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न्याय व्यवस्था के पूर्ण सुधार की तैयारी

न्याय व्यवस्था के पूर्ण सुधार की तैयारी

मेरे सामाजिक जीवन की शुरुआत संघ के सामाजिक कार्यों से हुई। मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में वकालत को एक सामाजिक सेवा रूपी पेशे के रूप में ही समझा। भारत की न्याय व्यवस्था आज तक भारतवासियों को पूरी तरह से सहानुभूति और संतोष का एहसास देने में सक्षम नहीं बन पाई। मैंने एक वकील के रूप में न्याय व्यवस्था की जो सबसे बड़ी कमी देखी वह न्याय में देरी के रूप में ही दिखाई दी। हमारी न्याय व्यवस्था आज तक यह दावा नहीं कर पा रही कि न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने वाले मुकदमों का पूर्ण और अन्तिम निर्णय एक या दो वर्ष के भीतर सम्भव हो सकता है। मैंने अपने 20 वर्ष के वकालत के अनुभव के दौरान कोई एक भी मुकदमा ऐसा नहीं पाया, जिसमें निर्णय के साथ-साथ क्रियान्वयन भी सम्पन्न हुआ हो।

निचली अदालतों में ही कई वर्ष ट्रायल के बिताने के बाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में लंबी अवधि के साथ-साथ वकीलों की भारी फीसें सामान्य व्यक्ति के उत्साह को लगभग समाप्त कर देती हैं। सामान्यत: एक दशक मुकदमेंबाजी में बिताने और अच्छी खासी राशियां खर्च करने के बाद यदि व्यक्ति को विजय प्राप्त होती भी है तो उस विजय को लेकर वह बहुत अधिक उत्साहित और प्रसन्न नजर नहीं आता। इसके विपरीत यदि किसी तकनीकि कमी के कारण व्यक्ति अपने सच्चे पक्ष के बावजूद भी पराजय का सामना करता है तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस वक्त वह सारी न्याय व्यवस्था के साथ अपनी किस्मत को भी कितना कोसता होगा।

 मैंने राज्यसभा सदस्य होने के नाते कुछ वर्ष पूर्व संसद में एक प्राइवेट मेंम्बर बिल प्रस्तुत किया, जिसमें दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा-80 में कुछ संशोधन करने का प्रस्ताव रखा था। दुर्भाग्यवश वह बिल पारित न हो सका। धारा-80 के अन्तर्गत यदि किसी व्यक्ति को सरकार के विरुद्ध कोई मुकदमा करना हो तो मुकदमें से पूर्व दो माह का लिखित नोटिस देना पड़ता है। जबकि वास्तविकता यह है कि इस दो माह के नोटिस के बावजूद भी आज तक किसी सरकारी विभाग ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता नागरिक की विधिवत सहायता नहीं की होगी। ऐसे निरर्थक प्रावधान को सार्थक बनाने के लिए मैंने प्रस्ताव किया था कि जब भी कोई व्यक्ति सरकारी विभाग को धारा-80 के अन्तर्गत नोटिस भेजे तो उस सरकारी विभाग और विशेष रूप से सम्बन्धित जिम्मेदार अधिकारी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यदि किसी मामले में वास्तव में कोई कानूनी त्रुटि छुटी है तो उसे स्वीकार करके प्रार्थी का कार्य विधिवत सम्पन्न किया जाये। यदि सम्बन्धित विभाग ऐसा नहीं करता और प्रार्थी अदालत से अपने पक्ष में निर्णय प्राप्त कर लेता है, तो उस अवस्था में सम्बन्धित जिम्मेदार अधिकारियों पर व्यक्तिगत रूप से भारी जुर्माना लगाकर याचिकाकर्ता को मुकदमें के खर्च के रूप में मुआवजा दिया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त मैंने ट्रायल अदालतों में मुकदमों का बोझ कम करने से सम्बन्धित भी कई दृष्टिकोण संसद में समय-समय पर उठाये। आज यदि कोई न्यायाधीश एक लंबी अवधि पूरे ट्रायल में बिताने के बाद गुण-दोष के आधार पर जब अपना निर्णय देता है तो उसे प्रत्येक निर्णय के कुछ अंक दिये जाते हैं। प्रत्येक न्यायाधीश को अपनी सेवा में अधिक- से-अधिक अंक इकट्ठे करके अपनी सेवा रिकॉर्ड सुदृढ़ करने का अवसर मिलता है। वही न्यायाधीश यदि किसी मुकदमें में दोनों पक्षों का समझौता करवाकर मुकदमें का निपटारा करता है तो उसे सामान्य गुण-दोष पर आधारित निर्णयों के बदले दिये अंकों से कम अंक दिये जाते हैं। इस कारण सामान्यत: न्यायाधीशों की समझौता प्रक्रिया में समय व्यर्थ करने में रुचि ही नहीं बनती। इसके विपरीत यदि प्रत्येक न्यायाधीश को समझौते पर आधारित निर्णय के बदले सामान्य अंकों से अधिक अंक देने का प्रावधान निर्धारित कर दिया जाये तो सारे देश के न्यायाधीश पूरे उत्साह के साथ समझौता प्रक्रिया में रुचि लेने लगेंगे। इससे ट्रायल पर खर्च होने वाला लम्बा समय बचाया जा सकता है।

