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चौदह सौ साल पुराने इस्लाम का आधुनिक चेहरा है आईएस

चौदह सौ साल पुराने इस्लाम का आधुनिक चेहरा है आईएस

आईएस की हैवानियत भरी हरकतों की मुस्लिम जगत में ही तीखी आलोचना हो रही है। कुछ अर्से पहले दुनिया के 126 मुस्लिम धर्मशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों ने कथित खलीफा बगदादी को खुली चिठ्ठी लिखकर इस्लामिक राज्य की करतूतों की कड़ी निंदा की थी। इससे पहले मिस्र की एक प्रमुख मस्जिद के इमाम भी इस्लामिक राज्य को मुस्लिम विरोधी बता चुके हैं।

इराक और सीरिया के एक हिस्से पर बना स्वतंत्र राष्ट्र आईएसआईएस या इस्लामिक राज्य दुनिया में हैवानियत का दूसरा नाम बन गया है। हर नया दिन उसकी नृशंसता की रोंगटे खड़े कर देने वाली नई कहानी लेकर आता है । कभी-कभी तो लगता है कि वह क्रूरता की सारी हदें पार करता जा रहा है। तालिबान, अलकायदा, बाकोहरम, अल शहाबा आदि इस्लामी आतंकी संगठनों की क्रूरता और जुल्म की मिसालें काफी नहीं थी, इसलिए इस्लामी दुनिया चरम क्रूरता  की नई मिसाल लेकर आई है – आईएसआईएस या इस्लामिक राज्य। यह इस्लामी आतंकी संगठन इराक और सीरिया के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने के बाद क्रूरता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। उसके नेता अल बगदादी ने खुद को ‘खलीफा’ यानी पूरी इस्लामी दुनिया का शासक घोषित कर दिया, इसके बाद उसने इंटरनेट पर डाले गए वीडियो के जरिए दुनिया भर के मुसलमानों से उसका फरमान मानने को कहा और वैश्विक जिहाद का ऐलान किया। इसके पहले उसने उन तमाम देशों के खिलाफ जंग का ऐलान किया था, जहां मुसलमानों के अधिकारों का हनन हो रहा है। इस सूची में भारत भी शामिल है।

अल कायदा हमेशा से कहता आया है कि पिछली सदी में विश्व भर में मुस्लिम ‘परेशान’ हुए हैं, क्योंकि मुस्लिम हितों की रक्षा करने वाली कोई खिलाफत नहीं थी। इस स्वप्न की एक व्यापक अपील है और आईएसआईएस उसे भुना रहा है। अधिकांश मुसलमानों के लिए खिलाफत मुस्लिम शक्ति का वो स्वर्णकाल है, जब खलीफा की तलवार के नीचे ‘शुद्ध इस्लामी कानूनों’ का शासन चलता था। ‘खिलाफत’ शब्द अरबी शब्द खिलाफा से बना है, जिसका अर्थ है ‘उत्तराधिकार’। खिलाफत का आशय हुआ ‘मोहम्मद के उत्तराधिकारी का शासन’। शासक खलीफा कहलाया, जो सैद्धांतिक रूप से संसार के सारे मुसलमानों का मजहबी नेता और नायक होता है। अपने को खलीफा घोषित करके आईएस नेता बगदादी दुनिया के मुसलमानों का स्वघोषित मसीहा बन गया है। इस तरह से उसने बाकी आतंकवादी संगठनों को पीछे छोड़ दिया है।

