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संत श्री मोरारी बापू जिनका जीवन है तनावों की भीड़ में शांति का संदेश

संत श्री मोरारी बापू  जिनका जीवन है तनावों की भीड़ में शांति का संदेश

धार्मिक जगत के इतिहास में संत श्री मोरारी बापू इस शताब्दी के एक दुर्लभ व्यक्तित्व हैं। उनकी जीवनगाथा भारतीय चेतना का एक अभिनव उन्मेष है, आश्चर्यों की वर्णमाला से आलेखित एक कालजयी अभिलेख है। उसे पढ़कर हर कोई नये उच्छवास, नई प्रेरणा और नई प्रकाश शक्ति का अनुभव करता है। उनका जीवन और उनके उपदेश तनावों की भीड़ में शांति का संदेश हैं। अशांत मन के लिए समाधि का नाद हैं। चंचल चित्त के लिए एकाग्रता की प्रेरणा हैं। संघर्ष के क्षणों में संतुलन का उपदेश हैं। मोरारी बापू ऐसी संत चेतना हैं जो स्वयं जागृत हैं और सबके भीतर सत्य का आलोक बिखेरने का प्रयास करते हैं। वे जगत को श्रीराममय बनाने में जुटें हैं।

सम्पूर्ण मानवता के सामने अपने अप्रतिम, अलौकिक व अखण्ड ज्ञान की पताका फहराने वाले मोरारी बापू अपने विशिष्ट अंदाज में रामकथा का रसास्वादन करवाते हैं। देश-विदेश के लाखों लोगों को जीवनदर्शन का सही मार्ग बताने वाले बापू का जन्म 25 सितंबर, 1946 के दिन महुआ के समीप तलगारजा (सौराष्ट्र) में वैष्णव परिवार में हुआ। दादाजी त्रिभुवनदास का रामायण के प्रति असीम प्रेम था। तलगारजा से महुआ वे पैदल विद्या अर्जन के लिए जाया करते थे। 5 मील के इस रास्ते में उन्हें दादाजी द्वारा बताई गई रामायण की 5 चौपाइयां प्रतिदिन याद करनी पड़ती थीं। इस नियम के चलते उन्हें धीरे-धीरे समूची रामायण कंठस्थ हो गई। यही कारण है कि रामचरित मानस बापू के जीवन में रच-बस गयी। विद्यार्थी जीवन में उनका मन पढ़ाई के अभ्यास में कम, रामकथा में अधिक रमने लगा था। बाद में वे महुआ के उसी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक बनें, जहां वे बचपन में विद्यार्जन किया करते थे, लेकिन बाद में उन्हें अध्यापन कार्य छोडऩा पड़ा, क्योंकि रामायण के पाठ में वे इतना डूब चुके थे कि समय मिलना कठिन था।

रामचरित मानस को सरल, सहज और सरस तरीके से प्रस्तुत करने वाले 62 वर्षीय बापू की सादगी, रामभक्ति एवं आध्यात्मिक निष्ठा का कोई सानी नहीं है। उन्हें हम वर्तमान का तुलसीदास कह सकते हैं। पूरे विश्व में श्रीराम का तेजी से प्रचार किया एवं राम नाम को विश्वव्यापी बना दिया। वे भारतीय दर्शन, आध्यात्म, संस्कृति के संरक्षक एवं ऋषि परंपरा के जीवंत स्वरूप, उसके प्रतिनिधि, शाश्वत दिव्य शक्ति हैं। वे वैदिक संस्कृति के शाश्वत मूलाधार हैं।

मोरारी बापू का विवाह सावित्री देवी से हुआ। उनके चार बच्चों में तीन बेटियां और एक बेटा है। पहले वे परिवार के पोषण के लिए रामकथा से आने वाले दान को स्वीकार कर लेते थे, लेकिन जब यह धन बहुत अधिक आने लगा तो 1977 से प्रण ले लिया कि वे कोई दान स्वीकार नहीं करेंगे। इसी प्रण को वे आज तक निभा रहे हैं।

श्रीराम का चरित्र भारतीय जनमानस के बहुत करीब रहा है, लेकिन मोरारी बापू की वाणी में सुनते हुए यह कथा और भी अद्भुुत और हृदयग्राही बन जाती है। उनके मुख से श्रीराम के गुणगान सुनना साक्षात राम के चरित्र का साक्षात्कार करने जैसा है। राम के जीवन के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन पता नहीं बापू की वाणी में ऐसा कौन-सा जादू है, जो श्रोताओं और दर्शकों को बांधे रखता है। वे कथा के जरिये मानव जाति को सदकार्यों के लिए प्रेरित करते हैं। सबसे बड़ी खासियत तो यह है कि उनकी कथा में न केवल बुजुर्ग  मौजूद रहते हैं, बल्कि युवा वर्ग भी काफी संख्या में मौजूद रहता है। वे न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी मानव उत्थान और उन्नयन के लिए रामकथा की भागीरथी को प्रवाहित कर रहे हैं। वे समस्त उपनिषदों, भगवतादि पुराणों, ब्रह्मसूत्र, रामायण आदि के बारे में धाराप्रवाह बोलते हैं, तो सभी श्रोता उनके प्रवचन सुनकर- चाहे टीवी के माध्यम से, चाहे व्यक्तिगत रूप से वे हृदय से स्वीकार करते हैं कि ऐसे अलौकिक प्रतिभा संपन्न विद्वान आज तक नहीं हुए।

