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कभी सूखा कभी बाढ़

कभी सूखा कभी बाढ़

भारत एक विशाल देश है, इसमें समस्याएं भी विभिन्न प्रकार की हैं, कश्मीर से कन्याकुमारी तक अरूणाचल से कच्छ तक भारत का एक विशाल भूभाग है जो भौगोलिक दृष्टि से भी विभिन्नता लिए हुए हैं और इस प्रकार विभिन्न प्रकार की समस्याएं होना स्वाभाविक है, परन्तु  सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे देश में कभी सूखा पड़ता है तो कभी भयंकर बाढ़ का तांडव होता है और ये दोनों ही स्थितियां इतनी भयंकर हैं कि जनता त्राहि-त्राहि कर उठती है और इन दोनों की मार झेलनी पड़ती है साधनहीन गरीब वर्ग को।

देश के हालात यह हैं कि हर वर्ष देश गर्मियों में सूखे से निपटते हुए बरसात का इंतजार करता है फिर मानसून के आते ही बाढ़ की तबाही से जूझने लगता है। यह एक परंपरा सी बन चुकी है कि जहां सूखा पड़ता है वहां बार-बार बाढ़ आती है और जहां एक बार बाढ़ आती है वहां बार-बार बाढ़ आती है और यह क्रम हर वर्ष दोहराया जाता है और सरकार तथा प्रशासन हर वर्ष लाचार सी दिखाई देती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी न हम सूखे के संकट से निपट पाने में समर्थ हुए और न ही बाढ़ की भयंकर तबाही से निपट पाने में समर्थ हुए। यह सब हमारे कुप्रबंधन के कारण होता है, जिसका खामियाजा हमें प्रतिवर्ष उठाना पड़ता है। इससे निपटने के लिए मीटिंग, सभाएं, बैठकें, योजनाएं तथा घोषणाएं होती रहती हैं तथा राहत कार्यों का ढिंढोरा पिटा जाता है, परंतु इतने वर्षों के बाद भी यथास्थिति ज्यों-की-त्यों है। वहीं ढाक के तीन पात, क्योंकि राहत कार्यों के लिए जारी की गई राशि का अधिकांश भाग नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, इंजीनियरों और बाबूओं की जेब में चला जाता है।

यह विडम्बना ही है कि विश्व में सबसे अधिक वर्षा भारत के मेघालय प्रदेश (चेरापूंजी) में ही होती है, तो वहीं महाराष्ट्र का लातूर भी इसी देश में है जहां बारह महीने वहां के किसानों को सूखे से निपटना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि वहां पीने के पानी के लिए लातूर से चार सौ किलोमीटर दूर विशेष रेलगाडिय़ों द्वारा पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है। गांवों में नहर, कुएं, तालाब में पानी नहीं है। नेताओं की आंखों का पानी समाप्त हो गया है और नौकरशाहों व नेताओं को डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी नहीं है। प्रतिवर्ष देश के लगभग सोलह राज्य कमोवेश सूखे के संकट से ग्रस्त हो जाते हैं जिसके कारण देश के 614 जिलों में से 302 जिलों में अकाल की प्रेत छाया पड़ जाती है। सूखे से लगभग 175 लोकसभा संसदीय क्षेत्र प्रभावित हो जाते हैं।

जो राज्य सूखे की चपेट में आते हैं उनमें से गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा तो समुद्र तटीय हैं। समुद्र के तटीय प्रदेशों की यह हालत होना सरकारी जल प्रबंधन की योजनाओं की असफलताओं का जीता जागता सबूत है। अजीब बात है कि जहां गर्मियों में सूखा पड़ता है उसमें से अधिकांश बरसात के दिनों में बाढ़ की चपेट में भी आ जाते हैं जिस देश में लगभग सवा सौ छोटी बड़ी नदियां हों, एक हजार से अधिक झीलें, चार लाख से अधिक तालाब हों और जहां औसतन 1100 मिलीलीटर बारिश होती हो उस देश में पानी का अकाल हो जाए यह एक अविश्वसनीय सी बात है परन्तु यह शत-प्रतिशत सत्य है।

