ब्रेकिंग न्यूज़ 

इस्लाम का आंतरिक संघर्ष

इस्लाम का आंतरिक संघर्ष

इस्लाम के विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान ने हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में जो कहा है वह सोलह आने सही है। उन्होंने कहा – ”विश्व मुस्लिम समाज बारूद के ढ़ेर पर खड़ा है। जो छोटे सी वजह से भड़क सकता है। सभी मुसलमान टाइम बम की तरह जी रहे हैं। मेरे व्यापक अध्ययन और अनुभव के बाद मैं इस नतीजे पर पहंचा हूं कि मुस्लिम समुदाय अभी नफरत में जी रहा है। फर्क केवल इतना है कि कुछ मुसलमान सक्रिय  हिंसा में जुटे हैं और बाकी मुसलमान पैसिव हिंसा में।” मौलाना की बात में दम है। जब हर मुसलमान टाइम बम बन जाए तो मुस्लिम विश्व में सिविल वार होना स्वाभाविक ही है। इस्लाम को शांति का मजहब कहा जाता है लेकिन आज उसके नाम पर जितनी नफरत, हिंसा और आतंकवाद फैल रहा है उससे इस्लाम को शांति का मजहब कहने पर सवाल उठने लगे हैं। काफिरों से इस्लाम का झगड़ा सदियों से रहा है। आज हालात इतने बदल गए हैं कि  इस्लाम को सबसे ज्यादा खतरा मुसलमानों से ही है। तभी तो मुसलमान ही मुसलमान के खून का प्यासा हो उठा है। इन दिनों इस्लाम में कई सिविल वार एक साथ चल रहे हैं। एक सिविल वार चल रहा है आतंकवादियों और बाकी समाज के बीच, दूसरा सिविल वार  वहाबी बनाम सूफी का है, तीसरा शिया बनाम सुन्नी, चौथी इस्लामी राष्ट्रों और उनकी उप-राष्ट्रीयताओं के बीच।

आज इस्लाम के नाम पर आतंकवादी जिस तरह बर्बर हिंसा कर रहे हैं वह किसी गृहयुद्ध से कम नहीं है। उनके लिए हर वह व्यक्ति उनका दुश्मन है जो उनकी तरह के शुद्ध इस्लाम को नहीं मानता। पिछले दिनों बोको हरम के लड़ाकों ने नाइजीरिया के एक  सैन्य अड्डे पर लूटपाट के बाद तकरीबन पूरा शहर आग लगाकर तबाह कर दिया। हमले के बाद शहर छोड़कर भागने वाले लोगों ने बताया है कि लगभग 10 हजार की आबादी वाला ये शहर ‘पूरी तरह से तबाह’ हो गया है। बागा शहर की गलियों में लाशें ही लाशें पड़ी हैं और माना जा रहा है कि हमले में करीब 2,000 लोग मारे गए। शहर में इतनी लाशें हैं कि जिनकी गिनती करना मुश्किल है। इससे एक महीने पहले पाकिस्तान के पेशावर में स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए तालिबानी आतंकवादी हमले में 141 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 132 बच्चे थे।

