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शांति क्षेत्र हिंद महासागर

शांति क्षेत्र हिंद महासागर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंद महासागर के देशों – श्रीलंका, सेशेल्स और मॉरीशस की एकमुश्त यात्रा को दुनिया में एक अलग नजरिए से देखा गया। उनका यह दौरा इस क्षेत्र में आए बड़े बदलावों की पृष्ठभूमि में तय किया गया था। भारतीय विदेश नीति में ‘हिंद महासागर कूटनीतिÓ जैसे मुहावरे का इस्तेमाल सामान्य तौर नहीं किया जाता है। हालांकि यह समूचा क्षेत्र भारत के विस्तृत पड़ोस का ही हिस्सा है। भारत को इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक और व्यावसायिक गतिविधियों केलिहाज से अपनी अहमियत का एहसास कराने की जरूरत है। हमारे व्यापार और तेल आयात का करीब नब्बे प्रतिशत समुद्र केरास्ते ही होता है। अब हमारी अर्थव्यवस्था विश्व बाजार से ज्यादा जुड़ती जा रही है तो हमें समुद्र केरास्ते पर ज्यादा आश्रित होना पड़ेगा। हिंद महासागर एकमात्र महासागर है, जिसका नामकरण किसी देश केनाम पर यानी भारत पर है। हमारी समुद्री सीमा 7,500 कि.मी. लंबी है जो लगभग हिंद महासागर की लंबाई केबराबर ही है।

मोदी केइस दौरे का कुल मकसद यह बताना ही था कि भारत हिंद महासागर का ऐतिहासिक वारिस है और उसकेपास इस क्षेत्र को सुरक्षित रखने की कूव्वत भी है। चीन और अमेरिका को यह संदेश दिया गया कि भारत किसी देश को इस क्षेत्र में अपने भौगोलिक वर्चस्व को तोडऩे नहीं देगा। मोदी ने स्पष्ट तौर पर दो-टुक शब्दों में यह उजागर किया कि भारत के पास इन ‘छोटे-छोटे टापुओंÓ की मदद केलिए वैज्ञानिक और सैन्य ताकत है। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि भारत कभी भी अपने हिंद महासागर केसहयोगी देशों केक्षेत्र में दखलंदाजी नहीं करेगा, बल्कि उन देशों केरक्षा तंत्र को मजबूत करने का हर संभव प्रयास करेगा। इस तरह दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दे दिया गया कि अब से भारत हिंद महासागर में बड़ी नौसैनिक ताकत होने की जिम्मेदारी निभाएगा।

हिंद महासागर दुनिया की बड़ी शक्तियों का आखेट बन गया है। इस क्षेत्र में चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और जापान की दिलचस्पी लगातार बढ़ती जा रही है। दुनिया में जहाजरानी यातायात का करीब तीन-चौथाई हिंद महासागर से गुजरता है। इस क्षेत्र में 30 देश और दुनिया की करीब 40 फीसदी आबादी बसती है। इसका विस्तार ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका केपूर्वी किनारे तक फैला हुआ है। भारत इन सब के लगभग बीच में है। यह तथ्य अब निर्विवाद है कि भारत ने वर्षों से इस रणनीति रूप से महत्वपूर्ण भू-राजनैतिक क्षेत्र की उपेक्षा की है और इसी शून्य को भरने का चीन को मौका मिल गया। मोदी केदौरे ने भारत केसमुद्री पड़ोसियों से रिश्तों में गर्मजोशी लाने की आधारशिला रखी है। भारत की इस नई विदेश नीति और दक्षिण एशिया तथा विस्तारित पड़ोसियों में उसकी दिलचस्पी का स्पष्ट संदेश दे दिया गया है।

दरअसल चीन ने जब इस क्षेत्र में कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश शुरू किया तो भारत में उसकी नौवहन और सैन्य गतिविधियों पर अंकुश लगाने की हड़बड़ी दिखाई पड़ी। इस क्षेत्र में भारत का असर और साख घटती जा रही थी। पिछले दशक केदौरान चीन इस क्षेत्र में दोस्त बनाने और अपना असर फैलाने में कामयाब हो गया। चीन ने भारत केसभी पड़ोसी देशों -पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव में अपने रिश्ते मजबूत किए। मौजूदा स्थिति में कोलंबो की चीन और पाकिस्तान से पींग बढ़ाने की गतिविधियां तेज हो गईं तो भारत इन घटनाओं से भला बेखबर कैसे रह सकता था।

हिंद महासागर शांति क्षेत्र की जड़ें 1964 में काहिरा में हुए निर्गुट देशों केराज्य प्रमुखों केशिखर सम्मेलन में खोजी जा सकती हैं। उस सम्मेलन में श्रीलंका की तत्कालीन प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायकेने हिंद महासागर में महाशक्तियों की होड़ का मसला उठाया था। काहिरा सम्मेलन में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किए गए। एक, दुनिया केसामुद्रिक क्षेत्र को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाया जाए और दूसरे, हिंद महासागर क्षेत्र में उस समय की दो महाशक्तियों को अड्डा बनाने का विरोध किया जाए।

हिंद महासागर को शांति का क्षेत्र घोषित करने का मूल प्रस्ताव 1971 में संयुक्त राष्ट्र आमसभा में पारित किया गया। हिंद महासागर शांति क्षेत्र का प्रस्ताव इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने को लेकर उतना नहीं था, उसका मकसद इस क्षेत्र में तब की दोनों महाशक्तियों की मौजूदगी पर पाबंदी लगाना था। सुरक्षा परिषद में चीन को छोड़कर सभी स्थाई सदस्यों ने इस क्षेत्र में कोई सैन्य अड्डा न होने केप्रस्ताव का विरोध किया था। संयुक्त राष्ट्र आमसभा में इस प्रस्ताव के अनुमोदन केतैंतालिस साल बाद हिंद महासागर का सुरक्षा ढांचा पूरी तरह बदल गया है। सोवियत संघ बिखर गया है और मौजूदा रूस केपास अमेरिका और चीन से होड़ लेने के लिए संसाधन और ताकत नहीं है।

अमेरिका केपूर्व सिनेटर तथा मजबूत शख्सियत डैनियल पैट्रिक मोयनीहन ने एक बार हिंद महासागर में भारतीय दिलचस्पी केबारे सवाल किया था। उन्होंने कहा था कि उस महासागर का नाम तो भारत केनाम पर होना भौगोलिक संयोग मात्र है। उनकेअनुसार उसे मेडागास्कर महासागर भी कहा जा सकता है। मोदी ने अब इन संदेहों पर विराम लगा दिया है। ऐतिहासिक रूप से, 2400 साल पहले, चंद्रगुप्त और अशोक केशासनकाल से ही हिंद महासागर में भारत की जहाजरानी का वर्चस्व रहा है। मध्ययुग में चोलवंश केराज में भारत का असर मलेशिया और इंडोनेशिया से पूरी बंगाल की खाड़ी में रहा है। प्राचीन कलिंग राज का साम्राज्य बाली और सुमात्रा तक फैला रहा है।

दीपक कुमार रथ

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