आईएस की हैवानियत भरी हरकतों को मुस्लिम जगत में ही तीखी आलोचना हो रही है। कुछ अर्से पहले दुनिया के 126 मुस्लिम धर्मशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों ने कथित खलीफा बगदादी को खुली चि_ी लिखकर इस्लामिक राज्य की करतूतों की कड़ी निंदा की थी। इससे पहले मिस्र की एक प्रमुख मस्जिद के इमाम भी इस्लामिक राज्य को मुस्लिम विरोधी बता चुके हैं। कुछ लोग मानते हैं कि यह केवल मनोविक्षिप्तों और दुस्साहसी लोगों का संगठन मात्र है। असलियत यह है कि लोग अभी तक आईएस या इस्लामिक राज्य की सोच और विचारधारा को समझ नहीं पाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने कहा था कि इस्लामिक राज्य गैर-इस्लामिक है। यह अल कायदा का नया संस्करण है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि ओबामा इस आंदोलन को लेकर अंजान हैं या वही बात बोल रहे हैं जो राजनीतिक तौर पर सुविधाजनक हो। इस संगठन की सोच और रणनीति को न समझ पाने के कारण ही तमाम देश मिलकर भी इस संगठन का बाल भी बांका नहीं कर पाए और वह फलता-फूलता जा रहा है। लेकिन, पिछले कुछ समय से पश्चिमी देशों में उसका गंभीरता से अध्ययन हो रहा है। आखिरकार दुनिया भर के देशों से लाखों लड़ाकों को आकर्षित करने वाले आईएस या इस्लामी राज्य संगठन में कोई तो बात है।

04-04-2015

आईएस शुद्ध इस्लाम या इस्लाम के मूल रूप पर विश्वास करता है, जो आज के इस्लाम से अलग है। असल में वह इस्लाम के चौदह सौ साल पहले की पहली पीढ़ी के यानी मोहम्मद और उनके साथियों के तौर-तरीकों या कार्य-प्रणाली पर विश्वास करता है। हाल ही में जानी-मानी पत्रिका एटलांटिकद्ग में अमेरिकी प्रोफेसर ग्राहम वुड का इस्लामिक राज्य पर लिखा लेख बौद्धिक हल्कों में बहुत चर्चा में है। वे कहते हैं कि हमने इस्लामी आतंकवाद या जिहाद को समझने में दो गलतियां की हैं। हम इसे एकरस या एकरूप मानते हैं। हम अल कायदा पर जो तर्क शास्त्र लागू करते हैं, वही उसे चुनौती देने वाले आईएस पर भी लागू करते हैं। बिन लादेन अपने आतंकवाद को खिलाफत की प्रस्तावना मानता था। उसका संगठन लचीला, भौगोलिक आधार पर स्वायत्त संगठनों के जरिए काम करता था। इसके विपरीत आईएस को वैध बने रहने के लिए एक क्षेत्र की जरूरत है और उस पर शासन करने के लिए उसे शासन की संरचना चाहिए। दूसरी हमारी गलतफहमी यह है कि हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आधुनिक समय में जन्म लेने के बावजूद आईएस का चरित्र मध्यकालीन है। हम यह मानते हैं कि जिहादी आधुनिक सेक्युलर लोग हैं। इनकी राजनीतिक चिंताएं आधुनिक हैं, लेकिन उन्होंने मध्ययुगीन धार्मिक नकाब पहन रखा है। इसी को हम आईएस पर लागू करना चाहते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इस समूह की बात निर्रथक लग सकती है, लेकिन यह सातवीं सदी के कानूनी माहौल और भविष्यसूचक ग्रंथों की तरफ लौटने की कोशिश है।

#2367;क स्टेट सही मायनों में इस्लामिक है। यह सही है कि इसमें मध्य-पूर्व और यूरोप के बहुत से मनोविक्षिप्त और दुस्साहसी लोग शामिल हो गए हैं, लेकिन इसके ज्यादातर अनुयायी इस्लाम के एकात्म और गहन अध्ययन पर आधारित भाष्यों को मानते हैं। इस्लामिक राज्य द्वारा किए गए हर फैसले और कानून में वह पैगंबर के तौर-तरीकों को अपनाते हैं। यानी मोहम्मद की भविष्यवाणियों और उदाहरणों का पूरी तरह से पालन करते हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि यह धार्मिक समूह नहीं है।

