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अब ईसाई भी छोडऩे लगे पाकिस्तान

अब ईसाई भी छोडऩे लगे पाकिस्तान

”आप अब आजाद हैं पाकिस्तान के राज में अपने मंदिर में जाने के लिए। अपने मस्जिद में जाने के लिए या किसी भी इबादतगाह की ओर रुख करने के लिए। आप किसी भी मजहब, जाति से ताल्लुक रखते हों इससे राज्य के कारोबार का कोई लेना देना नहीं है।’’ यह अंश है 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के बहुचर्चित भाषण का। इस भाषण के कारण कहा जाता है कि जिन्ना भले ही अलग पाकिस्तान चाहते थे लेकिन, उनके सपनों का पाकिस्तान एक सेक्युलर पाकिस्तान था जिसमें सभी धर्मों के लोगों को पूरी धार्मिक आजादी होगी। हर कोई अपनी आस्था के मुताबिक जीवन जीने को स्वतंत्र होगा। लेकिन बाद वाले समय ने यह साबित कर दिया कि बाकी धर्मों के लोगों से किया गया यह वायदा एक खूबसूरत फरेब था। आजादी तो दूर रही पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के लिए नरक ही साबित हुआ जहां उनका जीना दुश्वार था। पहले बहुसंख्यक समाज के जुल्मों और भेदभाव के कारण हजारों हिन्दू भारत में शरण लेने को मजबूर हुए। इन दिनों ईसाई लगातार उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा और भेदभाव के बाद पाकिस्तान छोडऩे को मजबूर है और थाईलैंड वगैरह देशों में जाकर बसने की कोशिश में हैं।

पिछले दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के राजनीतिक गढ़ लाहौर के एक पार्क में आत्मघाती हमला हुआ जहां लोग ईस्टर मना रहे थे, जिसमें 72 लोग मारे गए। इनमें 14 ईसाई थे। दिसंबर 2014 के बाद यह पाकिस्तान में हुआ सबसे बड़ा हमला था। इनमें मरने वालों में भले ही मुसलमान ही ज्यादा थे, लेकिन हमलावरों का निशाना मुख्य रूप से ईसाई थे। पाकिस्तानी तालिबान के एक धड़े जमात उल-अहरार ने साफ तौर पर कहा, ‘लक्ष्य ईसाई लोग थे। हम प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को यह संदेश देना चाहते हैं कि हम लाहौर पहुंच गए हैं।’ लाहौर पाकिस्तान के सबसे धनी प्रांत पंजाब की राजधानी है और देश की राजनीति और संस्कृति का केंद्र माना जाता है। वहां भी अल्पसंख्यक असुरक्षित हो तो बाकी पाकिस्तान की तो बात क्या कहें।

 लेकिन, ईसाइयों पर ऐसा आत्मघाती आतंकी हमला पहली बार नहीं हुआ है। हाल के सालों में ईसाइयों को निशाना बनाकर कई बड़े हमले किए गए हैं।

  • मार्च 2015 में लाहौर के चर्चों में दो बम धमाके हुए थे जिनमें 14 लोग मारे गए थे और 70 घायल हुए थे।
  • 2013 में पेशावर के चर्च में हुए दो आत्मघाती धमाकों में 80 लोग मारे गए थे।
  • 2009 में पंजाब के गोजरा कस्बे में भीड़ ने 40 घरों को आग लगा दी थी। इस वारदात में आठ ईसाईयों की जलकर मौत हो गई थी। इसके अलावा भी कई छोटे-मोटे आतंकी हमले होते रहे हैं।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ईसाइयों को निशाना बनाए जाने की वजह यह है कि ईसाइ समुदाय को पश्चिम समर्थक माना जाता है और मुस्लिमों पर किसी भी तरह पश्चिमी देशों के हमले का जवाब बताकर ईसाइयों पर हमले का औचित्य साबित किया जाता है। कई विशलेषक यह मानते हैं कि 11 सितंबर और उसके बाद ईसाइयों पर हमले बढ़ गए हैं। हमले पहले भी होते थे मगर बहुत कम संख्या में और व्यक्तिगत ज्यादा होते थे।

पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों की मुश्किलें ईश-निंदा कानून ने काफी बढ़ाई। जिया-उल- हक के दौर में संशोधन करके इस कानून में मौत की सजा का प्रावधान किया गया था। अब एक हथियार के रूप में अल्पसंख्यकों, खासकर ईसाइयों के खिलाफ इसका खूब इस्तेमाल होता है। कानून की खामियां तो अपनी जगह हैं ही, दिक्कत यह भी है कि जैसे ही किसी पर ईश-निंदा का आरोप लगता है, उसके खिलाफ सामाजिक भावना यूं भड़क उठती है कि अदालत से निर्दोष साबित होने पर भी उन पर खौफ का साया मंडराता रहता है। यह बताता है कि वहां के समाज पर कट्टरपंथी सोच किस कदर हावी है। 1990 के बाद से कई ईसाइयों को कुरान का अपमान करने और पैगंबर की निंदा करने के आरोपों में दोषी ठहराया जा चुका है। 2005 में कुरान जलाने की अफवाह के बाद पाकिस्तान के फैसलाबाद से ईसाइयों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा था। हिंसक भीड़ ने चर्चों और ईसाइ स्कूलों को आग लगा दी थी।