इस तरह की आतंकी घटनाएं इन दिनों आम बात होती जा रही हैं। पिछले कुछ समय में इस्लामी आतंकवाद ने विकराल रूप ले लिया है। प्रतिष्ठित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ एकानॉमिक्स एंड पीस ने 2014 की रपट में कहा है कि एक तल्ख हकीकत यह है कि 2013 में 80 फीसदी आतंकवादी मौतें केवल पांच देशों – इराक, सीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नाइजीरिया में हुई हैं। ये सभी इस्लामी देश हैं। इसलिए नुकसान मुसलमानों का ही हो रहा है। 2013 में हुई  आतंकवाद के कारण हुई मौतों में से 66 प्रतिशत चार आतंकवादी संगठनों –  आईएसआईएस, बोको हरम, तालिबान और अल कायदा, के कारण हुईं। ये सभी संगठन वहाबी इस्लाम के कट्टर समर्थक हैं। लेकिन इस्लामी आतंकवादी संगठन केवल यही चार नहीं हैं। इन दिनों इस्लामी आतंकवादी संगठनों की तो बाढ़ आई हुई है। सौ के आसपास  इस्लामी आतंकवादी संगठन हो सकते है दुनियाभर में। यदि उनकी वारदातों को भी जोड़ लिया जाए तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि लगभग 80 से 85 प्रतिशत वारदातें इस्लामी संगठनों की तरफ से हो रही हैं। लोग भले ही कहते हों कि धर्म और आतंकवाद का कोई रिश्ता नहीं होता, लेकिन इन दिनों आतंक पर इस्लाम का एकाधिकार स्थापित होता जा रहा है। इस्लामी आतंकवाद में केवल वहाबी संगठन ही नहीं हैं वरन शिया, सुन्नी आदि हर तरह का आतंकवाद है। इराक में तो एक सफी आतंकवादी संगठन है जिसका नाम नक्शबंदी आर्मी है, जिसे सद्दाम के समर्थकों ने बनाया है। पाकिस्तान और इराक में शिया और सुन्नी दोनों ही प्रकार के आतंकी संगठन हैं। इस्लाम में एक और संघर्ष उग्र रूप ले चुका है। सारा मुस्लिम विश्व शिया और सुन्नी के खेमों में बंट चुका है और उनके संघर्ष ने लाखों जानें ली हैं। जिस देश में शिया बहुसंख्यक हैं वे सुन्नियों का दमन कर रहे हैं। उनके साथ ऐसा भेदभाव करते हैं कि जीना मुहाल हो जाए। सुन्नी देशों में ऐसा ही सलूक शियाओं के साथ किया जाता है। इस कारण इराक, सीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, सऊदी अरब, बहरीन, यमन, लेबनान, फिलीस्तीन में यह संघर्ष खूनी रंजिश में बदलता जा रहा है।

04-04-2015

हाल के समय में इराक और सीरिया के गृहयुद्ध शिया-सुन्नी की खूनी रंजिश की मिसाले हैं, जिसमें लाखों लोगों की जान जा चुकी है। शिया और सुन्नियों की दुश्मनी उतनी ही पुरानी है जितना पुराना इस्लाम। लेकिन   सदी की शुरूआत में इराक में इसका जिस चरम रूप में विस्फोट हुआ उसने दुनिया को दहला दिया। 2003 में इराक पर अमेरिकी कब्जे के बाद स्थिति बिगडऩे पर शिया और सुन्नियों के बीच राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के लिए हुए गृहयुद्ध में दो लाख से ज्यादा लोग मारे गए। इराक की 98 प्रतिशत मुस्लिम आबादी में 65 प्रतिशत शिया और 32 प्रतिशत सुन्नी हैं। शिया बहुल होने के बावजूद इराक के शियाओं की त्रासदी यह रही कि सदियों से सुन्नियों का शासन रहा। नतीजतन 1935 और 1936 में शिया बगावतें हुईं। टाइम पत्रिका में छपी रपट के मुताबिक 1991 के खाड़ी युद्ध में सद्दाम की पराजय के बाद शियाओं को लगा कि यह तानाशाह के खिलाफ बगावत का सुनहरा अवसर है, लेकिन सद्दाम विद्रोह को कुचलने में कामयाब रहे। इसमें दो से तीन लाख के बीच शिया मारे गए।

सीरिया का मामला इराक से उल्टा है। वहां गृहयुद्ध इसलिए हुआ क्योंकि तीन चौथाई लोग सुन्नी हैं, मगर बशर असद का शासन है जो शिया हैं। वहां शियाओं की आबादी मात्र 12 प्रतिशत है। असद के शिया होने के कारण सारे शिया उनके पक्ष में खड़े हो गए। वहां अन्य अरब देशों की तरह लोकतंत्र की स्थापना के लिए जन आंदोलन शुरू हुआ, लेकिन बाद में शिया और सुन्नी हथियारबंद लड़ाकों के टकराव में बदल गया, फिर उसने सारे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। असद के पक्ष में थे ईरान, लेबनान का हिजबुल्लाह मिलिशिया, रूस और इराक। विरोध में थे सऊदी अरब, अमेरिका, अल कायदा और आईएसआईएस आदि। तीन साल तक चले सीरिया के गृहयुद्ध में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए। एक तिहाई सीरियाई नागरिक बेघर हो गए। हाल ही में यमन में लंबे समय से सुन्नी सफियों की सरकार के खिलाफ  शिया गुरिल्ला समूह और हौथी के समर्थक अभियान चला रहे थे। कुछ महीने पहले वे सत्ता पलटने में कामयाब रहे। हौथी समर्थकों को ईरान से मदद मिल रही है तो सुन्नियों को सऊदी अरब से। यमन में शिया केवल 25 प्रतिशत हैं तो सुन्नी 75 प्रतिशत। शिया अभी सरकार पर कब्जा करने में सफल हो गए हैं, मगर सुन्नी चुप नहीं बैठनेवाले। इसलिए शिया-सुन्नी संघर्ष के और तेज के आसार हैं।