11-09-2016

महाराष्ट्र के लातूर जिले में सूखे से निपटने के लिए धारा 144 लगाई गई अर्थात वहां किसी कुएं, तालाब, टयूबवैल, पानी के टैंकर के नजदीक पांच से ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते। लगातार सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र राज्य के 3228 किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की पुष्टि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार हो चुकी है। पानी की जद्दोजहद में मार्च 2016 में 29 लोग अपनी जान गंवा चुके थे। सरकार ने इस बात को देखते हुए समस्त कुएं, टयूबवैल और अन्य जल स्रोत अपने कब्जे में ले लिए। 1450 पानी के टैंकरों द्वारा पानी की सप्लाई की गई। पानी की लूट को रोकने के लिए जगह-जगह पुलिस तैनात की गई, कितनी भयावह स्थिति है। लातूर में विशेष रेलगाडिय़ों द्वारा चार सौ किलोमीटर दूर से पानी लाया गया। यह स्थिति केवल लातूर में ही नहीं है, ग्रेटर मुंबई नगर-निगम ने पानी सप्लाई में 35 प्रतिशत की कटौती कर दी। ठाणे, कल्याण, नवी मुंबई को सात जलाशयों से पानी मिलता है, परन्तु इन जलाशयों का पानी समाप्त होता जा रहा है। दक्षिण भारत में स्थिति और भी खराब है। वहां के जलाशयों में सितंबर, 2015 में 34 प्रतिशत पानी बचा था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी झुंझुनू राजस्थान की महिलाओं को केवल पीने का  पानी लाने के लिए 20 किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता है, यह अपने आप में शर्म की बात है। बीकानेर, राजस्थान के अनेक गांवों चिमौना, खडिय़ा, घटियाल आदि दर्जनों गांवों के लोग रात की ठंडक में रेतीले रेगिस्तान को पार कर सारी रात पैदल चल कर पानी लेने के लिए टयूबवैल तक जाते हैं फिर वहां पानी के लिए मारामारी होती है और यदि बिजली नहीं हो तो बिजली आने की प्रतीक्षा में घंटों बैठना पड़ता है। आजादी मिलने के बाद नि:संदेह नेहरू जी ने बांधों के निर्माण की वृहद योजनाएं क्रियान्वित की थीं। इन बांधों का उद्देश्य था बाढ़ और वर्षा के जल का भंडारन करना, उसे सिंचाई के लिए उपलब्ध कराना तथा इस अपार जल राशि से बिजली का निर्माण करना, परंतु परवर्ती सरकारों ने इस बात की बिल्कुल अनदेखी कर दी। जिस देश में स्थानीय जल आपूर्ति प्रति व्यक्ति 1000 घन मीटर से कम है ऐसे देश जल संकट से ग्रस्त माने जाते हैं। इसमें विश्व के 26 देश आते हैं जिनमें अधिकतर देश अफ्रीका के हैं।

जब देश स्वतंत्र हुआ तो हमारे देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5326 घनमीटर आंकी गई थी जो 1991 में घटकर 2267 घन मीटर रह गई थी और वर्तमान में यह 900 घनमीटर से भी कम है अर्थात अब हमारा देश जल संकट से ग्रस्त 6 देशों में है। देश में उपलब्ध पानी का 89 प्रतिशत भाग कृषि कार्यों में जाता है। 6 प्रतिशत उद्योगों में तथा केवल 5 प्रतिशत पानी पीने के काम आता है। औद्योगिक कचरे और रासायनिक खाद के अंधाधुंध प्रयोग से अधिकतर जल स्रोत प्रदूषित हैं, नदियों में इतना जहर घुल चुका है कि उनका पानी पीने योग्य भी नहीं रहा। प्लानिंग से जुड़े विशेषज्ञ डॉ. योगेन्द्र का मानना है कि देश ने 1988 में पड़े भयंकर सूखे से कोई सबक नहीं सीखा, तब ऐसा निश्चय किया गया था कि दीर्घकालिक योजनाएं तैयार कर नहरों की समुचित व्यवस्था की जाएगी। परन्तु बाद की सरकारों ने उस पर अमल नहीं किया। इसके विपरीत भूमि के भीतर से अंधाधुंध जल का दोहन किया जाने लगा जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे गिरने लगा। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रदेशों में भी भूजल स्तार बहुत नीचे जा चुका है। गुजरात के मेहसाना और तमिलनाडु के कोयम्बटूर में भूजल स्तर इतना नीचे जा चुका है कि प्रकृति भी इसे रिचार्ज नहीं कर सकती। यह बड़ी भयावह स्थिति है।

11-09-2016

बाढ़ की विनाशलीला

गर्मियों में हमारा देश जहां सूखे के भीषण संकट से जूझता है, वहीं बरसात के मौसम में बाढ़ के तांडव से भी जूझता है। बाढ़ का कहर सूखे के कहर से कम नहीं है, क्योंकि सूखे की मार तो मनुष्य और जानवर को ही भुगतनी पड़ती है, परन्तु बाढ़ की मार तो मनुष्य और जानवर पर पड़ती ही है इससे भवनों, मकानों एवं पेड़-पौधे को भी क्षति होती है। जो गरीब तिनका-तिनका जोड़कर पूरे जीवन की कमाई से अपना मकान, झोंपड़ी बनाता है और जो सैकड़ों हजारों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहरें हैं वे भी एक पल में ताश के पत्तों की तरह बाढ़ में बह जाती हैं।

