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कच्ची उम्र का प्रेम

कच्ची उम्र का प्रेम

कच्ची उम्र का प्यार, जो आंधी और तूफान की तरह हर टीन-ऐजर की जिंदगी में दस्तक देता है। ऐसा ही एक 16 साल का लड़का है जिसे प्यार हो जाता है इंग्लिश की कोचिंग क्लास में उसके साथ पढऩे वाली 15 साल की दीपशिखा से। उसे पहली नजऱ में ही दीपशिखा से प्यार हो चुका था, लेकिन दीपशिखा से उसका नाम पूछने की हिम्मत जुटाने में उसे 2 हफ्ते लग गये। उनके बीच भले प्रेम के बीज फूट चुके थे। लेकिन वो कभी डेट पर नहीं गये, न फ्लर्ट किया और यहां तक कि कभी रोमांटिक बातें भी नहीं करते है! उनके बीच कुछ न हो कर भी बहुत कुछ था।

उपन्यास ‘दीपिका एक प्रेम कहानी’ टीन एज प्यार पर लिखा गया है। इसमें बचपन के प्यार के हर पक्ष को बड़ी ही बारीकी से उकेरा गया है। किताब की खास बात यह है कि इसकी पूरी कहानी अंकुर महर की असली जिंदगी की कहानी है। कुछ काल्पनिक पक्षों को जोड़कर इस उपन्यास की रचना की गई है।  बचपन का प्यार क्या होता है, कैसे नजरों से नजरें मिलती हैं और दिल धड़क उठता है। कैसे कल्पना की दुनिया में हम गोते लगाने लगते हैं, भावनाओं का ज्वार कैसे हमारे दिल में उमड़ता-घुमड़ता है, कैसे एक बार दिल में कोई बस जाए तो उसकी एक मुस्कुराहट, एक हंसी पर हम जान छिड़कते हैं।

11-09-2016कहने का भाव यह कि एक बार कोई आपके दिल में क्या बसा, उसके चेहरे की एक मुस्कान, उसके हाव-भाव आपके लिए बहुत मायने रखने लगते हैं। उसकी एक अदा पर हम सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं। वैसे यह सिर्फ  कम उम्र में ही नहीं होता है, बड़ों के साथ भी ऐसा होता है। फिर भी बचपन की मासूमियत उसमें नहीं झलकती। कितना निश्छल होता है बचपन का प्यार। इस उपन्यास में बचपन के प्यार की पूरी कहानी मोहकता से कही गई है। यही बात इसे पाठनीय बनाती है। उपन्यास के ऐसे ही कुछ खास अंश हैं जिससे पता चलता है कि लेखक ने इस उपन्यास को कितनी गहराई से लिखा है।

दीपिका

लेखक      : अंकुर नाविक / अर्जुन महर

प्रकाशक             : रिगी पब्लिकेशन

मूल्य                      : 143 रु.

पृष्ठ                        : 299

”मैंने नजर घुमाकर देखा, वह दीपशिखा ही थी। मेरी तरफ  देखकर उसने एक मुस्कराहट दी। उसकी उस मुस्कान में शुक्रवार वाली उदासी कहीं खो गई थी। मुझे लगा वह दूसरी वाली पंक्ति में सबसे पीछे लगी बैंच पर बैठ जाएगी, जो खाली थी। लेकिन वह सीधे बेझिझक मेरे पास रखे स्टूल पर अपनी चुन्नी को संभालते हुए बैठ गई। हल्की बादामी रंग की कुर्ती पर गहरे बादामी रंग के फूल बने हुए थे। उसके नीचे उसी गहरे बादामी रंग की चूड़ीदार सलवार पर पैर के पंजे के ऊपर पड़ी चूडिय़ां उसके शरीर को मदहोश-सा बना रही थीं। उसके गोरे पैरों में पड़ी काली रंग की साधारण सेंडल भी आकर्षक लग रही थी। कंधों पर डाली गहरे बादामी रंग की चुन्नी थोड़ी-थोड़ी देर में अपनी उपस्तिथि दर्ज करके अपनी जगह से हट जा रही थी। उसके बाल आज सबसे ज्यादा अच्छी तरह गुंथे हुए लग रहे थे। आज उसने अपने बालों में तारनुमा काले रंग का हेयरबेन्ड माथे के ऊपर के बालों पर लगाया था, जो उसके काले बालों में गुम होता सा लग रहा था। उसके चेहरे का निखार आज अपने चरम पर था, और उन सब पर भारी थी, उसके चेहरे से जा चुकी उदासी। मैंने उसे अपने पास बैठने के लिए सही तरीके से जगह दी। अपने स्टूल को थोड़ा बांई तरफ  खिसकाते हुए उसकी तरफ ध्यान से देखा और फिर अपने स्टूल पर बैठकर एक लंबी आह भरी सांस खींचते हुए आंख बंद कर एक छोटी-सी सोच में मुस्कराते हुए खो गया। मैं दीपशिखा के मुकाबले इतना अच्छा नहीं दिखता था, ऐसे में मेरे दिमाग में बार-बार प्रश्न उठता कि क्या वह मुझमें कहीं-न-कहीं आकर्षण महसूस करती है?’’

ये कहानी महज अंकुर महर की नहीं है, बल्कि यह कहानी तो हर टीन एजर की है जो एक खास उम्र में किसी की ओर आकर्षित होता है और फिर उसकी कहानी किसी कॉफी हाउस से शुरू होकर धूप में तपती है और बारिश में सराबोर होती है। धूप की तपन और बारिश की बूंदों में ही प्रेम का रंग दिनोदिन गहरा होता जाता है।

 प्रीति ठाकुर

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