ग्राहम वुड कहते हैं कि असल में अगर हम इस्लामिक स्टेट जैसी प्रवृत्ति से लडऩा चाहते हैं तो इसके बौद्धिक विकास को समझना होगा। इस्लाम में तकफीर यानी बहिष्कार की अवधारणा है। अल कायदा इराक के नेता जरकावी ने इस धारणा को बहुत विस्तार दे दिया था। कुरान या मोहम्मद के कथनों को नकारना पूरी तरह से धर्मद्रोह माना जाता है, लेकिन जरकाबी और इस्लामिक राज्य ने कई और मुद्दों पर भी मुसलमानों को इस्लाम से बाहर निकालना शुरू कर दिया है। इसमें शराब-ड्रग बेचना, पश्चिमी कपड़े पहनना, दाढ़ी बनाना, चुनाव में वोट देना और मुस्लिमों को धर्मद्रोही कहने में आलस बरतना आदि शामिल है। इस आधार पर शिया और ज्यादातर अरब धर्मद्रोह के निष्कर्ष पर खरे उतरते हैं, क्योंकि शिया होने का मतलब है इस्लाम में संशोधन करना और आईएस के अनुसार कुरान में कुछ नया जोडऩे का मतलब है उसकी पूर्णता को नकारना। शियाओं में, जो इमामों की कब्र की पूजा करने और अपने को कोड़े मारने की परंपरा है, उसकी कुरान या मोहम्मद के व्यवहार में कोई मिसाल नहीं मिलती। इसलिए धर्मद्रोही होने के कारण करोड़ों शियाओं की हत्या की जा सकती है। यही बात सूफियों पर भी लागू होती है। इसी तरह राज्यों के प्रमुख भी धर्मद्रोही हैं, जिन्होंने शरीया के ऊपर मनुष्य निर्मित कानून बनाया और उसे लागू किया है। इस तरह इस्लामिक राज्य या आईएस इस विश्व को शुद्ध करने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों की हत्याएं करने के लिए प्रतिबद्ध है। उसके नजरिए से जो भी मूल इस्लाम में संशोधन करता है वह धर्मद्रोही है, इसलिए हत्या ही उसका दंड है। चूंकि इस्लामिक राज्य की जमीन से निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना नामुमकिन है। इसलिए यह पता लगाना मुश्किल है कि कितनी हत्याएं हुई हैं। लेकिन, मोटा अंदाज यह है कि एक-दो हत्याएं लगातार और सामूहिक हत्याकांड हर कुछ हफ्तों में होते रहते हैं। मुस्लिम धर्मद्रोही ही ज्यादातर उनके शिकार बनते हैं। ऐसा लगता है कि इस तरह के हत्याकांडों से ईसाई बचे हुए हैं, क्योंकि वे नई सरकार का विरोध नहीं करते। बगदादी की सरकार उनको तब तक जिंदगी जीने देगी जब तक जजिया टैक्स देते रहेंगे और इस्लामिक राज्य का वर्चस्व स्वीकार करते रहेंगे। इस बारे में कुरान का स्पष्ट निर्देश है।

मुख्यधारा के कई मुस्लिम संगठन कहते हैं कि इस्लामिक राज्य गैर-इस्लामिक है। इस बारे में ग्राहम वुड ने अपने लेख में आईएस के धर्मशास्त्र के विद्वान बर्नार्ड हाइकेल को उद्घृत किया है – यह उनका अपने धर्म के बारे में  राजनीतिक रूप से सही रूख अपनाने वाला नजरिया है, क्योंकि उन्हें आज के जमाने में अपने मूल धर्म को मानने में झिझक होती है। लेकिन, वे इस बात को नकार रहे हैं कि उनका धर्म उनसे ऐतिहासिक और कानूनी तौर पर क्या चाहता है। इस्लामिक राज्य के धार्मिक चरित्र के बारे में बहुत सारे प्रकार ईसाई धर्म से प्रभावित हैं।

