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तुलसी कौन थीं?

तुलसी कौन थीं?

लसी (पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थीं जिनका नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थीं। बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थीं। जब वह बड़ी हुईं तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था।

वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थीं सदा अपने पति की सेवा किया करती थीं। एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगा तो वृंदा ने कहा-स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं आप जब तक युद्ध में रहेंगे में पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करूंगी, और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोड़ूंगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयीं, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता। फिर देवता बोले-भगवान दूसरा कोई उपाय भी नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

28-08-2016भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पंहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गईं और उनके चरणों को छू लिया, जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया। जलंधर का सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूछा- आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गईं, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।

सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्रार्थना करने लगीं तब वृंदा ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयीं।

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।

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