशर्ते वे समर्पण को तैयार न हों।

बुरहान कांड और उसके बाद का घटनाक्रम एशिया और यूरोप में जेहादी आतंक की घटनाओं का एक साजिशी सिलसिला है। इसके साथ  इंस्ताबुल, बगदाद, काबुल, ढाका और मक्का में भी धमाके हुए। इन ज्यादातर आतंकी हमलों में पाकिस्तान की शिरकत दिखती है। निशाने पर विदेशियों के अलावा वे मुसलमान थे, जो इस्लाम के वहाबी पंथ में यकीन नहीं करते। ढाका में फिदायिन हमलावरों ने तो पीडि़तों का गला रेत दिया। कुछ मुसलमान भी मारे गए, क्योंकि उन्हें कुरान की आयतें याद नहीं थीं। फ्रांस में बिना विस्फोटकों के ट्रक ने बेकसूर लोगों को रौंद दिया। इससे जेहादियों के नए पहलू का पता चलता है जो वित्तीय मदद या विस्फोटकों की पहचान की गुंजाइश भी नहीं छोड़ता। यूरोप वहाबी पंथ का इसलिए निशाना बन रहा है, क्योंकि वहां मुस्लिम बस्तियां बढ़ रही हैं और उनके बहुसंख्यक समाज से सभी सामाजिक और धार्मिक रिश्ते टूट चुके हैं। इनमें पनप रही जेहादी भावना को पता बमुश्किल ही चल पाता है, क्योंकि सुरक्षा बल भी इन बस्तियों में जाने से घबराते हैं। कश्मीरी हिंदुओं के निकाले जाने के बाद घाटी भी ऐसी ही मुस्लिम बस्ती में बदल गई है।

जेहादी आतंक की सबसे बड़ी पूंजी उनकी खास मजहबी पहचान है। इस विचारधारा के साये यूरोप, अफ्रीका, पश्चिम एशिया, बांग्लादेश, दक्षिण पूर्व एशिया, कश्मीर घाटी और भारत के कुछ दूसरे हिस्सों में फैले हुए हैं। यह दोहराने की दरकार है कि घाटी में भी वही साया पसरा हुआ है। पाकिस्तान में इस्माइली शियाओं की हत्या करने वाले जेहादी आतंकवादियों और ढाका के हत्यारों की तरह ही कश्मीरी नौजवान भी आतंकवादी बन रहे हैं। ये भले ही उतने शिक्षित या संपन्न न हों मगर किसी मायने में बाकी भारत के नौजवानों से कमतर नहीं हैं।

इसलिए कश्मीर में हाल के घटनाक्रम को जानबूझकर निहितस्वार्थी तत्वों ने वहां आजादी की लड़ाई की तरह पेश किया, जबकि सच्चाई यही है कि वह व्यापक वैश्विक जेहादी मकसद का ही हिस्सा है। अगर यह व्यापक इस्लामी जेहाद का हिस्सा नहीं होता तो वहां जुम्मे की नमाज के बाद इस्लामिक स्टेट या लश्करे तैयबा या पाकिस्तानी झंडे नहीं लहराए जाते। दरअसल आतंकवाद को भारत के खास संदर्भ में पेश करने के लिए राजनीति और राजनैतिक प्रक्रियाओं की दरकार है। इसी मायने में घाटी आधारित पार्टियां नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी की भूमिका संदिग्ध है। शायद यह भूमिका उन्हें देश से बाहर की ताकतों ने बख्शी हो। इनमें एक ताकत तो बेशक पाकिस्तान है, लेकिन चीन की जम्मू-कश्मीर में रणनीतिक दिलचस्पी को देखकर उस पर भी संदेह होता है।

घाटी में दो खानदान आधारित पार्टियां लंबे समय से बारी-बारी से सत्ता में हैं। अपने घोषित राजनैतिक एजेंडे के मुताबिक अगर उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद पर जोर दिया होता तो जम्मू-कश्मीर में स्थानीय और मजहबी एकता कायम हो पाती और वह मुख्यधारा की राष्ट्रीय धारा का हिस्सा बन पाते और पाकिस्तान से दूर रहता। फर्ज कीजिए कि अगर पाकिस्तान कामयाब और संपन्न देश होता तो घाटी के हालात क्या होते? क्या घाटी की पार्टियां ”नाकाम पाकिस्तान’’ को ”उभरते भारत’’ के बरक्स रखकर मलाई काटना चाहती हैं?