सभी मुस्लिम मानते हैं कि मोहम्मद की शुरूआती विजय कोई बहुत सुव्यवस्थित नहीं थी। उनका यह भी मानना है कि कुरान में जो युद्ध के नियम बताए गए हैं और पैगंबर के राज का जो वर्णन है वह ऊथल-पुथल भरे और हिंसक समय के अनुकूल है, लेकिन इस्लामिक राज्य के लड़ाके इन युद्धों के नियमों का पूरी ईमानदारी और श्रद्धा से पालन कर रहे हैं। इनमें से बहुत-सी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में आधुनिक मुसलमान मानना चाहते हैं कि यह उनके धर्म का अपरिहार्य अंग नहीं है। गुलामी, सूली चढ़ाना, सर कलम करना आदि मध्ययुगीन बाते हैं, जिन्हें इस्लामी राज्य के लड़ाके थोक के भाव में आज के जमाने में ले आए हैं। कुरान में साफ तौर पर इस्लाम के शत्रुओं के लिए सूली पर चढ़ाना एकमात्र दंड बताया गया है। ईसाईयों के लिए जजिया और इस्लाम के वर्चस्व को स्वीकार करने का प्रावधान किया गया है। यह नियम पैगंबर ने लागू किए हैं। इस्लामिक राज्य के नेता जो पैगंबर का अनुसरण करना अपना कर्तव्य मानते हैं, उन्होंने इन दंडों को फिर लागू किया, जिनकी कोई परवाह नहीं कर रहा था। हाईकेल कहते हैं कि इस्लामिक राज्य के समर्थकों ने केवल उनके शाब्दिक अर्थ को ही ग्रहण नहीं किया, वरन उसे बहुत गंभीरता से पढ़ा भी। आम मुसलमानों में आमतौर पर ऐसी गंभीरता नहीं होती।

04-04-2015

इस्लामिक राज्य और अल कायदा में फर्क यह था कि अल कायदा ने कभी नहीं कहा कि गुलामी को स्थापित करना चाहता है जो मध्ययुगीन इस्लाम का अहम हिस्सा था। गुलामी पर चुप्पी उसका रणनीतिगत फैसला था। जबकि इस्लामिक राज्य ने लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया तो कुछ लोगों ने विरोध जताया, लेकिन इस्लामिक राज्य ने कोई अफसोस जताए बगैर गुलामी और सूली पर चढ़ाना जारी रखा। इस्लामिक राज्य के प्रवक्ता अदनानी ने कहा – ”हम तुम्हारे रोम को जीतेंगे, तुम्हारे सलीब तोड़ेंगे, तुम्हारी औरतों को गुलाम बनाएंगे। अगर हम नहीं कर सके तो हमारे बेटे-पोते यह करके दिखाएंगे। वे तुम्हारे बेटों को गुलाम बनाकर गुलाम बाजार में बेचेंगे।’’ इस्लामिक स्टेट की ऑनलाइन पत्रिका ‘दबिक’ में तो गुलामी की पुनस्र्थापना पर एक पूरा लेख लिखा गया है। इस लेख में लिखा गया था – ‘यजीदी महिलाओं और बच्चों को शरीया के मुताबिक सींजर में भाग लेने वाले लड़ाकों के बीच बांट दिया गया है। काफिरों के परिवारों को गुलाम बनाकर उनकी महिलाओं को रखैल बनाना शरीया का स्थापित हिस्सा है। अगर कोई कुरान के इन आयतों और मोहम्मद की बातों को नकारेगा या उनका मजाक उड़ाएगा तो इस्लाम का द्रोही होगा।’’

