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पाकिस्तान को दो टूक जवाब

पाकिस्तान को दो टूक जवाब

राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान जाकर बहुत अच्छा किया। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह कहकर काम नहीं चलता कि आप सदा ‘कुट्टी’ करके बैठे रहेंगे और संबंधों की औपचारिकताएं भी नहीं निभाएंगे। फिर ये तो दक्षेस देशों की बैठक थी। याद रखना चाहिए कि शीतयुद्ध के दौरान सोवियत संघ और अमेरिका भी आपस में बात करते थे। इसलिए गृहमंत्री को उन आलोचनाओं पर कान नहीं देना चाहिए, जो कह रहे हैं कि उन्हें पाकिस्तान नहीं जाना चाहिए था। मूल बात यह है कि वहां जाकर उन्होंने क्या किया? क्या उन्होंने औपचारिकताओं में पड़कर राजनयिकों की तरह घुमा-फिरा कर बात की या फिर मजबूती के साथ भारत की बात रखी?

मुझे इंटरनेट पर एक पाठक की यह टिप्पणी बहुत ही सार्थक लगी। उसने लिखा है ”राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के सबसे बड़े उद्योग पर कड़ा प्रहार किया। वह उद्योग जिसकी पाकिस्तान की जीडीपी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है यानी आतंकवाद।’’ भारत के गृहमंत्री को इस बात के लिए 100 में से 100 नंबर दिए जाने चाहिए कि वे बेकार के दिखावे में नहीं पड़े, न तो पाकिस्तान के गृहमंत्री निसार अली खान से मिलते हुए और न ही अपनी बात कहते हुए। उन्होंने कहा कि एक देश का आतंकवादी दूसरे देश के लिए स्वतंत्रता सेनानी नहीं हो सकता। राजनाथ सिंह ने नाम तो नहीं लिया मगर इशारा साफ था। एक तरफ पाकिस्तान आतंकवाद से लडऩे का नाटक करे और दूसरी तरफ भारत के खिलाफ हथियार उठाने वाले आतंकवादी बुरहान वानी को स्वतंत्रता सेनानी बताये ये कैसे चलेगा? उसके लिए पाकिस्तान मे बंद आयोजित किया जाए ये कैसा दोगलापन है?

ये सही है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को अपनी विदेश नीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया है और ये भी सही है कि अब खुद पाकिस्तान भी इस आतंकवाद का शिकार हो रहा है। पकिस्तान जब तक कश्मीर और भारत को लेकर अपनी नीति मे बुनियादी बदलाव नहीं लाएगा, वह इस मुश्किल से बहार नहीं निकल सकता। आज तो वह दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा निर्यातक देश बनकर रह गया है। किसी वक्त दुनिया उसके झांसे में आ भी जाती थी, मगर आज तो उसके आतंक के व्यापारी सऊदी अरब तक जाकर ये खूनी खेल खेलने लगे हैं। अगर सऊदी भी पाकिस्तान से किनारा कर लेगा तो फिर उसका क्या होगा?

यहां राजनाथ सिंह ने जो दूसरी नसीहत पाकिस्तान को दी है, अगर वह उस पर अमल करे तो वह खुद के बनाये इस खूनी जंजाल से बाहर निकल सकता है। राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में कहा कि आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी होता है। आप एक आतंकवादी को अच्छा कहकर गले नहीं लगा सकते और दूसरे को बुरा कहकर मार नहीं सकते। बात साफ है। पाकिस्तान आतंकवाद को टुकड़ों में बांटकर नहीं देख सकता। अगर कश्मीर में हथियार उठाने वालों को पाकिस्तान स्वतंत्रता सेनानी बोलेगा तो फिर पख्तूनियों और बलूचियों के लिए लडऩे वाले भी तो यही तर्क दे सकते हैं? यानी आप हमेशा मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू नहीं कर सकते।

वैसे तो पाकिस्तान ने राजनाथ सिंह के भाषण के बाद ही भारत और कश्मीर को लेकर अपनी घिसी-पिटी बातें दोहरा दीं। ऐसा अपेक्षित ही था। और आप उम्मीद भी नहीं करते कि अचानक एक देश अपनी वो भाषा बदल देगा जो वह 60 साल से बोलता आया है। मगर यह पाकिस्तान के लिए ही बेहतर होगा कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पूरे भारत की भावना को अभिव्यक्त किया है उस पर वह ठंडे दिमाग से गौर करे और अपनी नीतियों में बदलाव लाये। नहीं तो पाकिस्तान के लिए आने वाला अंतरराष्ट्रीय माहौल ठीक नहीं होगा। कश्मीर में वह भारत को जितना नुकसान पहुंचा सकता था, पहुंचा चुका है। भारत में इससे निपटने की इच्छाशक्ति, ताकत, कौशल, साधन, धैर्य और हौसला है। मगर पाकिस्तान नहीं बदला तो शायद वह संभल नहीं पायेगा।

उमेश उपाध्याय

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