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वसुंधरा सरकार के गले में फांस बनी ‘गाय’

वसुंधरा सरकार के गले में फांस बनी ‘गाय’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा असली-नकली गौरक्षकों की सच्चाई के आव्हान के मद्देनजर गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा सहित भाजपा शासित राज्यों की कतार में अब राजस्थान सरकार के गले में गाय फांस बन गई है। देश में पहली बार गौपालन विभाग का मंत्रालय बनाकर वाह वाही लूटने वाली वसुंधरा सरकार की नाक के नीचे नगर निगम जयपुर की हिंगोनिया गौशाला में पल-पल अकाल मौतों की शिकार होती बेजुबान गायों से जुड़ी मीडिया की सुर्खियों ने खुद मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करने को मजबूर कर दिया है। राजस्थान उच्च न्यायालय की फटकार तथा इस आपराधिक कृत्य की पुलिस जांच के निर्देश के साथ विश्व हिन्दू परिषद एवं बजरंग दल द्वारा महापौर निर्मल नाहटा से त्यागपत्र देने की मांग करके सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस के सड़कों पर उतरने से सरकार बैकफुट पर आ गई है।

जयपुर-आगरा सड़क मार्ग पर कानोता इलाके में हिंगोनिया गौशाला से जुड़ी अव्यवस्थाओं एवं बदइंतजामी को लेकर अदालत ने नगर निगम प्रशासन को कई बार चेताया है। अदालत के निर्देश पर गौशाला में सिविल वर्क कराये गये। लेकिन गाय रखने वाले बाड़ो से पानी के निकास की समुचित व्यवस्था को अनदेखा किया गया। लगभग अस्सी फीसदी बाड़ों की नालियां बंद हैं। पहली बार 31 जुलाई को न्यूज चैनल ‘जी राजस्थान’ की टीम ने गायों की कत्लगाह बनी इस गौशाला की हकीकत से जनता को रू-ब-रू कराया। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की सुर्खियां बनते ही सरकार तथा प्रशासन सभी हरकत में आ गये। न्यायाधीश महेशचंद शर्मा ने तीन अतिरिक्त महाधिवक्ताओं को तलब कर पुलिस महानिरीक्षक दिनेश एमएन को अदालती आदेशों की पालना की जांच तथा गायों की मौत के प्रकरण में राजस्थान गौवंश अधिनियम के तहत नगर निगम अधिकारियों पर अपराध के मामले के बाबत तथ्यात्मक रिपोर्ट देने को कहा है। कोर्ट ने मृत गायों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी तलब की है। भ्रष्ट्राचार निरोधक ब्यूरो में कार्यरत रहे दिनेश एमएन ने खान विभाग में घोटालों तथा रिश्वतखोरी का भंडाफोड़ कर तहलका मचा दिया था। गौशाला के कुप्रबंधन तथा सरकार एवं निगम प्रशासन की घोर लापरवाही का कड़वा सच परत-दर-परत मीडिया में उजागर हो रहा है। इन रिपोर्टों के मुताबिक पिछले ढाई सालों में करीब 27 हजार गायें इस गौशाला में अंतिम सांस लेने को मजबूर हुईं हैं। आंकड़ों में को देखें तो गौशाला में साल-दर-साल गायों की मौत का प्रतिशत इस प्रकार है। वर्ष 2011 में 13.60 प्रतिशत, 2012 में 07.09 प्रतिशत, 2013 में 08.47 प्रतिशत, 2014 में 09.96 प्रतिशत, 2015 में 11.28 प्रतिशत और चालू वर्ष 2016 में 11.24 प्रतिशत गाय मौत का शिकार हो चुकी हैं। हालात ये है कि मौके पर जांच करने गई पुलिस टीम को गौशाला के बाड़ों में घुटनों तक जमा कीचड़ में धसी गायों को निकालने की मशक्कत करनी पड़ी। कुछ गौ-सेवकों की मदद से इस टीम ने चार घंटे की कवायद में करीब एक हजार गायों को बाहर निकाला। पिछले कुछ दिनों में आठ सौ से अधिक गाय दम तोड़ चुकी हैं।

