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डूब रहा है नीतिश का बिहार

डूब रहा है  नीतिश का बिहार

बाढ़ आज किसानों के लिए बड़ी समस्या है। बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बाढ़ की समस्या हर साल पैदा होती है, पर अब तक बाढ़ को नियंत्रित करने की कोई कारगर योजना नहीं बन पाई है। इसलिए जब वर्षा कम होती है, तो सूखा पड़ जाता है और जब अधिक होती है तो बाढ़ आ जाती है। गंगा और उसकी अन्य सहायक नदियां ऐसे क्षेत्रों में बहती हैं, जहां वर्षा मुख्यता दक्षिण-पश्चिम मानसून में जून से सितंबर तक होती है। बाढ़ और नदी तट के कटाव का सबसे अधिक प्रभाव ओडिशा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल पर पड़ता है। बिहार में बाढ़ का प्रकोप हर वर्ष होता है। अभी कुछ महीने पहले ही जहां लोग भीषण गर्मी की वजह से पानी की बूंद को तरस रहे थे, वहीं अब अनुमान से अधिक बारिश की वजह से भयानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो गयी है। बिहार, असम, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान समेत देश के कई हिस्सों में लाखों लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हो गए हैं। सबसे दुखद स्थिति तो बिहार की है। राज्य के 12 जिलों के 73 प्रखंडों के 1,934 गांव की 31.33 लाख आबादी बाढ़ से पीडि़त है। बाढ़ से अब तक 37 लोगों की मौत हो चुकी है (जो की एक सरकारी आंकड़ा है)। गंगा नदी के उफान पर होने के कारण बक्सर, भोजपुर, पटना, वैशाली, सारण, बेगूसराय, समस्तीपुर, लखीसराय, खगडिय़ा, मुंगेर, भागलपुर और कटिहार जिलों में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। बाढ़ का पानी धीरे-धीरे अन्य क्षेत्रों में भी प्रवेश कर रहा है। पटना, वैशाली, भोजपुर और सारण जिला के दियारा क्षेत्र (नदी किनारे मैदानी इलाके) बाढ़ से अधिक प्रभावित हैं। गंगा नदी बक्सर, दीघा, गांधीघाट, हाथीदह, भागलपुर और कहलगांव, बूढ़ी गंडक नदी खगडिय़ा, घाघरा नदी गंगपुर सिसवन (सीवान) और पुनपुन नदी श्रीपालपुर में खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं।

नेपाल से आता जलप्रलय

नेपाल में स्थित हिमालयी हिमनदों से निकली नदिया खास कर कोसी और उसकी सहायक नदिया बिहार में ना सिर्फ उपजाऊ जमीन तैयार करती हैं वरन हर साल बाढ़ की विभीषिका भी लाती हैं। पिछले अनेक वर्षों से यह मांग हो रही थी कि नेपाल से निकलने वाली नदियां बिहार में कहर ढा रहीं हैं। इसलिए यह भी मांग उठती रही है कि जहां से ये नदियां निकलती हैं वहीं डैम बनाकर इसके वेग को रोका जाये। इससे नेपाल और बिहार, दोनों में हर वर्ष आने वाली भयानक बाढ़ से छुटकारा मिल जाएगा। यही नहीं, इतनी अधिक बिजली का उत्पादन होगा कि नेपाल और उत्तर बिहार की आर्थिक प्रगति के कारण कायाकल्प हो जाएगा।

यूं तो नेपाल कई  बार भारत सरकार के प्रस्ताव पर सकारात्मक रवैया अपनाने को तैयार  हुआ है, लेकिन ऐसा  माना जाता है कि पड़ोसी देशों खास कर चीन के बहकावे के कारण नेपाल इस तरह के किसी समझौते से पीछे हट जाता है। नतीजा यह होता है कि उसके भयानक परिणाम बिहार, खासकर उत्तर बिहार के लोगों को हर वर्ष भुगतने पड़ते हैं। पिछले अनेक वर्षों से नेपाल से निकलने वाली नदियां खासकर कोसी, कमला और दूसरी सहायक नदियां अचानक ही उत्तर बिहार में एकाएक बाढ़ लाकर प्रलय मचा देती हैं।

जिन लोगों ने उत्तर बिहार की बाढ़ की विभीषिका को देखा है उसकी कल्पना अन्य लोग नहीं कर सकते हैं। बाढ़ आने पर गांव के लोग पेड़ों पर चढ़कर कई दिनों तक भूखे-प्यासे दिन बिताते हैं। नेपाल से आने वाले जहरीले सांप भी उन्हीं पेड़ों पर चढ़ जाते हैं। यह दृश्य अत्यन्त ही भयावह होता है।

एक डाल पर बाढ़ से पीडि़त लोग पानी के जलस्तर के घटने का इंतजार करते हैं और दूसरी तरफ पेड़ की दूसरी डालों पर बैठे हुए जहरीले सांप भी जलस्तर घटने का इंतजार करते हैं। दोनों एक दूसरे से डरे रहते हैं। हर वर्ष बिहार में सर्पदंश से सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश का तो इलाज ही नहीं रहता है।