04-04-2015

कई गैर-अरब मुस्लिम देश भी इस विवाद की चपेट में  आ गए हैं। इन सुन्नी देशों में शियाओं की खैर नहीं है। पाकिस्तान में 75 प्रतिशत सुन्नी और 20 प्रतिशत शिया हैं। इसके अलावा अहमदिया भी अच्छी खासी तादाद में हैं। पहले शिया और सुन्नियों ने मिलकर अहमदियाओं को गैर-मुस्लिम करार दिया। नए कानून के मुताबिक कोई अहमदिया अपने को मुसलमान नहीं कह सकता। उनके खिलाफ  हमेशा ही हिंसा का दौर चलता रहता है। लेकिन अब सुन्नी शियाओं के खिलाफ न केवल हिंसा कर रहे हैं, वरन उनकी मांग है शियाओं को गैर-मुस्लिम करार दिया जाए।  ईरान की शिया क्रांति ने शिया सांप्रदायिकता को हवा दी। उसके  बाद तहरीक-ए-निफज-ए-फिकह-ए-फाफेरिया (टीएनएफ) स्थापित हुआ। उसका मकसद शिया अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना था। इसकी प्रतिक्रिया में आठवें दशक में  कई सुन्नी सांप्रदायिक और आतंकी संगठनों की स्थापना हुई। इनका मकसद शियाओं को काफिर बताकर हत्याएं करना था। इसके जवाब में शियाओं ने एक संगठन बनाया। इस कारण पाकिस्तान में क्वेटा, कराची और गिलगिट-बाल्टीस्तान शियाओं के कत्लगाह बन गए हैं। अब तक 5,000 से ज्यादा शियाओं का कत्लेआम हो चुका है। अफगानिस्तान में शिया, हाजरा और सुन्नी पख्तूनों की पुरानी लड़ाई को तालिबान ने नई धार दे दी। तालिबान जब सारे अफगानिस्तान को फतह करने निकले तो उन्होंने तय किया कि अफगानिस्तान को शियाओं से मुक्त कर देंगे। मजार शहर में 5000-6000 शिया तालिबानों के हाथों मारे गए। बाद में यह भी पाया गया कि इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए तालिबान ने उज्बेक और ताजिकों की भी हत्याएं कीं।

शिया और सुन्नियों के बीच सदियों से चल रहे खूनी संघर्ष का इस्लामी देशों में नए रूप में विस्फोट हो रहा है। इसके कारण मध्य-पूर्व के देशों में सुन्नी देश सऊदी अरब और शिया मुल्क ईरान के बीच टकराव का खतरा पैदा हो गया है। कुछ समय पहले तो बहरीन में सुन्नी शासकों के खिलाफ चल रहे शियाओं के जन आंदोलन को लेकर ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी कि लगने लगा था कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रहा शीतयुद्ध कभी भी पूर्ण युद्ध में बदल सकता है।

04-04-2015

इन देशों के बीच चल रहे शीतयुद्ध के पूर्ण युद्ध में बदलने के लिए कुछ भी बहाना हो सकता है। मुस्लिम विश्व में ईरान शिया महाशक्ति है तो सऊदी अरब सुन्नी महाशक्ति। पाकिस्तान हो या अफगानिस्तान, यमन हो या बहरीन, इराक हो या लेबनान हर जगह इन देशों में जोर आजमाइश चलती ही रहती है।