तथाकथित जम्मू-कश्मीर समस्या पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य की एक भौगोलिक विडंबना का नतीजा है, जिसमें भारत के तहत और पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर दोनों आता है। कश्मीर घाटी तो इस पूरे जम्मू-कश्मीर का महज 8 प्रतिशत है और इसमें भी महज 2 प्रतिशत इलाका ‘बुरहान कांड’ से प्रभावित है। भारत के तहत 98 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर तो एकदम शांत है। जम्मू में हिंदू बहुसंख्या, करगिल में शिया बहुसंख्या और लद्दाख में बौद्ध एकदम शांत हैं। जम्मू, लद्दाख और करगिल इलाकों की तरह कश्मीर घाटी किसी बाहरी सीमा से नहीं लगती। दरअसल पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा से सटे लोगों को ही पिछले सात दशकों से तकलीफें झेलनी पड़ी हैं।

14-08-2016

आजादी के समय से ही घाटी के राजनीति यह झूठ फैला रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर अशांत है। चीन को पाकिस्तानी कब्जे वाले हिससे से गिलगित-बाल्तीस्तान का इलाका चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के बहाने चीन को सौंप रहा है। बाकी छोटे-से पीओके में कोई कश्मीरी नहीं बचा है। गिलगित-बाल्तीस्तान के शिया लगातार अपमान झेल रहे हैं। उनकी बहुसंख्यक स्थिति भी खत्म करने की कोशिश की जा रही है। उन्हें करगिल की लड़ाई में इस्तेमाल किया गया और उनके शवों को लेने से इनकार कर दिया गया। कथित तौर पर अपने पीओके के भाईयों की इस दुर्दशा के प्रति कश्मीर घाटी में एक आंसू भी नहीं बहा।

घाटी ही आतंक की पौधशाला बनी हुई है। यह सब स्थानीय नेताओं, मदरसों, मौलवियों, मस्जिदों और अलगाववादियों की निगहबानी में हो रहा है। मुल्ला-मौलवी-मदरसे पाकिस्तान आधारित लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद वगैरह आतंकी संगठनों से शह पाते हैं, ताकि रंगरूटों को भर्ती करके उन्हें फिदायीन बनाया जा सके। ऐसा ही तंत्र पश्चिमी पाकिस्तान में भी बन गया है जो तालिबान को अफगानिस्तान में छद्म युद्ध में फिदायीन की आपूर्ति करता है। भारत में कश्मीर घाटी और अफगानिस्तान इस तरह पाकिस्तानी जेहादी तंत्र का शिकार है। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी भी इन दोनों समस्याओं को एक ही नजर से देखती है। पाकिस्तानी फौज दुनिया में सबसे कायर सेना है। वह भारत और पाकिस्तान से कभी परंपरागत युद्ध नहीं करेगी। वह सिर्फ फिदायीन हमलावर उनको बनाती है जो मदरसों में पढ़ते हैं, जबकि फौजियों के बेटे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और पश्चिम की ओर रुख कर लेते हैं। कश्मीर घाटी के एलिट का रवैया भी इससे अलग नहीं है।

