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कश्मीर की मौजूदा चुनौती एक आग का दरिया है और डूब के जाना है

कश्मीर की मौजूदा चुनौती एक आग का दरिया है और डूब के जाना है

गालिब की ये पंक्तियां देश के आज के हालात और भारत सरकार तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर खूब लागू होतीं हैं। हिंदुस्तान को चलाना और फिर उसे नए अंदाज और तरीके से चलाना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। ये चुनौतियां बहुआयामी हैं। एक तरफ आपके सिर पर पाक आयोजित आतंकवाद है, तो दूसरी ओर अंदरूनी मुश्किलें हैं जिनके पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक ताकतें हैं जो किसी भी हाल में नहीं चाहेंगी कि हालात सामान्य हों। इन सबके बीच है बीजेपी और सरकार के पास अनुभवी सिपहसालारों की कमी जो चीजों और मुद्दों को सही तरीके से निपटा सकें। ये कमी कभी देश के शिक्षा संस्थानों में हो रहे करतबों, कभी उत्तराखंड एवं अरुणाचल की राजनीतिक कलाबाजियों और कभी असंवेदनशील, अमर्यादित और बेतुके बयानों में साफ दिखाई देती है।

लेकिन, आज जो सबसे अहम मसला सामने है वो कश्मीर के हालात का है। कश्मीर का मामला बेहद जटिल है और इसके कोई सीधे हल नहीं हैं। टीवी चैनलों की सतही बहस मुसाहिबों और द्रवित ह्रदय से लिखे संपादकीयों से इसका कोई हल निकलने वाला भी नहीं है। ये बात सही है कि टीवी और मीडिया में चलने वाली बहस अक्सर भावावेश से गुजरकर मनोरंजन के हल्के स्तर पर जाकर खत्म हो जाती है। मगर यकीन मानिए जो कश्मीर घाटी में इन दिनों हो रहा है वह हल्के स्तर पर नहीं लिया जा सकता। हम ये जानते हैं कि कश्मीर में भारत एक युद्ध लड़ रहा है। ये लड़ाई लंबी है, क्योंकि इसमें जो विरोधी हैं उसने कई चीजों का घालमेल कर रखा है। उसका एक सिरा आतंकवाद से जुड़ता है तो दूसरा मजहब के आधार पर घाटी में नस्लगत सफाई की एक सतत प्रक्रिया से। इसका तीसरा सिरा पाकिस्तान की भारत विरोधी विदेश नीति से ताल्लुक रखती है तो चौथा उसकी अंदरूनी राजनीति की उठापटक से।

कश्मीर कोई एक पार्टी या एक नेता का मुद्दा नहीं है यह पूरे देश का मुद्दा है, इसलिए ये जरूरी है कि पूरे देश से एक ही आवाज बाहर जाए। आप चाहे मीडिया से हों या फिर अलग-अलग राजनीतिक सोच रखने वाली पार्टियों से – आप कश्मीर के भविष्य के बारे में अलग सोच नहीं रख सकते। हां, किसी हालात को किसी वक्त कैसे निपटाया गया इस पर आपकी राय अलग हो सकती है। मगर पिछले दिनों घाटी से बाहर भी कई ऐसे स्वर उभरे हैं, जो अगर देशद्रोही नहीं तो फिर भारत के प्रति भलमनसा हित रखने वाले भी नहीं हैं। आज जो आवाजे उठ रही हैं वे उस समय कहां थीं जब वहां कश्मीरी पंडितों पर हिंसा का कहर टूटा था? आज जो लोग अपनी धरती छोड़कर अपने ही देश में निर्वासित हैं उनके मूलभूत अधिकारों की बात करना भी क्या जरूरी नहीं है?

सारी भारत विरोधी ताकतें एक होकर किसी भी तरह उस माहौल को बिगाडऩा चाहती हैं जो देश ने बड़ी मुश्किलों के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ बनाया है। इस गंभीर परिस्थिति को धैर्य, कड़े मनोबल, सूझबूझ और कौशल से ही निपटा जा सकता है। घोषित आतंकवादियों जिनमे बुरहान वानी भी शामिल है, को मार गिराना सेना और पुलिस का काम है, जो उन्होंने बखूबी निभाया है। लेकिन आतंकवाद जब नागरिकों को अपनी ढाल बनाकर हथियार के रूप में इस्तेमाल करे तो फिर कभी बोली तो कभी गोली का इस्तेमाल करना होगा।

कश्मीर के हालात में तूफान कोई पहली बार नहीं आया है। इससे मुश्किल वक्त भी इस देश ने वहां देखा है और उसे बड़े धैर्य, जतन और बलिदानों के साथ कामयाबी हासिल की है। इसलिए कैसे भी हालात हों इस बात को कैसे सही ठहराया जा सकता है कि देश के बाकी हिस्सों में ‘आजादी’ के नारे लगें। क्या मोदी विरोध में आप इतने आगे चले जाएंगे कि आप देश को पीडे छोड़ देंगे? देश की सेना का मनोबल तोडऩे वाली बातें करेंगे? संयम की जरुरत सबको है फिर चाहें वह मीडिया, सरकार, विपक्षी दल और बुद्धिजीवी कोई भी हों। क्योंकि कश्मीर का सवाल देश का सवाल है।

सरकार की जिम्मेदारी देश चलाने की है इसलिए उसका उत्तरदायित्व भी कहीं ज्यादा है। जैसा मैंने ऊपर कहा कि कई मौकों पर सरकार के लोगों की सूझबूझ, कौशल और अनुभव की कमी प्रधानमंत्री और शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व के लिए परेशानी का कारण बनी है। मगर प्रधानमंत्री भी ये जानते ही होंगे कि उनके सामने जो समस्याओं का पहाड़ है वह खासकर कश्मीर में बुहत विकट है। मगर उम्मीद भी लोगों को उनसे ही है। आग के इस दरिया को तैर कर पार करने की ताकत और मनोबल अगर किसी में है, तो वह उन्हीं में है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के लिए कश्मीर में ये परीक्षा की घड़ी है, जिसकी कामयाबी की प्रार्थना करोड़ों भारतवासी कर रहे हैं।

उमेश उपाध्याय

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