रोजाना 40-45 गायों के दम तोडऩे का आंकड़ा मुख्यमंत्री के अल्टीमेटम के बाद 85 की संख्या तक जा पहुंचा। मुख्यमंत्री के निर्देश पर स्वायत्त शासन मंत्री राजपाल सिंह शेखावत तथा कृषि एवं पशुपालन मंत्री प्रभुलाल सैनी, मुख्य सचिव ओपी मीणा जयपुर संभाग के आयुक्त राजेश्वर सिंह अन्य अधिकारियों के साथ गौशाला पहुंचे, लेकिन हकीकत जानने का गंभीर प्रयास नहीं हो पाया। निगम तथा गौशाला प्रबंधन ने मंत्रियों को ऐसे बाड़ों से दूर रखा, जिसमें दलदल में फंसी गाये तड़प रहीं थीं। मनमाने तरीके से मृत गायों को गड्ढे में डालकर उन्हें मिट्टी से दबाने के हालात भी नहीं दिखाये गये। मृत गायों को जमीदोंज करने से संक्रमण का खतरा बढ़ गया है।

गौशाला के पशु अस्पताल के आईसीयू में पशु चिकित्सक ने मंत्री शेखावत को जब यह बताया कि समय पर पर्याप्त चारा-पानी नहीं मिलने से गायें दम तोड़ रही हैं तो निगम अधिकारियों का यह कहना था कि बीमारी से गाये मर रही हैंै। इसी तरह पशुपालन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव कुंजीलाल मीणा का भी यही तर्क था कि गौशाला में बूढ़ी और बीमार गायें मर रही हैं। इसके उत्तर में तस्वीर यह थी कि पिछले पखवाड़े जिस गौवंश को अकाल मौत झेलनी पड़ी उनमें 52 नवजात ऐसे बछड़े-बछड़ी भी शामिल थे, जिन्हे जन्म के पश्चात से मां का दूध नहीं मिल पाया था। हाल ही में दो गायों ने बछड़ों को जन्म दिया और कीचड़ के दलदल में बैठ गई। गौशाला के कर्मचारियों ने बछड़ों को निकाल कर बोतल से दूध पिलाया। इनमें एक गाय ने उसी शाम दम तोड़ दिया और दूसरी अस्पताल में भर्ती की गई। इसी तरह अन्य बीस बछड़े बछडिय़ों की मां के बारे में भी कर्मचारी अनजान हैं और यह पता भी नहीं कि कौन सी गाय मां कीचड़ में दफन हो गई है और उसका बछड़ा दूध से वंचित है।

हकीकत यह है कि पिछले कई वर्षों से सरकार ने गौ-पुर्नवास केन्द्र के नाम पर इस गौशाला को लावारिस गायों की पनाहगाह बताया, लेकिन उसे कांजी हाउस तक सीमित रखा। गौशाला कमेटी के चेयरमैन भगवत सिंह देवल को यह आपत्ति है कि गाय माता को आवारा कहा जाता है। देवल को यह भी शिकायत है कि कोई मेरी नहीं सुनता और ना ही उनके पास कोई फाइल आती है। मंत्री शेखावत का यह कहना कि गाय को आवारा मानने संबन्धित नियमों को देख कर उनमें बदलाव किया जाएगा। निगम के दस्तावेजों के मुताबिक हर साल इस केन्द्र पर औसतन 10 से 15 हजार लावारिस गायें पहुंचाई गईं और नाम मात्र के शुल्क पर 10 फीसदी रिहा की गई। पिछले माह जयपुर को स्मार्ट सिटी बनाने से जुड़ी योजनाओं के शिलान्यास समारोह में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जयपुर की सड़कों पर लावारिस गायें घूमने पर दस हजार जुर्माना वसूल किए जाने का निर्देश दिया था। पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में निगम की इस गौशाला में गायों की संख्या करीब साढ़े तीन हजार थी जो अब बढ़कर आठ हजार से अधिक हो गई है। लेकिन इन गायों की देखभाल की उपेक्षा मेें घोर लापरवाही का चक्र भी तेजी से घूमता गया नतीजतन गायों की मौत का ग्राफ ऊंचा होता गया। गायों की देखभाल हेतु कम-से-कम चार सौ मजदूरों की तुलना में ढाई सौ के आसपास मजदूरों से काम चलाया गया। हड़ताल के दौरान महज 40-50 मजदूरों से काम चलाया गया। गौशाला के एक बाड़े में औसतन 200 गायें रखी जा सकती हैं। लेकिन गोबर एवं कीचड़ से भरे पूरे इन बाड़ों में आठ-आठ सौ गाये ठूसी गईं। जिनसे उनका जीना दूभर हो गया।