भारत कृषि प्रधान देश ही नहीं, बल्कि बाढ़ प्रधान देश भी है। यहां प्रतिवर्ष 67 लाख हेक्टर भूमि पर बाढ़ आती है, इससे प्रतिवर्ष लगभग 26 लाख हेक्टर भूमि की फसलें नष्ट  हो जाती हैं। हिमालयांचल में दो तिहाई क्षति बाढ़ के कारण तथा एक तिहाई क्षति वर्षा से होती है। पानी का 60 प्रतिशत हिमालय से निकलने वाली नदियों तथा 40 प्रतिशत चपत वर्षा तथा चक्रवात से होती है। दक्षिणी प्रायद्वीप में वर्षा एवं चक्रवात से तबाही होती है। सिंधु गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की विनाशलीला बहुत भयंकर होती है। सिंधु गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की विनाशलीला बहुत भयंकर होती है।

11-09-2016

देश में बाढ़ की समस्या नई नहीं है, इसलिए आजादी मिलते ही सरकार ने एक राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण नीति बनाई। इस नीति के अंतर्गत तीन चरणों में काम होना था। पहले चरण में कुछ तात्कालिक उपाय थे जो दो-ढाई वर्षों में पूरे होने थे। दूसरे चरण में अल्पावधि उपाय थे जो 6-7 वर्षों में पूरे होने थे। इनमें खतरनाक जल प्रवाह को मोडऩे वाले गांवों, आबादी वाले इलाकों को पानी की पहुंच से ऊंचा करना आदि थे। तीसरे चरण में दूरगामी उपाय करने थे, इनमें जल भंडारण की व्यवस्था करने, अतिरिक्त तटबंध बनाने आदि का प्रावधान रखा गया था। बाढ़ नियंत्रण का योजनाबद्ध काम शुरू हो चुका था और चौथी पंचवर्षीय योजना के अंत तक 79 लाख हेक्टर भूमि को बाढ़ से सुरक्षा प्रदान की गई। इस प्रकार 1951 से 1978 तक 99 लाख हेक्टेयर भूमि को बाढ़ से सुरक्षित कर दिया गया।

परन्तु 1974 की भीषण बाढ़ ने इन आंकड़ों को गलत सिद्ध कर दिया, उस वर्ष बाढ़ आई तो 58 लाख हेक्टेयर भूमि को बाढ़ ने तबाह कर दिया, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम, कर्नाटक, केरल, ओडिशा तथा मणिपुर को लगभग दो अरब रुपये की फसल की हानि हुई, 2,65,163 घर बाढ़ में बह गए, 1.6 करोड़ घर इससे प्रभावित हुए, 243 लोग तथा 1270 पशु मौत के मुंह में चले गए।

इस प्रकार 1978 की बाढ़ ने 1974 की कीर्तिमान को भंग कर दिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 76 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित हुई। 7000 मकान बाढ़ में बह गए, 1023 लोग जान से हाथ धो बैठे। इसके बाद तो बाढ़ की विनाशलीला का सिलसिला आगे बढ़ता ही चला गया।

11-09-2016

सन 1995 में हरियाणा में ऐसी ही भयंकर बाढ़ आई कि रोहतक शहर बिल्कुल तबाह हो गया था। वहां मकानों की एक-एक मंजिल पानी में डूब गई थी, जिनके एक मंजिला मकान थे वे तो पूरी तरह डूब गए थे इसी से अनुमान लगाया जा सकता था कि जानमाल का कितना भारी नुकसान हुआ होगा। 26 अप्रैल, 2005 को मुंबई में इतनी भयंकर बाढ़ आई थी कि जिसे याद करके आज भी लोग सहम जाते हैं। सन 2010 में दिल्ली में इतनी भयंकर बाढ़ आई थी कि मकानों तथा सड़कों पर पानी ही पानी हो गया था। लगभग सारी दिल्ली में तीन-तीन, चार-चार फुट पानी हो गया था। सुरक्षित कही जाने वाली पॉश

कॉलोनी भी अछूती नहीं रही। उन दिनों कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन भी होना था और बाढ़ का पानी खेल गांव में घुस गया था, जिसके कारण कॉमनवेल्थ के आयोजन पर प्रश्न चिन्ह भी लग गया था।

16 जून, 2013 में उत्तराखंड की त्रासदी आज भी लोगों के दिलो दिमाग पर छाई है। बाढ़ ने हजारों व्यक्तियों को मौत के मुंह में धकेल दिया था। सैकड़ों व्यक्ति बाढ़ में बह गए थे, जिनके शव आज तक नहीं मिले।  केदारनाथ मंदिर भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था और मंदिर के द्वार एक वर्ष बाद खुले थे। आस-पास का क्षेत्र पानी में कागज की नाव की तरह बह गया था। उत्तराखंड उस त्रासदी से आज तक नहीं उभर पाया है। दिसंबर 2015 में चैन्नई में भीषण बाढ़ आई थी। शहर के मुख्य बाजारों में इतना पानी भर गया था कि सड़कों पर नाव चलती थी। यही हाल अप्रैल 2016 में देश के लगभग सभी महानगरों में हुआ।