दुनिया के सबसे बड़े तेल खजाने का मालिक होने के कारण सऊदी अरब के पास अकूत संपत्ति है। अपने पेट्रो-डॉलर को झोंककर वह दुनिया के इस्लामी देशों का नेता बनने की कोशिश करता रहता है। उसमें वह कुछ हद तक सफल भी हो गया था, लेकिन 1979 में ईरान में हुई शिया इस्लामी क्रांति और फिर शिया इस्लामी राज्य की स्थापना  ने उसके सपने को चकनाचूर कर दिया। ईरान की क्रांति ने दुनियाभर में सुन्नियों के अत्याचार और भेदभाव का शिकार बन रहे शियाओं में नई जान फूंक दी। उन्हें अपनी पहचान और शक्ति का अहसास कराया। ‘द शिया रिवायवल’ पुस्तक के लेखक वली नस्र इसे शिया पुनर्जागरण कहते हैं। ईरान के नेतृत्व में हुए इस शिया पुनर्जागरण ने इस्लामी दुनिया और खासकर मध्य-पूर्व के देशों के राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट करके रख दिया। अभी तक बहुसंख्यक सुन्नियों की छत्रछाया में रहनेवाले शिया न केवल अलग वरन सुन्नियों की प्रतिद्वंदी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे। सुन्नी शियाओं की इस सफलता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। इससे इस्लाम के इन दोनों संप्रदायों में जगह-जगह टकराव हो रहा है। यह भी कहा जा रहा है यदि ईरान एटम बम बनाता है तो सऊदी अरब भी एटम बम बनाने की दिशा में बढ़ सकता है। इस तरह वह ईरान के शिया बम के जवाब में सुन्नी बम बनाएगा। यदि मध्य-पूर्व में एटमी तकनीक और हथियार फैल गए तो इससे शिया-सुन्नी दुश्मनी और बढ़ेगी, क्योंकि ये देश अपने लिए समर्थक पाने और दुश्मन के प्रति नफरत पैदा करने के लिए शिया-सुन्नी विवाद का इस्तेमाल करते रहेंगे। एटमी हथियारों से लैस शिया-सुन्नी विवाद दुनिया के लिए और ज्यादा खतरनाक होगा।

04-04-2015

तालिबान, अलकायदा और आईएस उनके ढेर सारे सहयोगी संगठन वहाबी आतंकी संगठन हैं। इनके हमलों का निशाना ज्यादातर मुसलमान ही हो रहे हैं। आतंकी वहाबी लोगों को खत्म कर रहे हैं तो वहाबी आंदोलन इस्लाम के बहुलतावाद के तानेबाने को नष्ट करने मे लगा है।

हम अक्सर इस्लाम को एकरूप मान लेते हैं लेकिन ऐसा है नहीं। इस्लाम में घोषित तौर पर 72 फिरके हैं, जिनकी अपनी-अपनी पहचान, अपने अपने रीति रिवाज हैं। इस्लाम के इन फिरकों के वहाबी आंदोलन के साथ रिश्ते तनावपूर्ण होते जा रहे हैं, क्योंकि  वहाबी आंदोलन विविधता वाले इस्लाम को एकरूप बनाना चाहता है। इस्लाम के जानकार डॉ. खुर्शीद अनवर के मुताबिक, मोहम्मद इब्न अब्दुल-वहाब ने एक-एक कर इस्लाम में विकसित होती खूबसूरत और प्रगतिशील परंपराओं को ध्वस्त करना शुरू किया और उसे इतना संकीर्ण रूप दे दिया कि उसमें किसी तरह की आजादी, खुलेपन, सहिष्णुता और आपसी मेलजोल की गुंजाइश ही न रहे। कुरान और हदीस से बाहर जो भी है उसको नेस्तनाबूद करने का बीड़ा उसने उठाया। अब तक का इस्लाम कई शाखाओं में बंट चुका था। अहमदिया समुदाय अब्दुल-वहाब के काफी बाद उन्नीसवीं सदी में आया, लेकिन शिया, हनाफी, मुलायिकी, सफई, जाफरिया, बाकरिया, बशरिया, खुलफिया, हंबली, जाहिरी, अशरी, मुन्तजिली, मुर्जिया, मतरुदी, इस्माइली, बोहरा जैसी अनेक आस्थाओं ने इस्लाम के अंदर रहते हुए अपनी अलग पहचान बना ली थी और उस पहचान की स्वीकृति इस्लामी दायरे में बनी हुई थी।