इसी प्रकार पुलिस के समक्ष जब छोटे-छोटे सामान्य अपराधों से सम्बन्धित मुकदमें आते हैं तो पुलिस उन छोटे-छोटे मुकदमों की छानबीन और उन्हें अदालत में प्रस्तुत करने से लेकर गवाहों के बयान अदालत में दर्ज कराने तक लंबा समय और अपनी सारी ऊर्जा उसी प्रकार लगाती है जिस प्रकार बड़े-बड़े अपराधों में समय और ऊर्जा लगती है। यदि सारे देश की पुलिस को एक विशेष अभियान के अन्तर्गत इस बात के लिए प्रशिक्षित कर दिया जाये कि छोटे-छोटे अपराधों में उन्हें दो मार्गों से कार्य करना चाहिए। प्रथम, पीडि़त और अपराधी पक्ष को परस्पर सामने बिठाकर प्रेम पूर्वक समझौता करवाना चाहिए। समझौता करवाने का अर्थ होना चाहिए, जहां सम्भव और उचित हो वहां मुआवजे की व्यवस्था करवाना और अपराध करने वाले व्यक्ति से गम्भीरतापूर्वक क्षमा याचना करवाना। इस कार्य में स्थानीय पंचायतों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जा सकता है। द्वितीय और महत्तवपूर्ण मार्ग है अपराधी के मस्तिष्क को पूरी तरह से अपराधमुक्त करने का प्रयास करना। इस मार्ग पर कुछ नैतिक और मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों, स्थानीय सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं की सहायता लेने के साथ-साथ विशेष पुलिस सेल भी गठित किये जा सकते हैं जो अपराधी को नैतिकता, देशभक्ति आदि चारित्रिक लक्षणों से युक्त एक निश्चित अवधि का प्रशिक्षण दें। पुलिस को इस सारे कार्य में केवल एक निरीक्षक की भूमिका ही निभानी चाहिए।

इस प्रकार के प्रयासों से स्वाभाविक रूप में एक तरफ मुकदमों में कमी आयेगी तो दूसरी तरफ अपराधियों को छोटे-छोटे अपराधों से विमुख करके एक नैतिक जीवन का मार्ग भी दिखाया जा सकता है, जिससे भविष्य में अपराध दर के कम होने की भी प्रबल सम्भावना तैयार हो सकेगी।

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्तिपुलिस के समक्ष झूठी शिकायत करता है या अदालत के समक्ष झूठी गवाही देता है तो ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्यवाही की जाये। परन्तु वास्तव में इन प्रावधानों का प्रयोग न के बराबर होता है। जिसके कारण पुलिस के समक्ष भारी संख्या में झूठी शिकायतें और अदालतों के समक्ष झूठी गवाहियां अक्सर देखने को मिलती हैं।

केन्द्रीय कानून मंत्रालय ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विशेष निर्देशों के फलस्वरूप देश के लगभग एक हजार से अधिक निष्क्रिय कानूनों को समाप्त करके यह संदेश दिया है कि केवल कानून ही न्याय का मार्ग प्रशस्त नहीं करता। न्याय के लिए तो न्यायालयों के साथ-साथ समस्त नागरिकों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों की भी महत्तवपूर्ण भूमिका निर्धारित की जा सकती है।

कानून मंत्री श्री सदानन्द गौड़ा ने वर्तमान सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर जारी वक्तव्य में केन्द्र के अनेकों ऐसे प्रयासों का उल्लेख किया है, जो न्याय व्यवस्था के सुधार का मार्ग प्रशस्त होने की सम्भावना का संकेत दे रहे हैं। सरकार ने एक राष्ट्रीय लिटिगेशन योजना तैयार की है जिसमें निरर्थक मुकदमों को समाप्त करने की दिशा में लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम निर्धारित किये गये हैं। केन्द्र सरकार ने जिला स्तर से लेकर उच्च न्यायालयों के स्तर तक न्यायालयों की सारी प्रक्रियाओं का कम्प्यूटीकरण करने का भी विशेष अभियान प्रारम्भ कर दिया है। अदालतों के सभी स्तरों पर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने में भी तीव्रगति से कार्य किया गया है। लोक अदालतों के माध्यम से मुकदमों के निपटारे की गति भी तेज की गई है। पिछले दो वर्ष में लगभग 7 करोड़ से अधिक मुकदमों का निपटारा लोक अदालतों के माध्यम से किया गया है।

निकट भविष्य में संध्य अदालतें आयोजित करने के साथ-साथ न्यायालयों की छुट्टियां कम करने और सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की पुन: नियुक्ति जैसी योजनाओं पर भी गम्भीरता से विचार मंथन चल रहा है। यदि सरकार के साथ-साथ समाजसेवी कार्यकर्ता तथा पंचायतें और अन्य सामाजिक और धार्मिक संगठन भी न्याय व्यवस्था में यथासम्भव अपना-अपना सहयोग देने लगें तो वह दिन दूर नहीं होंगे जब भारत की अदालतों का बोझ कम हो जायेगा और मुकदमों का निपटारा कुछ माह में या अधिकतम एक वर्ष के अंदर सम्भव होगा।

प्रत्येक कानून और न्यायिक प्रक्रिया का मूलाधार नैतिकता होती है। अन्त में मुझे स्मरण हो रही है एक पुरानी नैतिक लेन-देन की कथा। एक किसान ने भूमि का एक नया टुकड़ा खरीदकर जब उस पर हल चलाना प्रारम्भ किया तो हल की टकराहट से एक स्वर्णमुद्राओं का घड़ा प्राप्त हुआ। वह घड़ा लेकर भूमि विक्रेता के पास गया और कहने लगा कि मैंने केवल भूमि खरीदी है इस धन पर मेरा अधिकार नहीं है। इसके उत्तर में भूमि विक्रेता ने कहा कि मैंने जब भूमि बेच दी तो उसके किसी कण पर अब मेरा भी अधिकार नहीं है। लेन-देन की इस नैतिकता को यदि आज का समाज अपना ले तो सम्भवत: मुकदमेंबाजी की जड़े ही समाप्त हो सकती हैं।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना             

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