28-08-2016

इस गौशाला से ड्रीम कन्स्ट्रक्शन कंपनी के माध्यम से मजदूरों को उपलब्ध करवाया जाता रहा है। वित्तीय अनियमितताओं के चलते निगम प्रशासन ने इस कंपनी को ब्लैक लिस्ट घोषित कर भुगतान रोक दिया। मामला सरकार तक पहुंचा तो स्वायत्त शासन विभाग ने जुलाई के अंतिम सप्ताह में भुगतान के निर्देश दिए, लेकिन इसकी पालना की अनदेखी की गई। इसके फलस्वरूप गौशाला में कार्यरत मजदूरों की अघोषित हड़ताल ने हालात को बद से बदतर बना दिया। गोशाला के बाड़ों में गोबर के ढेर जमा होते गये। गौशाला से औसतन पचास ट्राली गोबर निकाला जाता है। जिससे गौशाला को काफी आमदनी होती है। गौशाला में दूध देने वाली गायों से औसतन पचास लीटर दूध डेरी को भिजवाया जाता है। बरसात से कीचड़ जमा हो गया तथा बाड़ो से पानी की निकासी नहीं होने से दलदल बन गया जो गायों के लिए कब्रगाह बनता चला गया। गौशाला प्रभारी आरके शर्मा तथा उपायुक्त शेरसिंह लुहाडिय़ा लाचार और बेजुबान गायों को भगवान भरोसे छोड़कर लंबी छुट्टी लेकर बैठ गए। गौशाला प्रभारी तथा उपायुक्त के अवकाश पर चले जाने के कारण राजस्व अधिकारी करणी सिंह को उपायुक्त  का चार्ज सौंपा गया। निगम की साधारण सभा की बैठक में पशुपालन विभाग से प्रतिनियुक्ति  पर आये शर्मा को वापस भेजने पर सहमति हुई तथा लुहाडिय़ा का विकल्प ढूंढने पर चर्चा हुई। लेकिन इसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया। अब डेमेज कन्ट्रोल के लिए इन अधिकारियों को निलम्बित किया गया है। जानकार सूत्रों के अनुसार सच्चाई यह भी है कि निगम की ओर से गठित गौशाला कमेटी के चेयरमैन, उपायुक्त गौशाला एवं प्रभारी सहित चार प्रमुख लोगों में बेहतर तालमेल का अभाव भी गौशाला की दुर्दशा का प्रमुख कारण बताया गया है। गौशाला के कुछ मजदूरों का तो यहां तक कहना है कि ठेकेदार उपायुक्त तथा गोशाला प्रभारी के कथित रूप से भड़काने से हड़ताल की नौबत आयी। उधर गौशाला के लिए निगम द्वारा निर्धारित 20-22 करोड़ रूपये का बजट भी अपर्याप्त माना गया है। गायों की संख्या को देखते हुए इस राशि से सूखा चारा भी उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। फिर अन्य व्यवस्थाओं के बारे में बात करना बेमानी है। एकबारगी गौशाला परिसर के एक हिस्से में खुली जेल खोलकर आजीवन कारावास से दंडित बंदियों से गायों की देखभाल कराने की चर्चा चली थी। लेकिन इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाये जा सके।

