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बाढ़ के बाद सोच क्या?

बाढ़ के बाद सोच क्या?

प्रकृति का कहर ऐसे टूटा मानो देव हम पर अपनी नाराजगी उतार रहे हैं। देश के विशाल हिस्से-कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में तबाही का मंजर पसरा हुआ है। बरसात की लगभग शुरुआती बारिश से ही पस्त इन राज्यों को खतरे का संकेत पहले ही भांप लेना चाहिए था। सबसे बुरा हाल तो देश के आईटी हब बेंगलूरू का हुआ जब पिछले हफ्ते वहां तीनों झीलें उफनने लगीं। हाल के वर्षों में बेंगलूरू आईटी क्षेत्र में आए भारी उछाल और अपने सुहाने मौसम की वजह से विकास की ऊंची छलांग लगा चुका है। लेकिन, इस बार बाढ़ का कहर टूटा तो शहर की नगरपालिका और सरकारी मशीनरी के हाथ-पांव फूल गए, क्योंकि उनके पास इसके लिए कोई तैयारी ही नहीं थी। आखिर उन्होंने बिल्डिंग प्लान मंजूर करने और शुल्क तथा घूस उगाने के अलावा किसी और मामले में ध्यान ही नहीं दिया था। उन्होंने यह तक नहीं सोचा कि सड़कों की डिजाइन शहर की आबादी और ट्रैफिक का अंदाजा लगाकर बनाई जानी चाहिए। वही क्यों, औद्योगिक केंद्र गुरुग्राम में 28-29 जुलाई की रात कयामत सरीखी बन गई। वहां भारी बारिश से लोग दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेस-वे पर 12 घंटे से अधिक ट्रैफिक जाम में फंसे रहे। पूरी रात सड़क पर काट चुके लोगों ने गुरुग्राम को ‘गुरुजाम’ कहना शुरू कर दिया। योजनाकारों के लिए यह शर्म की बात है कि उन्होंने ड्रेनेज और इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी दूसरे मामलों पर ध्यान नहीं दिया और अनाप-शनाप आवास और सड़क परियोजनाओं को मंजूरी देते रहे। इससे बिल्डरों की चांदी हो गई। उनकी और हाइवे परियोजनाओं की दनादन मंजूरी देते हुए सार्वजनिक सुविधाओं और सुरक्षा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

यह भी गौर करने लायक है कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम में प्रकृति से अधिक हमारी व्यवस्थाओं की वजह से तबाही अधिक हुई। बेहिसाब पनबिजली परियोजनाओं, लगातार बढ़ते पर्यटन उद्योग, खासकर विशेष अवसरों पर धार्मिक पर्यटन की सहूलियत के लिए सड़कों के निर्माण, भवन निर्माण की गैर-परंपरागत तकनीकों के इस्तेमाल, नदियों के कछार में भारी अतिक्रमण, बस्तियां वगैराह ही बाढ़ से होने वाली बर्बादी को बेहिसाब बढ़ा गया है। इस तबाही में भी वही बेतुका रवैया दिखाई दिया। अगर थोड़ा-सा ध्यान दिया जाता तो शायद बर्बादी कम होती। हिमालय की क्षमताओं का सही ढंग से आकलन किया जाना चाहिए। पर्वत के बीच और किनारों से जा रही सड़कों पर भारी वाहन, मशीनरी और बेहिसब ट्रैफिक रेंगता रहता है। इससे हिमालय अस्थिर होता जा रहा है। पहाड़ की पूरी पारिस्थितिकी ही गड़बड़ा रही है। यानी हिमालय और वहां के लोग तो अनियोजित और बेपनाह पर्यटन की कीमत चुका रहे हैं। बाढ़ में बही गाडिय़ों की भारी संख्या ही बता रही है कि कितना ट्रैफिक वहां रेंगता रहता है। नदियों के किनारे ऊंची-ऊंची इमारतों और होटलों से भी यह तबाही व्यापक हुई है। लापता लोगों और उनके परिजनों का अंतहीन इंतजार देख तो दिल रो पड़ता है।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन तीनों राज्यों की सीमाएं दुश्मन देशों से लगती हैं। इसलिए हमें यहां संचार सुविधाओं और दूसरी चीजों की रणनीतिक अहमियत को ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन इस स्थिति से निपटने में प्रशासन की लापरवाही और लाचारी खतरे की घंटी की तरह है। ऐसा लगता है कि कोई तैयारी ही नहीं थी। बाढ़ के शुरुआती चरण में अधिकारी उलझन में इधर-उधर भागते नजर आए। यहां यह भी याद कर लेना जरूरी है कि बढ़ती आबादी की वजह से प्रति व्यक्ति जमीन और जल संसाधन का अनुपात घटता जा रहा है। ऊंची जगहें भरती जा रही हैं, इसलिए बाढ़ क्षेत्र में बस्तियां बसाने से बचा नहीं जा सकता। लिहाजा, बरसात में नदियां जब पूरे शबाब में बहने लगती हैं तो अनेक लोग प्रभावित हो जाते हैं। शहरों में तो इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों के कारण पानी निकासी की जगहें भी भरती जा रही हैं जिससे बाढ़ का कहर टूट पड़ता है। इस विशाल आबादी के लिए विकास की जरूरतों की वजह से प्रकृति से भारी छेड़छाड़ की जा रही है। इसका नतीजा यह होता है कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई है। इससे जलवायु परिवर्तन के भारी दुष्परिणाम दिख रहे हैं।

वैसे, हर बारिश में हम ग्रामीण और शहरी इलाकों में बाढ़ और उससे जानमाल की बर्बादी की बातें शुरू कर देते हैं, लेकिन बरसात बीतते ही हम उसे भुलाकर अपनी आम गतिविधियों में उलझ जाते हैं और समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। यह एक भारी दुश्चक्र की तरह बन गया है। इस हालात से निपटने के लिए कई तरह के उपाय करने की दरकार है। मौजूदा जल क्षेत्रों को गाद से मुक्त करना होगा। नए जल वहन क्षेत्रों का भी निर्माण करना होगा, नहरों की व्यवस्था कायम करनी होगी और नदियों को आपस में जोड़कर जल का प्रवाह दुरुस्त करना होगा। खासकर नदी जोड़ परियोजना में राज्य सरकारों को भी सक्रिय  होना होगा। इसके अलावा हर इलाके की विशेष परिस्थिति को ध्यान में रखकर लंबी अवधि की योजनाएं बनानी होंगी। मौसम की भविष्यवाणियों की व्यवस्था भी सुधारनी होगी। फिर आबादी और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों की बेहिसाब वृद्धि को रोकना होगा। हालांकि इन इलाकों में आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर निर्माण और विकास होने हैं। इसलिए इस बार तो हमें पूरी योजना और टिकाऊ विधियों पर ध्यान देना चाहिए। ऐसा करके ही हम तबाही के दुश्चक्र से बाहर आ सकते हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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