यह हमेशा नहीं चल सकता। इसलिए, अब एक नई समस्या आ खड़ी हुई है। अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े बच्चे भी फिदायीन बन रहे हैं। इस्लामिक स्टेट ने अपनी खतरनाक विचारधारा को फैलाने के लिए अंग्रेजी को जरिया बनाया है। अब ये इस काम को इंटरनेट के जरिए भी करने लगे हैं। जाकिर नाईक का फिनामिना कोई अचानक नहीं है। दरअसल हाफिज सईद या मुल्ला मसूद अजहर जो आग देसी भाषा में उगलते हैं, वही जाकिर नाईक अंग्रेजी में करते हैं। ढाका के हत्यारे नाईक से प्रभावित थे। वही काम वे भारत और बाकी दुनिया में कर रहे हैं। कश्मीर के नेताओं और अलगाववादियों पर इसीलिए नजर रखने की दरकार है।

कश्मीर और पटना की रैलियों में जाकिर नाईक के बैनर दिखाई पड़े हैं। हम भारत में वैश्विक जेहादी कैंसर को फैलने का मौका नहीं दे सकते।

तो, हल क्या है?

इस सवाल का जवाब वैचारिक पहलुओं से ही निकल सकता है। कश्मीर की समस्या का हल कश्मीरियत को गले लगाने में है। व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में भारतीय इस्लाम की धारा को फिर जीवित करने की दरकार है, जिसकी जड़ें इस देश की मिट्टी में हैं। हिंदू और इस्लामी संस्कृतियों के मेल से जन्मी साझा संस्कृति ईरान के जरिए आई है। अरबी असर तो बहुत छोटा-सा है। ईरान और संस्कृत की परंपराओं के मेल से उर्दू भाषा ने जन्म लिया और भारतीय संगीत और कला काफी समृद्ध हुई है। इसी संस्कृति को लेकर तारिक फतह जैसे बुद्धिजीवी भावुक अपील करते हैं। पाकिस्तान ने इस गंगा-जमुनी संस्कृति को छोड़कर खुद को तबाही के कगार पर ले पहुंचा है। राजनयिक एम.के. रसगोत्रा ने अपनी किताब ‘ए जाइफ इन डिप्लोमेसी’ में पाकिस्तान के बारे में लिखते हैं, ”मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग उठा रहा था और मुखर्जी (श्यामा प्रसाद) ने मुख्य सत्र में इस विषय पर बोलने को कहा। करीब बीस मिनट में मैंने तीन-चार बातें कहीं : धर्मांतरितों का अलग देश की मांग करना बेमानी है, दो अलग-अलग हिस्सों से बने देश की आर्थिक स्थिति सही नहीं हो सकती, जिन्ना को वे इलाके कभी नहीं मिल पाएंगे जिन पर वे दावा कर रहे हैं, और यह कि पाकिस्तान अंग्रेजों की साजिश का हिस्सा है, ताकि इस देश को कमजोर किया जा सके और वह हमेशा ब्रिटेन पर निर्भर रह सके।’’

तारिक फतह यह सही ही कहते हैं कि वे भारतीय तो 5,000 साल से हैं मगर पाकिस्तानी तो महज कुछ दशकों से हैं। भारतीय इस्लाम की इससे बेहतर व्याख्या नहीं हो सकती। हालांकि हमारे एक प्रमुख राजनेता तारिक फतह की बातें को बेजा मानते हैं, क्योंकि यह वहाबी इस्लाम की धारा से अलग है जो पेट्रो डॉलर पर पलती है और वोट दिलाती है। अगर तारिक फतह पाकिस्तान विरोधी नहीं होते तो वे भारतीय राजनेताओं की नाराजगी का शिकार नहीं होते।

मध्य एशिया के देश अपने यहां वहाबी  धारा को खारिज कर चुके हैं, क्योंकि वह उनकी संस्कृति में फिट नहीं बैठता। तजाकिस्तान जैसे देशों ने दाढ़ी और बुर्के पर पाबंदी लगा दी है, क्योंकि यह ताजिक संस्कृति का हिस्सा नहीं है। इसलिए भारत में जेहादी आतंकवाद का वैचारिक और राजनैतिक हल तलाशना होगा।

आर.एस.एन. सिंह

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