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मोदी की दो-टूक

मोदी की दो-टूक

इस स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को दो-टूक संदेश दिया। मोदी के भाषण में किसी भी अन्य राज्यप्रमुख की तरह सिर्फ सरकार की उपलद्ब्रिधयों का द्ब्रयौरा ही नहीं था, बल्कि पाकिस्तान के लिये कूटनीतिक जवाब भी था और चेतावनी भी थी कि वह भारत के आंतरिक मामलों, खासकर कश्मीर में अलगाववादियों की हरकतों में दखल देने से बाज आए। पाकिस्तान एक तरफ तो कश्मीर में अलगावादियों को दंगा-फसाद के लिए उकसाने के लिए खुशी-खुशी तैयार रहता है, लेकिन बलूच लोगों की लड़ाई और अपने ईजाद किए आतंकवादी वारदातों से हलकान हो जाता है। प्रधानमंत्री की बलूचिस्तान के मामले में दखल देने की चेतावनी पाकिस्तान के साथ जैसे को तैसा वाले जवाब की तरह है। यह कहने की जरूरत नहीं कि प्रधानमंत्री का यह बयान एक संकेत भर है, मगर हमारे पड़ोस में जारी घटनाक्रम के सिलसिले में यह जरूरी भी था। दरअसल कश्मीर समस्या एक बड़ी साजिश का हिस्सा है और हम हर बार दुश्मन के प्रति दोस्ती का हाथ बढ़ाने का तरीका नहीं अपना सकते। पाकिस्तान की हरकतों से हम देख सकते हैं कि उसकी हिक्वमत रोज-ब-रोज बढ़ती जा रही है, इसलिए हालात को काबू में रखने के लिए अगर कड़ा संदेश देना हो तो किसी राजनेता को उससे हिचकना नहीं चाहिए। वजह यह है कि हमारे अंदर और बाहर की ताकतें लगातार हमारी आजादी पर हमले करने की कोशिश कर रही हैं। विदेशी चंदे से चलने वाले तथाकथित ”शांतिपूर्ण’’ संगठन हमारे मतभेदों का फायदा उठाने के लिए हर तरह की कोशिश करते हैं और सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। हमें इन ताकतों को दो-टूक चेतावनी देनी होगी और उनके नापाक इरादों से सीधे टकराना होगा। इस पृष्ठïभूमि में मोदी ने दो-टूक संदेश दिया है कि अगर पाकिस्तान भारत की समस्याओं में टांग अड़ाएगा तो भारत भी पाकिस्तान की कमजोरियों को हवा देगा। उन्होंने यह बड़े विनम्र तरीके से कहा कि जिन लोगों से वे कभी नहीं मिले, वे 125 करोड़ देशवासियों का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। इसके विपरीत पाकिस्तान अलगाववादियों से लगातार मिलता है और उन्हें हथियार सहित हर तरह की मदद मुहैया कराता है। यह दो-टूक संदेश देते वक्त प्रधानमंत्री के दिमाग में भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अद्ब्रदुल बसीत का वह भड़काऊ बयान जरूर रहा होगा, जो उन्होंने पाकिस्तान की आजादी के दिन दिया था। उन्होंने उस दिन को इस साल कश्मीर की ”आजादी’’ को समर्पित किया। यहां यह याद कर लेना जरूरी है कि प्रधानमंत्री ने बलूचिस्तान का जिक्र स्वतंत्रता दिवस के तीन दिन पहले ही सर्वदलीय बैठक में किया था। इसलिए यह कहना तो बेमानी है कि उन्होंने पाकिस्तानी कूटनयिक के बयान की प्रतिक्रिया में इस मुद्दे को उठाया। आखिर ऐसा कहने वालों से और उक्वमीद ही क्या की जा सकती है जो चीन के टुकड़ों पर पलते हैं।

यह अब आम सच्चाई है कि बातचीत की पहल जैसी बातों का पाकिस्तान के भारत संबंधी रवैए पर कोई खास असर नहीं होता। पाकिस्तान के लगातार भड़काऊ रवैए की मुक्चय वजह यह है कि वह समझता है कि भारत पाकिस्तान के परमाणु अस्त्रों के मद्देनजर उसके खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई करने से बचेगा और अगर पाकिस्तान को जवाबी कार्रवाई का डर नहीं है तो भारत की पाकिस्तान के खिलाफ सुरक्षा तंत्र का हौवा बेमानी है। यानी पाकिस्तान को अपनी हरकतों से बाज आने का संदेश देने के लिए किन्हीं और उपायों की दरकार है, चाहे इसके लिए कोई छोटी लड़ाई ही क्यों न लडऩी पड़े। भारत अपने राष्टरीय हितों की सुरक्षा के लिए एक सीमित युद्घ का विकल्प अपना सकता है, क्योंकि कूटनीतिक दबाव डालने की मौजूदा नीति पाकिस्तान को नापाक हरकतों से रोकने में नाकाम रही है। वह मुंबई में 26/11 के हमलों के बाद से ही लगातार भारत विरोधी आतंकी समूहों को शह देता आ रहा है। कई साल से पाकिस्तान जक्वमू-कश्मीर में छद्म युद्घ को शह देकर खून-खराबा जारी रखे हुए है। इसलिए प्रधानमंत्री का संदेश जैसे-को-तैसा जैसा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाक अधिकृत कश्मीर में हाल ही में कहा कि कश्मीर वह चिनगारी है जो दो परमाणु ताकत वाले देशों के बीच किसी भी समय चौथी लड़ाई की वजह बन सकता है।

इस पृष्ठभूमि में देखने पर लगता है कि मोदी ने लाल किले से अपने तीन भाषणों में वह परंपरा तोडऩे की कोशिश है जिसमें ऐसे वादे किए जाएं जो अमूमन उसी दिन भुला दिए जाते हैं। उन्होंने कोई बड़ा वादा नहीं किया, बल्कि किए कामों की फेहरिस्त पेश करने की कोशिश की। यह रवैया सराहनीय है। जहां तक कश्मीर की बात है तो पाकिस्तान के मंसूबों के प्रति नरम रवैया अपनाने का कोई फायदा नहीं दिख रहा है। कश्मीर के मामले में सबसे बड़ी गलती नेहरू ने रायशुमारी का वादा करके और उसे अंतर्राष्टरीय मंच पर ले जाकर की। सात दशकों से देश अपना खून बहाकर और रुपए-पैसे से उसकी कीमत अदा कर रहा है। आज के हालात में अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाता है, तो पाकिस्तान का लगभग समूचा समुद्री किनारा खत्म हो जाएगा। तब वह देश के रूप में बच भी नहीं पाएगा। इसी तरीके से पाकिस्तान को शायद आतंकवादियों को शह देने से रोका जा सकता है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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