गायों की अकाल मौतों से निगम प्रशासन और सरकार सकते में है। वहीं आम जनता में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई है। विश्व हिन्दू परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष नरपत सिंह शेखावत एवं बजरंग दल के प्रांत संयोजक अशोक सिंह गौशाला से जुड़ी अव्यवस्थाओं के लिए नगर निगम को दोषी मानते हैं। इनका कहना है कि खुद महापौर निर्मल नाहटा को त्यागपत्र दे देना चाहिए अथवा सरकार उन्हें उनके पद से हटा दे। कांग्रेस ने इस प्रकरण में सरकार की संवदेनहीनता के खिलाफ  हाल ही में प्रदेश मुख्यालय से शहर परकोटे के बाजारों से गौरक्षा पदयात्रा निकाली। गाय माता को मौत से बचाने के लिए शहर अध्यक्ष पूर्व विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास की अगुवाई में शामिल कांग्रेसजनों ने मंदिर गोविंद देव जी में गौरक्षा के लिए सामूहिक प्रार्थना की। खाचरियावास भाजपा के दिग्गज नेता पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के भतीजे है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गायों की अकाल मौतों को दिल दहला देने वाली घटना बताया है। प्रदेश कांग्रेस की प्रवक्ता एवं उपाध्यक्ष डॉ. अर्चना शर्मा का कहना है कि इस प्रकरण में प्रशासनिक एवं राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। अर्चना शर्मा विहिप के मार्गदर्शक आचार्य धर्मेन्द्र की पुत्रवधु है, जिनके पिता वीर रामचन्द्र ने गौरक्षा के लिए 1965-66 में दिल्ली में 165 दिनों तक अनशन किया था। खाचरियावास ने 8 अगस्त को कानोता पुलिस थाने में राज्य सरकार गोपालन राज्य मंत्री, मुख्य सचिव, स्वायत शासन विभाग के प्रमुख शासन सचिव, निगम के महापौर मुख्य कार्यकारी अधिकारी आदि के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। खाचरियावास ने उदय इंडिया को बताया कि 1964 में पारित गोशाला अधिनियम तथा प. जवाहर लाल नेहरू के समय बने पशु क्रूरता अधिनियम के तहत कार्यवाही की मांग की गई है जिसमें गायों की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही का प्रावधान है।

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अधिकारियों को चार दिन का अल्टीमेटम देकर गौशाला की स्थिति सुधारने को कहा है। डूंगरपुर जिले के दौरे से लौटकर मुख्यमंत्री का गौशाला का निरीक्षण प्रस्तावित है। इसके लिए निगम प्रशासन गौशाला से जुड़ी व्यवस्था को चाक चौबंद करने में जुटा है। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि पिछले कुछ अरसे में गौशाला में अकाल मौतों का नहीं थमने वाला सिलसिला सरकार के माथे पर जो घाव दे गया है उसकी भरपाई कैसे होगी। गौशाला के प्रबंधन की जिम्मेदारी को लेकर स्वायत शासन मंत्री राजपाल सिंह शेखावत और गौ-पालन मंत्री ओटाराम देवासी के विरोधाभासी बयान कैसे हजम होंगे। चुनाव घोषणा पत्र में गौ-पालन मंत्रालय के गठन के बावजूद ढाई साल में गौ अभयारण नहीं बना पाने सहित गई वायदे अभी तक अधर में लटके हैं। करीब ग्यारह माह पहले पुलिस अभिरक्षा से फरार हुए कुख्यात बदमाश आनंदपाल की गिरफ्तारी तथा मासूमों से दुष्कर्म को लेकर बिगड़ती कानून व्यवस्था स्वयं मंत्रीगणों विधायकों तथा पार्टी पदाधिकारियों एवं कार्यकत्र्ताओं द्वारा शासन प्रणाली के साथ प्रदेश भाजपा मुख्यालय पर मंत्रियों एवं पार्टी पदाधिकारियों द्वारा की जाने वाली जनसुनवाई को लेकर उठाये गये सवालिया निशान और उनमें व्याप्त असंतोष के चलते गौशाला में गायों की अकाल मौतों से संबंधित ताजा प्रकरण से राज्य विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार को विपक्षी हमले की अग्नि परीक्षा से गुजरना लाजिमी हो गया है। राज्य के इक्कीस जिलों में स्थानीय निकायों के 37 वार्डों के उप-चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा की पराजय से प्रतिपक्ष कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। संसद में पारित जीएसटी विधेयक के अनुमोदन के लिए विधानसभा का सत्र अगस्त माह के अंतिम सप्ताह अथवा सितम्बर माह के पहले पखवाड़े में बुलाये जाने की संभावना है।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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