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ये हंगामा है क्यों बरपा

ये हंगामा है क्यों बरपा

By रंजना

मदर टेरेसा की सेवा अच्छी रही होगी, लेकिन इसमें एक उद्देश्य हुआ करता था कि जिसकी सेवा की जा रही है, उसका ईसाई धर्म में धर्मांतरण किया जाए। जनसेवा के नाम पर धर्मांतरण किया जाता है तो सेवा का महत्व कम हो जाता है। 
                –मोहन राव भागवत, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन राव भागवत के ताजा बयान पर इतना हंगामा क्यों बरपा है। पुरानी कहावत है कि सच से पर्दा उठेगा तो हंगामा मच जाएगा, क्योंकि  सच न केवल कर्कश होता है बल्कि उसमें जलते आग के गोले से अधिक तपिश होती है। इसलिए शास्त्रों में कड़वे सच को कहने में सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। हो सकता है भागवत ने मदर टेरेसा पर बयान देते समय इस मर्यादा का पूरा ख्याल न रखा हो लेकिन एक सवाल को मौजूं कर दिया है कि आखिर उन्होंने गलत क्या कहा।

भागवत का बयान जितनी तेजी से फैला, उतनी ही तेज गति से लोगों की प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई। आश्चर्य यह भी है कि राबर्ट वाड्रा ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के  प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने उनकी समझ पर सवाल उठा दिया। त्रिपाठी ने कहा कि भागवत को ‘हिन्दुइज्म’ की समझ नहीं है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी इस मामले में पीछे नहीं है लेकिन कहीं भी चर्चा का केन्द्र यह नहीं है कि आखिर इसमें गलत क्या है।

भागवत ने इस देव में सेवा भाव की आड़ में बड़े पैमाने पर होने वाले ‘धर्मांतरण’ पर अपनी राय रखी है। उनके कहने के अर्थ में कहीं भी मदर टेरेसा नहीं हैं। टेरेसा तो निमित्त मात्र हैं। इसलिए उनके सेवा, समर्पण और त्याग से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन सेवा जिस उद्देश्य को साधने के लिए की गई उस पर सवाल तो उठाया ही जा सकता है। भारतीय मनीषा में सेवा निस्वार्थ भाव से किए जाने का उल्लेख है। यह निष्काम कर्मयोग है। श्रीकृष्ण ने गीता में अपने उपदेश में भी कर्मी की परिभाषा बताई है। कर्म और उससे मनुष्य के संबंध को लेकर श्रीकृष्ण से बेहतर व्याख्या  किसी ने नहीं की है। भागवत इसी आधार पर कह रहे हैं कि सेवाभाव में यदि उद्देश्य जुड़ जाए। उसका मकसद एक धर्म के विस्तार में सहयोग देना हो तो सेवा का महत्व घट जाता है। बस।

देश के कोने-कोने में, आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियां यही तो कर रही हैं। सेवाभाव की आड़ में लोगों की पहचान, उनके धर्म और अस्तित्व को बदल रही है। क्या यह सही है? क्या किसी को यह अधिकार प्राप्त है कि  वह आपको कुछ समय खाना खिलाए, या घाव पर मरहम लगाए और इसके बाद आपसे उसकी कीमत वसूल ले? इसके  बाद सेवाभाव रह कहां जाता है। यह तो किसी के उद्देश्य प्राप्ति का साधन है। धर्मांतरण के लिए इसाई मिशनरियों का यही तो प्रमुख हथियार है।

इतिहास गवाह है कि कुछ सौ साल पहले देश में कितने ईसाई थे। घटनाक्रम में जाने पर साफ हो जाएगा कितने ईसाई मूल के लोग भारत में कब-कब आए। यह जानने के लिए भारत वर्ष का हजार साल का इतिहास भी नहीं खंगालना पड़ेगा। इस क्रम में यह भी जानना लेना जरूरी होगा कि देश में कोई दो सौ साल पहले कितने ईसाई थे और आज कितने राज्यों में इनकी जनसंख्या क्या है। इसके बाद अचरज जानने वाले को होना तय है। क्योंकि  देश के  कई राज्यों में इसाइयों की न केवल संख्या बढ़ी है बल्कि वह चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेकर राजनीति में समीकरण तय कर रहे हैं। इसीलिए भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ यह कहते हैं कि जब तक धर्मांतरण पर प्रतिबंध नहीं लग जाता तब तक ‘घर वापसी’ का कार्यक्रम जारी रहेगा।

14-03-2015

केन्द्रीय संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू साफ कहते हैं कि सरकार आम सहमति के साथ धर्मांतरण पर प्रतिबंध लागने के लिए तैयार है। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों को आगे आना चाहिए। संसद में कानून लाया जाना चाहिए और देश में धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। लेकिन कहते हैं जब मंशा साफ नहीं होती तो बहकी बातें अधिक होती है। राजनीति में मतदाताओं को लुभाने और ध्रुवीकरण के लिए हर दांव चले जा रहे हैं। राजनीति हमेशा विचार से निकलती है लेकिन जीवन का दर्शन नहीं होती। मोहन भागवत राजनीति से नहीं जुड़े हैं। वह राष्ट्रहित के समर्पित संगठन के अगुआ हैं। जहां देश की ज्वलंत चुनौतियों को ध्यान में रखकर विचार और दायित्व को प्रमुखता दी जाती है। इसके उलट राजनीति में तुष्टीकरण हथियार बन चका है। छद्म धर्मनिरपेक्षता इतनी बली हो गई है कि इसके आगे वास्तविकता बौनी नजर आती है। इसलिए पूरे संदर्भ को राजनीति अपने चस्मे से देख रही है। ऐसे में उसे विश्व हिन्दू परिषद का धर्मांतरण (घर वापसी) तो याद आता है लेकिन अन्य को वह भूल जाती है। उसे देश के दूर-दराज क्षेत्रों में इस तरह की कोशिश नहीं दिखाई दे रही है।

भारत के संविधान में व्यक्ति को धर्म अपनाने की स्वतंत्रता दी गई है। धर्म वहीं है जिसको मनुष्य धारण करता है। लेकिन वह धर्म नहीं है जिसे मनुष्य को धारण करना पड़ता है। लालच में स्वीकार करना पड़ता है। इससे धर्म की आत्मा में भी कंपन होता है। भागवत यही सवाल उठा रहे हैं। वह धर्म को धारण करने की पूर्ण स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं। जब व्यक्ति अपनी पूरी स्वच्छंदता के साथ इस दिशा में आगे बढ़ेगा तो फिर उसका धर्म परिवर्तन भी धर्मांतरण नहीं होगा। लेकिन अपने हितों में उलझी राजनीतिक विचारधारा इस दर्शन को तोडऩे-मरोडऩे में लगी है। ताकि सरकार की आंखों में धूल झोंकी जा सके।

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