कई बार तो ऐसा देखा गया है कि जो सरकारी या निजी नाव राहत लेकर इन नदियों के किनारे जाती हैं उनमें पेड़ों के ऊपर से जहरीले सांप गिर जाते हैं जिनके काटने से कई राहतकर्मी भी मारे जाते हैं। इसकी वजह से राहतकर्मी भी राहत कार्य से घबराते है।  बिहार में 22 जुलाई से अब तक आई बाढ़ के कारण राज्य की प्राय: 60 लाख जनता प्रभावित हुई है। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य के विभिन्न भागों में अब तक 100 लोगों से ज्यादा की मौत हो चुकी है। हाल में सन 2008 में कोसी नदी के कुसहा बांध टूटने से जो प्रलयंकारी बाढ़ आई थी उसकी याद अभी भी लोगों के मन में जीवित है। शेष उत्तर बिहार तो प्रभावित हुआ ही था, परन्तु सबसे बुरा हाल सुपौल, पूर्णिया, मधेपुरा, सहरसा और अररिया का था जिससे 40 लाख लोगों की सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई थी और वे देखते ही देखते सम्पन्नता से दरिद्रता की श्रेणी में आ गए थे। दुर्भाग्यवश उस समय भी बिहार को केन्द्र से पूरी सहायता नहीं मिली थी। परन्तु इस बार की बाढ़ तो और भी प्रलयंकारी है।

11-09-2016

गंगा नदी की उफनती धाराओं के कारण बिहार में गंगा से सटे सभी जिलों में बाढ़ की स्थिति अत्यन्त ही गम्भीर हो गई है। गंगा ने पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। बाढ़ विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल से जो नदियां निकलती हैं वे अपने साथ बहुत बड़ी मात्रा में ‘गाद’ (सिल्ट) ले आती हैं। पहले जब फरक्का बांध नहीं बना था तो यह सारा सिल्ट और बालू बहकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाता था, परन्तु अब फरक्का बांध बनने के कारण गंगा में गाद का जमाव प्रतिवर्ष बढ़ता ही जा रही है। इस कारण नदी की गहराई घटती जा रही है और जो भी पानी सहायक नदियों से आता है वह गंगा नदी में न रहकर बाहर के शहरों और देहात में फैल जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष मानसून में बिहार में 14 प्रतिशत बारिश कम हुई है, परन्तु अन्य वर्षों की अपेक्षा गंगा में भयानक बाढ़ आ गई है जिसका मुख्य कारण गंगा के गर्भ में बालू या गाद का जमा होना है। जब-जब फरक्का बांध का गेट बंद हो जाता है तो गाद तेजी से नीचे बैठ जाती है जो बाढ़ का प्रमुख कारण बनती है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गंगा की दुर्दशा पर कहा कि इस दुर्दशा को देखने से उन्हें रोना आ जाता है। दिल्ली आकर उन्होंने प्रधानमंत्री से बात की और कहा कि अविलम्ब कुछ ऐसा उपाय किया जाये जिससे कि गंगा की गाद को साफ किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस बार विशेषज्ञों द्वारा इस बात की जांच की जानी चाहिए कि फरक्का बांध की आवश्यकता है भी या नहीं। फरक्का बांध के बारे में तो प्रधानमंत्री ने कोई आश्वासन नहीं दिया, परन्तु इतना अवश्य कहा कि वे विशेषज्ञों को बिहार भेजकर गाद से निपटने का तुरन्त उपाय ढूंढेंगे।

पूर्व में संप्रग सरकार के कार्यकाल में भी यह प्रयास हुआ था कि पटना के पास ही प्रतिवर्ष इस तरह से ‘ड्रेजिंग’ की जाये जिससे गंगा नदी का पेट गहरा हो जाये और गाद वहां जमा न हो सके। परन्तु दुर्भाग्यवश यह योजना कार्यान्वित नहीं हो सकी और प्रतिवर्ष गाद के भयानक तरीके से जमा होने के कारण गंगा का पेट गहरा नहीं किया जा सका और उसका पानी अगल-बगल फैलकर शहर-देहात को तबाह करता रहा है।

नेपाल से आने वाली नदियों के अलावा मध्य प्रदेश के बाणसागर में जमा पानी भी खोल दिया गया है जिसके कारण भी गंगा में भयानक बाढ़ आ गई है। अब यह मानकर चलना चाहिए कि बिहार में बाढ़ की समस्या अन्य राज्यों की समस्याओं से बिल्कुल भिन्न है और जब तक गंगा नदी के गाद को निकालने की समुचित व्यवस्था नहीं की जाएगी तब तक बिहार हर वर्ष आने वाली बाढ़ से मुक्ति नहीं पा सकेगा।

पटना से नीलाभ कृष्ण

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