वहाबियत ने अपनी इस शुद्धता का तांडव बहुत पहले से दिखाना शुरू कर दिया था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसने अपना घिनौना और क्रूर रूप और भी साफ  कर दिया। वहाबियत पर आस्था न रखने वाले मुसलमानों को इस्लाम के दायरे से खारिज करके उन्हें सरेआम कत्ल करना जायज और हलाल बताने जाने लगा। सऊदी अरब में जन्मा वहाबी इस्लाम मौजूदा इस्लाम की मिलीजुली संस्कृति पर विश्वास नहीं करता। वह इस्लाम को उसके पूर्ण शुद्धरूप में स्थापित करना चाहता है। वहाब ने लिखा ‘जो किसी कब्र, मजार के सामने इबादत करे या अल्लाह के अलावा किसी और से रिश्ता रखे वह मुशरिक (एकेश्वरवाद विरोधी) है। उसका खून बहाना और संपत्ति हड़पना जायज है।’

04-04-2015

वहाबी इस्लाम के साथ इस्लाम की जिहाद की सोच भी बदल गई। पहले इस्लाम में जिहाद काफिरों के खिलाफ होता था। अठारहवीं शताब्दी में वहाब ने जिहाद की नई परिभाषा ईजाद की। मुसलमानों का मुसलमानों के खिलाफ जिहाद भी होने लगा। वहाबियों का उन मुसलमानों के खिलाफ जिहाद शुरू हो गया जो इस्लाम के शुद्ध रूप में विश्वास नहीं करते। वहाब ने अपने जमाने में अपने ढंग का असली जिहाद शुरू किया था। उसने एक सेना तैयार की जिसने गैर-वहाबी इस्लामी आस्थाओं के लोगों को मौत के घाट उतारना शुरू किया। वह सिर्फ अपनी विचारधारा का प्रचार करता रहा और जिसने उसे मानने से इनकार किया उसे मौत मिली और उसकी संपत्ति लूट ली गई। इसके साथ ही उसने एक और घिनौना हुक्म जारी किया और वह यह था कि जितनी सूफी मजारें, मकबरे या कब्रें हैं उन्हें तोड़ कर वहीं मूत्रालय बनाए जाएं।

वहाबी इस्लाम से बहुत पहले इस्लाम में सूफी सिलसिलों का उदय हो चुका था। उसका उद्देश्य मोहब्बत का पैगाम देना था। यही कारण है कि जिन-जिन देशों में इस्लाम पहुंचा वहां सूफी मत भी पहुंच गया और काफी लोकप्रिय हुआ। शिया हो या सुन्नी दोनों सूफीवाद को मानते हैं। सूफी भी मध्य-पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया खासकर भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तो अफ्रीका में  सूडान, सोमालिया, नाइजीरिया, लीबिया, माली और ट्यूनिशिया, बालकान देशों में चेचेन्या आदि देशों में फैले हुए हैं। सूफियों ने इस्लाम को बिल्कुल नया आयाम दे दिया और वह गैर-मुस्लिमों के बीच भी बहुत लोकप्रिय हुआ। वहाबी और सूफी इस्लाम के दो ध्रुवों की तरह है। वहाबी  इस्लाम  के शुद्धतावादी चरित्र को मानते हैं, यानी कुरान, हदीस आदि धर्मग्रंथों का ज्यों के त्यों पालन करने के हिमायती हैं। उसमें किसी मिलावट को पसंद नहीं करते। दूसरी तरफ सूफी रहस्यवादी और उदारवादी हैं। वहाबी इस बात पर जोर देते हैं कि अल्लाह के अलावा किसी की इबादत न की जाए। इस्लाम के विपरीत सूफी संगीत और नृत्य को अपनाते हैं। वहाबी इस्लाम सारी दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है, तो उसका मुकाबला सूफी सिलसिलों के साथ होना ही था।