जानकारों का कहना है कि ईसाइयों के खिलाफ ज्यादातर आरोप व्यक्गित नफरत और विवादों से प्रेरित थे। 2012 में पाकिस्तान की एक ईसाइ स्कूली छात्रा रिम्शा मसीह पहली गैर-मुसलमान बनीं थी जिसे ईशनिंदा के आरोपों से बरी किया गया था। बाद में पता चला था कि एक स्थानीय मौलवी ने उसे गलत तरीके से ईशनिंदा के आरोपों में फंसाया था। लेकिन सबसे चर्चित उदाहरण आयशा बीबी का है, जिन्हें 2010 में कुछ मुस्लिम महिलाओं से बहस करने के बाद ईशनिंदा के आरोपों में फंसा दिया गया था। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर ने कहा था कि आयशा बीबी के मामले में ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग किया गया है, लेकिन उनके ही बॉडीगार्ड मुमताज कादरी ने उनकी हत्या कर दी  जिस तरह इंदिरा गांधी की उनके बॉडीगार्ड ने हत्या कर दी थी। कादरी को पिछले दिनों ही फांसी दी गई थी उसके खिलाफ पिछले दिनो 30-40 हजार लोग सड़कों पर उतर आए थे। वे सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज कादरी को शहीद का दर्जा देने की मांग कर रहे थे। वे उसका स्मारक बनाने की मांग कर रहे थे। कादरी को फांसी दी गई, इस बात पर लोग नाराज थे।

पाकिस्तान का ईश-निंदा का कानून जितना मनमाना है, उतना दुनिया के किसी देश का नहीं है। इस कानून के जरिए दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। सलमान तासीर इसी ईशनिंदा कानून को बदलवाना चाहते थे। उन्होंने एक ईसाइ महिला के पक्ष में आवाज उठाई थी। पाकिस्तान में कोई यह मांग नहीं कर रहा है कि सलमान तासीर को शहीद घोषित किया जाए और उनका स्मारक बनाया जाए।

पाकिस्तान की न्यायपालिका और सरकार ने बड़ी हिम्मत दिखाई कि उन्होंने सलमान तासीर के हत्यारे को सजा-ए-मौत दी। सलमान की कादरी ने हत्या इसलिए की क्योंकि, उन्होंने पंजाब के राज्यपाल रहते हुए पाकिस्तान के ईश-निंदा कानून को बदलने की मांग की थी। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएं पाकिस्तान में आए दिन होने लगीं थी कि कुछ लोगों पर धर्म-द्रोह का आरोप लगाकर उन्हें कठोरतम सजा दे दी जाती थी। ये आरोप सिर्फ हिंदुओं और ईसाइयों पर नहीं, मुसलमानों पर भी थोप दिए जाते थे। ऐसा ही एक आरोप आसिया बीबी नामक ईसाई महिला पर थोपा गया और उसे मौत की सजा सुना दी गई। सलमान तासीर ने टीवी चैनल पर इंटरव्यू देते हुए इस सजा का विरोध किया, ईशनिंदा कानून को बदलने की बात कही और आसिया बीवी के लिए अदालत में याचिका भी लगा दी। इसी बात से गुस्सा होकर उनके अंगरक्षक ने उन्हें गोलियों से भून दिया। लेकिन बहुत सारे लोग इस बात से सख्त नाराज है कि आसिया बीबी जिंदा है मगर मुमताज कादरी को फांसी चढऩा पड़ा। यही गुस्सा लाहौर में ईसाइयों पर हमले के रूप में फूटा। यह अलग बात है कि उस हमले में ईसाइ कम मरे और मुस्लिम ज्यादा।

पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और ईसाइ नेता शाहबाज भट्टी की तालिबान ने ईशनिंदा कानून का विरोध करने पर 2011 में हत्या कर दी थी।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को किस तरह अपमानित व प्रताडि़त किया जाता है, इसकी मिसाल खैबर पख्तूनख्वा सूबे में सफाई कर्मियों की नौकरी के लिए निकला वह विज्ञापन था, जिसमें सौ फीसदी सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित करने की बात कही गई। इसका मतलब यह था कि अल्पसंख्यक साफ-सफाई के कामों तक ही खुद को सीमित रखें। यह अल्पसंख्यकों के प्रति वहां के समाज का नजरिया भी बताता है। इसी तरह, इस्लामाबाद में एक ईसाई समुदाय की बस्ती को इस साल स्थानीय निकायों के चुनावों के दरम्यान स्थानीय प्रशासन ने जबरन इसलिए हटा दिया, क्योंकि उसके मुताबिक वहां रहने वाले ईसाइ समुदाय के लोग मुस्लिम इलाकों का जनसंख्या संतुलन बदल देंगे। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस तरह की घटनाओं के खिलाफ और अल्पसंख्यकों के पक्ष में न वहां कोई मुंह खोलता है न आवाज उठाता है।

 पाकिस्तान में चरमपंथी हिंसा बढऩे के डर और रोजमर्रा के चरम भेदभाव से त्रस्त कई ईसाई देश छोड़ रहे हैं। इनमें से कुछ जान बचाने के लिए अवैध तरीके से थाईलैंड पहुंचे, जहां उन्हें जेलों में डाल दिया गया है। एक एनजीओ चर्च वल्र्ड सर्विस के मुताबिक सैकड़ों लोगों ने थाईलैंड और श्रीलंका में शरण पाने के लिए आवेदन किया है। पाकिस्तान की सरकार आतंकवादियों के सामने इतनी असहाय है कि वह ईसाई अल्पसंख्यकों की चिंता को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाने में असमर्थ है। ऐसे में ईसाइयों के सामने कोई विकल्प रह ही नहीं गया है।

सतीश पेडणेकर

 

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