भारत सदा से विश्व का आध्यात्मिक गुरु रहा है और आज भी है। समस्त महान मनीषी, साधु-संत, त्रिकालदर्शी ऋषि और मुनियों को जन्म देने का सौभाग्य भारत को ही मिला है। इसी शृंखला में बापू एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो व्यष्टि और समष्टि को प्राण देने में समर्थ हैं। उन्होंने कभी स्वयं में कार्यक्षमता का अभाव नहीं देखा। क्यों, कैसे, कब, कहां जैसे प्रश्न कभी सामने आए ही नहीं। हर प्रयत्न परिणाम बन जाता कार्य की पूर्णता का, इसीलिए उनका जीवनवृत्त कहता है कि श्रीराम की भक्ति संकल्प देती गई और मुरारी बापू उन्हें साधना में ढालते रहे। उनके पुरुषार्थ ने उन लोगों को जगाया है, जो सुखवाद और सुविधावाद के आदी बन गये हैं और संबोध दिया है उन लोगों को जो जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को कल पर छोड़ देने की मानसिकता से घिरे हैं जबकि जीवन का सच सिर्फ यही क्षण है, जीवन का सत्य पुरुषार्थ है। वे श्रीराम को जीवनशैली बनाने के अभियान पर हैं, वे रामराज्य चाहते हैं। उनका मानना है कि श्रीराम ईश्वर हैं, पर उनसे पहले सफल, गुणवान और दिव्य मनुष्य है। संयम, संतुलित और निजी सुखों को त्याग कर न्याय और सत्य का साथ देने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम का सम्पूर्ण जीवन अनुकरणीय है। केवल श्रीराम को उपदेश तक सीमित करना बापू के प्रवचनों का ध्येय नहीं है। वे चाहते हैं कि हम रोजमर्रा का कामकाज जिस तरह करते हैं, उसमें श्रीराम झलकने चाहिए। हमारा नेतृत्व कैसा है, रिश्तों पर हमारा कितना यकीन है, दूसरों की भावनाओं को हम कितनी तवज्जों देते हैं- इन सबमें श्रीराम का जीवन सामने आना चाहिए। खुद में सिमटे रहे तो ‘राम’ की तरह देवत्व प्राप्त करना छोडिय़े, ‘आम’ आदमी भी न रह सकेंगे।

मोरारी बापू का जीवन संयम, सादगी, त्याग और समर्पण का विलक्षण उदाहरण है। उनका दिखावा और प्रदर्शन में विश्वास नहीं है। कथा करते समय वे केवल एक समय भोजन करते हैं। उन्हें गन्ने का रस और बाजरे की रोटी काफी पसंद है। वे वसुधैव कुटुम्बकम एवं सर्वधर्म समन्वय के प्रेरक हैं। बापू समस्त धर्मों, परंपरपराओं एवं संस्कृति के समन्वय को महत्व देते हैं। सर्वधर्म सम्मान की लीक पर चलने वाले मोरारी बापू की इच्छा रहती है कि कथा के दौरान वे एक बार का भोजन किसी दलित के घर जाकर करें और कई मौकों पर उन्होंने ऐसा किया भी है। बापू ने जब महुआ में स्वयं की ओर से 1008 रामायण का पाठ कराया तो पूर्णाहुति के समय हरिजन भाइयों से आग्रह किया कि वे नि:संकोच मंच पर आएं और रामायण की आरती उतारें। तब डेढ़ लाख लोगों की धर्मभीरु भीड़ में से कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया और कुछ संत तो उठ कर चले भी गए, लेकिन बापू ने हरिजनों से ही आरती उतरवाई। सौराष्ट्र के ही एक गांव में बापू ने हरिजनों और मुसलमानों का मेहमान बनकर रामकथा का पाठ किया। वे यह बताना चाहते थे कि रामकथा के हकदार मुसलमान और हरिजन भी हैं। बापू की रामकथाओं का उद्देश्य है- धर्म का उत्थान, उसके द्वारा समाज की उन्नति और भारत की गौरवशाली संस्कृति के प्रति लोगों के भीतर ज्योति जलाने की तीव्र इच्छा।

मोरारी बापू सादगी की अद्भुत मिसाल है। उनके कंधे पर रहने वाली ‘काली कमली’ (शॉल) के विषय में अनेकानेक धारणाएं प्रचलित हैं। एक धारणा यह है कि काली कमली स्वयं हनुमानजी ने प्रकट होकर प्रदान की, तो वहीं कुछ लोगों का मानना है कि यह काली कमली उन्हें जूनागढ़ के किसी संत ने दी, लेकिन मोरारी बापू इन मतों के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं कि काली कमली के पीछे कोई रहस्य नहीं है और न ही कोई चमत्कार। मुझे बचपन से काले रंग के प्रति विशेष लगाव रहा है और यह मुझे अच्छी लगती है, इसलिए इसे मैं कंधे पर डाले रखता हूं।

मुरारी बापू असांप्रदायिकता के प्रेरक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के अधिष्ठाता हैं। सृजनात्मक दृष्टि, सकारात्मक चिंतन, स्वच्छ भाव, शिवंकर शक्ति एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण से प्रभावित करने वाले युगद्रष्टा ऋषि है।

ललित गर्ग

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