04-04-2015

सऊदी अरब वहाबी इस्लाम को मानने वाला राष्ट्र है। 1952 में बुतपरस्ती का नाम देकर उस पूरी कब्रगाह को समतल बना दिया गया जहां मोहम्मद के पूरे खानदान और साथियों को दफन किया गया था। ऐसा इसलिए किया गया कि लोग जियारत के लिए इन कब्रगाहों पर जाकर मोहम्मद और उनके परिवार को याद करते थे। पिछले कुछ दशकों में तेल के कारण सऊदी अरब के पास अपार संपत्ति आई है। इसके एक हिस्से को वह वहाबी इस्लाम के प्रचार में लगाता है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान और अन्य देशों में सैकड़ों देवबंदी मदरसे सऊदी पैसे से बने हैं। ये मदरसे ही आतंकवादियों की जन्मस्थली बनते हैं, जहां असहिष्णुता की शिक्षा देनेवाले धार्मिक ग्रंथ ही पढ़ाए जाते हैं। नतीजतन वहाबी इस्लाम का दुनिया भर में दबदबा बढ़ता जा रहा है।

कई देशों में इस्लाम से जुड़ी ऐसी तमाम ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जिनका संबंध प्रमुख इमामों, संतों, फकीरों, खलीफाओं आदि से है। मुसलमान वहां जाकर मन्नतें व मुरादें मांगता है। जबकि इसके विपरीत वहाबी विचारधारा अल्लाह को सजदे यानी नमाज पढऩे के सिवा किसी भी अन्य स्थल, दरगाह, रोजा, मकबरा या इमामबाड़ों आदि में चलने वाली गतिविधियों जैसे मजलिस, ताजिया, नोहा, मातम, कव्वाली, नात आदि चीजों को गैर-इस्लामी मानते हैं तथा इसे शिर्क(अल्लाह के साथ किसी अन्य को शरीक करना) की संज्ञा देते हैं। इसी सोच के तहत तालिबान पाकिस्तान में कम से कम 25 मकबरों को निशाना बना चुके हैं। कभी अफगानिस्तान भी सफी, पीर, औलिया और दरवेशों का केंद्र था। वहाबी इस्लाम के अनुयायी तालिबान की क्रूरता ने उन्हें जिंदा नहीं रहने दिया।

वहाबी आतंकवाद अब अफ्रीका के देशों में फैलता जा रहा है। नतीजतन वे सूफी और वहाबी गृहयुद्ध का अखाड़ा बनते जा रहे हैं। सोमालिया, जो मुख्यत: सूफी परंपरा का अनुयायी रहा है, वहां सऊदी हस्तक्षेप ने वहाबियत का जहर भर दिया। अल-शबाब सोमालिया में वहाबी आतंकी संगठन अल कायदा का सहयोगी संगठन है। वह केवल सोमालिया ही नहीं इथीयोपिया, केन्या में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है, लेकिन सोमालिया में अब सूफी संगठन के लोगों ने अल शबाब का मुकाबला करने के लिए बंदूक उठाली है। कहीं-कहीं वे सरकार का साथ भी दे रहे हैं, जो अल शबाब पर नकेल कसने की कोशिश कर रही है। नाइजीरिया में अल कायदा समर्थित आतंकवादी संगठन बोको हरम सक्रिय है। उसने हाल ही में नाइजीरिया में कई सूफी मस्जिदों और मजारों के खिलाफ अभियान चलाया हुआ है। वह मौजूदा सरकार का तख्ता पलट कर उसे इस्लामिक देश में तब्दील करना चाहता है। उसके समर्थक वहाबियों की तरह मानते हैं कि ‘जो भी अल्लाह की कही गई बातों पर अमल नहीं करता है वो पापी है।’ कुछ समय पहले उसने दो सौ लड़कियों का अपहरण कर लिया था, जिन्हें आज तक रिहा नहीं कराया जा सका है। हाल ही में उसने दो हजार से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी। बोको हरम का नेता अबू बकर शेखू ने  एक वीडियो में ऐलान किया था कि ‘मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूं कि नाइजीरिया में लोकतंत्र को जीवित नहीं रहने दूंगा। हम इसके खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं और इसे हरा कर छोड़ेंगे।Ó जनता की जनता के द्वारा सरकार और जनता के लिए सरकार जैसी सोच जल्द खत्म हो जाएगी और अल्लाह की, अल्लाह के द्वारा  और अल्लाह के लिए सोच वाली सरकार कायम होगी।