बाकी इस्लामी संगठनों और इस्लामी राज्य संगठन में एक बहुत बड़ा फर्क यह है कि उसने खिलाफत की स्थापना की। ब्रिटेन से भी ज्यादा क्षेत्रफल वाला स्वतंत्र देश स्थापित किया। खिलाफत की स्थापना के लिए यह जरूरी है। इस कारण दुनिया भर के खिलाफत की स्थापना चाहने वालों को बगदादी द्वारा अपने को खलीफा घोषित करने पर खुशी हुई। कारण यह था आखिरी खिलाफत ऑटोमन साम्राज्य थी जो 16वीं शताब्दी में अपनी कीर्ति के शिखर पर पहुंची। 1924 में तुर्की के तानाशाह कमाल अतातुर्क ने उसे खत्म कर दिया, लेकिन इस्लामी राज्य  के समर्थक उसे वैध खिलाफत नहीं मानते हैं, क्योंकि उसने पूरी तरह से शरीया कानून लागू नहीं किया था जिसमें गुलामी, पत्थर मारकर हत्या करना और शरीर के अंग काटना आदि भी शामिल है। इसके अलावा इसके खलीफा पैंगबर के कुरैश कबीले के नहीं थे। खलीफा बनने के लिए यह एक आवश्यक योग्यता मानी गई है। बगदादी के रूप में एक ऐसा खलीफा मिला है जो मोहम्मद पैगंबर के कुरैश कबीले का है।

बगदादी ने मोसूल में दिए अपने भाषण में खिलाफत के महत्व पर प्रकाश डाला था। उसने कहा कि संस्था ने पिछले एक हजार साल से कोई काम नहीं किया। इस्लामी राज्य के समर्थकों का कहना है कि खिलाफत केवल राजनीतिक ईकाई नहीं हैं, यह मुक्ति का साधन है। इस्लामी राज्य का प्रचारतंत्र लगातार मुस्लिम विश्व के संगठनों द्वारा खिलाफत के प्रति आस्था के इजहार की खबरें छापता रहा है। मोहम्मद पैगंबर ने कहा था कि आस्था प्रगट किए बगैर मरना जाहिली या अज्ञान  में मरना है। इसलिए खिलाफत  की स्थापना से इस्लाम पुनस्र्थापित हुआ है।

खलीफा का एक दायित्व शरिया को लागू करना है। इस्लामी राज्य के कुछ समर्थक मानते हैं कि शरिया को गलत समझा गया है, क्योंकि उसे आधे-अधूरे तरीके से लागू किया गया, जैसे सऊदी अरब में सर कलम कर दिया जाता है और चोर के हाथ काट दिए जाते हैं। इस तरह से पैनल कोड लागू किया जाता है। लेकिन,शरिया के सामाजिक-आर्थिक न्याय को लागू नहीं किया जाता। शरीया एक पूरा पैकेज है, उसे पूरा लागू न करने से उसके प्रति नफरत फैलती है।

खलीफा के बारे में उसका कहना है कि खलीफा का एक काम है हमलावर जिहाद शुरू करना। इसका मतलब है गैर-मुस्लिमों द्वारा शासित देशों में जिहाद को फैलाना। खिलाफत का विस्तार करना खलीफा का कर्तव्य है। खलीफा के बगैर हमलावर जिहाद की अवधारणा काम नहीं करती। उनका यह भी कहना है कि जिन नियमों की तहत इस्लामिक स्टेट काम करता है वे क्रूरता पर नहीं दया पर आधारित है। खलीफाराज का दायित्व दुश्मनों को आतंकित करना है। दरअसल फांसी लगाना, सर कलम करना, महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाने से विजय जल्दी मिलती है और संघर्ष लंबा नहीं होता।

इस तरह इस्लामी राज्य के समर्थक लोगों को इस्लाम की चौदह सौ साल पुरानी दुनिया में ले जाना चाहते हैं, जहां ईश्वरीय कानून शरीया पूरी तरह से लागू होगा। एक इस्लामी राज्य के समर्थक का बयान अखबार में

छपा था कि ईश्वरीय कानून यानी शरीया में जीने का अपना आनंद है। इसी आनंद का स्वाद लेने दुनिया के कई देशों के लाखों मुसलमान वहां पहुंच रहे हैं। यह बात अलग है कि बाकी लोग इस्लामी राज्य की करतूतों को हैवानियत मानते हैं।

सतीश पेडणेकर

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