भारत में वहाबी बनाम सूफी का जंग देवबंदी बनाम बरेलवी के रूप में नजर आती है। बरेलवी और देवबंदी समुदायों का बैर बहुत उग्र और पुराना है। देवबंदी वो मुसलमान हैं जो इस्लाम को उसके शुद्ध रूप में स्थापित करना चाहते हैं। बिल्कुल वहाबियों की तरह। ये भी किसी भी तरह की मूर्ति पूजा को गलत मानते हैं। दूसरी तरफ सूफी संतों और परंपराओं को माननेवाले बरेलवी मजार, दरगाह आदि को पवित्र मानते हैं और उनकी इबादत भी करते हैं। वहां जाकर चादर-फूल चढ़ाते है, धूप आदि जलाते हैं, कव्वाली गाते हैं। दूसरी तरफ देवबंदी हैं जो सऊदी अरब में पैदा हुए वहाबी इस्लाम को मानते हैं, वे दरगाहों और इबादत को मूर्ति पूजा करार देकर गैर-इस्लामी मानते हैं। हिन्दुस्तान के ज्यादातर मुसलमान बरेलवी सुन्नी संप्रदाय को माननेवाले हैं। बरेलवियों का दावा है कि देश के 80 प्रतिशत मुसलमान बरेलवी हैं, लेकिन सत्ता केंद्रों पर देवबंदी मुसलमान ही छाए हुए हैं। यहां हम आपको बता दें कि ये न केवल  दोनों मुस्लिम हैं वरन उसके सुन्नी संप्रदाय के उप संप्रदाय हैं।

दो साल पहले बरेलवी मुस्लिमों से जुड़ी  सूफी दरगाहों और मजारों के मौलवियों की संस्था ऑल इंडिया उलेमा एंड माशेख बोर्ड ने मुरादाबाद में सूफी महापंचायत का आयोजन किया। इसमें देवबंदियों पर यह आरोप लगाया गया कि बह भारत में वहाबी खतरे को ला रहे हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि जब हमें अपने अधिकारों को हासिल करना चाहिए। हम यह प्रतिज्ञा करें कि हम कभी वहाबी इस्लाम का समर्थन नहीं करेंगे। सम्मेलन में आरोप लगाया गया कि देवबंदी संगठनों द्वारा संचालित मदरसे सऊदी अरब के पैसे से चलाए जाते हैं। वहां से कट्टरतावादी वहाबी इस्लाम की शिक्षा दी जाती है और उसका प्रसार किया जाता है। आतंक फैलाने वाले इन लोगों से हम अपने समन्वयवादी इस्लाम को अलग रखना चाहते हैं। इसके बाद से दोनों सुन्नी संप्रदायों में तीखा वाक्युद्ध चल रहा है। हाल ही में इसके बाद दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी किया कि मुसलमानों को किसी का जन्मदिन नहीं मनाना चाहिए। इतना ही नहीं उन्हें मोहम्मद पैगंबर का भी जन्मदिन नहीं मनाना चाहिए। इसका बरेलवियों के बोर्ड ने उसकी तीखा विरोध किया।

कश्मीर घाटी में पहले से ही बहुसंख्यक बरेलवी मुसलमानों और तेजी के साथ फैल रहे अहले हदीथ पंथ के बीच तनाव बढ़ रहा है। जमीयत अहले हदीथ के बढ़ रहे प्रभाव से बरेलवी मुसलमानों में रोष है।

अहले हदीथ को बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों की सूफी परम्पराओं के प्रति असहिष्णु माना जाता है। उसके अनुयायी सूफियों और संतों का आदर नहीं करते, जिन्हें कश्मीरी मुसलमान उच्च सम्मान देते हैं। आज हदीथ 700 मस्जिदों और 125 मदरसों का प्रबंधन करता है और सदस्यता 15,00,000 से ऊपर पहुंच गई है। विचारधारा के स्तर पर सऊदी अरब के वहाबी पंथ से करीबी रखने वाले जमीयत अहले हदीथ को पैसा भी वहीं से मिलता है। इस कारण ही उसके लिए नई मस्जिदेें और मदरसे बनाना संभव हो पा रहा है। इसे सऊदी अरब के पैसे से प्रेरित कश्मीर के वहाबीकरण और तालिबानीकरण का अभियान माना जा रहा है।

कुछ समय पहले कुछ इस्लामी देशों में मिस्र, ट्यूनिशिया, लीबिया, सीरिया आदि में जैसमीन रिवोल्यूशन की बयार बहनी शुरू हुई थी, तब लगा था कि शायद अब इन देशों में वास्तविक लोकतंत्र कायम होगा, लेकिन कुछ देशों में इस क्रांति को इस्लामवादियों ने अगवा कर लिया। कुछ देशों में गृहयुद्ध शुरू हो गया और हालत बद से बदतर हो गए। कुछ इस्लामी देशों में उप राष्ट्रीयताओं का संघर्ष बहुत उग्र रूप ले चुका है। यह भी मुस्लिम बनाम मुस्लिम की ही मिसाल है। जब से पाकिस्तान आजाद हुआ है, तब से आज तक बलूचिस्तान पाकिस्तान की केन्द्रीय सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। बलूच नेता चाहते थे कि पाकिस्तान में शामिल किए गए बलूचिस्तानी सूबे के साथ-साथ ईरान और अफगानिस्तान के बलूच-बहुल इलाकों को मिलाकर आजाद बलूचिस्तान बनाया जाए। पिछले 65 सालों से बलूचिस्तान को आजाद कराने की यह लड़ाई जारी है। समय-समय पर यह मांग खुले आतंकवाद का रूप भी धारण कर लेती है।

बलूचों की तरह कुर्द भी तुर्की, ईरान, इराक, सीरिया आदि इस्लामी देशों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। वे अलग कुर्दिस्तान की मांग के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह संघर्ष अकसर हिंसक और आतंकवाद प्रेरित हो जाता है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों में ही शिया मुसलमानों खासकर हाजरा शियाओं को सुन्नी वहाबियों द्वारा चुन-चुन कर मारा जा रहा है। पख्तून वर्चस्व वाले तालिबान जब सारे अफगानिस्तान के फतह पर निकले तो उन्होंने मजार शहर पर कब्जा करने के बाद वहां हाजराओं का बड़े पैमाने पर नरसंहार किया। बाद में यह भी पाया गया कि इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए तालिबान ने उज्बेक और ताजिकों को भी नहीं बख्शा।

यह सारी हिंसा इस्लाम के लिए ही नहीं,  पूरी मानवता के लिए समस्या बन गई है। वैसे इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म नहीं है जिसने अपने प्रचार प्रसार के लिए हिंसा का सहारा लिया है। किसी समय ईसाइयों ने भी क्रूसेड के नाम पर हजारों लोगों की हत्या की थी, लेकिन ईसाइयों ने आत्मावलोकन किया। अपनी धार्मिक मान्यताओं पर सवाल भी उठाए और अपने धर्म में सुधार भी किए। उसने कुछ  सेक्युलर बनाने की कोशिश की। इस्लाम की शोकांतिक यह है कि इस्लाम में यह कोशिश  नजर नहीं आती। वह मानता है कि इस्लाम एकमात्र सच्चा धर्म है, ईश्वर का धर्म है। उसका शुद्ध रूप में पालन किया जाना चाहिए। जो शुद्ध रूप का पालन करेगा वही मुस्लिम है। यही सोच वहाबी विचारधारा को जन्म दे रही है। इसलिए वहाबी बनाम 72 फिरके का नजारा दिखाई दे रहा है। आज आलम यह है कि वहाबी ही इस्लाम की मुख्यधारा बनता जा  रहा है। इससे इस्लाम की सिविल वार तेज ही होगी। मुस्लिम देशों को इस्लामी राष्ट्र घोषित करने से समस्या हल नहीं होती। उग्रवादी सवाल उठाने लगते हैं कि इस्लामी राष्ट्र है तो इस्लामी राजनीति, आर्थिक व्यवस्था और  इस्लामी कानून शरीयत भी पूरी तरह लागू किया जाए। तब उस देश में इस मुद्दे पर हिंसा, आतंक और गृहयुद्ध शुरू हो जाता है। अब तो शुद्ध इस्लाम पर ही अमल हो यह मुद्दा भी आ गया है। इस विविधतापूर्ण दुनिया को एकरूप बनाने की कोशिश आखिरकार तनाव और हिंसा ही पैदा करती है। अभी तो इस्लाम को इससे मुक्ति मिल पाने की उम्मीद नहीं है।

सतीश पेडणेकर

ukladka-parketaпродажа картриджей

Leave a Reply

Your email address will not be published.