मुंबई गोवा हाइवे पर रायगढ़ का पुल ही बाढ़ में बह गया उस समय पुल से गुजरने वाली दो बस एवं कार भी उस पुल के साथ बह गई जिनमें बैठे यात्रियों का आज तक कुछ पता नहीं चला। बरसात ने उन शहरों की भी कमर तोड़ दी जिन्हे पेरिस और शंघाई के नाम से पुकारते हैं। पिछले दिनों केवल 3-4 दिन की बरसात ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई हाईटेक सिटी के नाम से विख्यात बैंगलुरू और मिलेनियम सिटी कहलाने वाले गांव का जनजीवन ठप्प हो गया। बैंगलुरू में एक झील ओवरफ्लो करने लगी जिससे पानी सड़कों पर आ गया। लोग सड़कों पर नाव चलाते हुए और यहां तक कि मछली पकड़ते हुए देखे गए।

11-09-2016

यही हाल असम, बिहार और ओडिशा का हुआ जिससे हजारों लोग प्रभावित हो चुके हैं। सबसे बुरा हाल गुडग़ांव का हुआ जहां लगभग 20-22 घंटे तक ट्रैफिक जाम रहा, विवश होकर प्रशासन को दो दिन का सरकारी अवकाश घोषित करना पड़ा। लोगों को अपनी गाडि़य़ां चार फुट पानी में छोड़कर 5-5 कि.मी. पैदल हाथ में अपने जूते लेकर घर आना पड़ा। राष्ट्रीय समाचार पत्र नवभारत टाइम्सक ने र्शीषक दिया – ऑफिस जाना है तो वोट खरीद लो। बाढ़ का प्रकोप केवल शहरों मुंबई, बैंगलुरू, अहमदाबाद, गुडग़ांव, दिल्ली, चैन्नई, कोयम्बटूर आदि में ही नहीं, बल्कि देश के सभी राज्यों के सभी शहरों और गांवों का यही हाल है। मानसून के आते ही या किसी भी मौसम में भारी बरसात होते ही देश में तबाही का दौर आरंभ हो जाता है। महानगरों में जब ऐसी घटना होती है, तो मामला चर्चा में आ जाता है वरना देश के अलग-अलग हिस्सों में यह सब लगातार हो रहा है। आधुनिक शहर बसाने के चक्कर में हमने तालाबों, नदी-नालों के प्राकृतिक बहाव की जगह छीन ली, जहां नदी, नाले जोड़ तालाब होते थे उन पर रिहायशी कॉलोनी बसा दी गईं हैं तो फिर बरसात का पानी जाएगा कहां, फिर तो सड़कों पर ही नदी नाले बहेंगे। नैनीताल के भवाली में शिप्रा नदी के घटने बढऩे की जगह सड़क बना दी तथा उसके दोनों तरफ अपार्टमेंट बना दिए गये, यही हाल मुंबई में मीठी नदी का हुआ तो वाराणसी में वरूणा नदी तथा असी नदी का हुआ। लखनऊ की कुकरैल नदी मात्र नाला बन कर रह गई है।

दिल्लीइंटरनेशनल एयरपोर्ट का नया टर्मिनल 3 जहां बना है वहां तीन तालाब होते थे। बरसात का पानी इन्हीं तालाबों में आकर इकट्ठा होता था। अब वहां हवाई अड्डा बना दिया गया है, तो बरसात का पानी कहां जाएगा, यही कारण है कि 2013 में बरसात का पानी सारे हवाई अड्डे में पूरी तरह फैल गया था और हवाई अड्डे को कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ा था। एक समय था जब बुंदेलखंड की जल निकासी विश्व की सर्वश्रेष्ठ जल निकासी मानी जाती थी। परन्तु पिछले तीन दशकों में हमने उस समय सारी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जहां कभी भी बाढ़ नहीं आई वहां इस मानसून में सबसे ज्यादा बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र बुंदेलखंड और उसके आस-पास का क्षेत्र रहा, बेतवा-केन, उर्मिल, पहुज, सपरार तथा धसान सारी नदियों ने तबाही मचा दी, रीवा, सतना, पन्ना, छतरपुर, शिवपुरी में सबसे ज्यादा तबाही मचा दी, पन्ना में किलकिला नदी ने रौद्र रूप धारण कर लिया।

सन 2015 में चैन्नई का भी यही हाल हुआ था, करोड़ों की आबादी वाले शहर में पानी निकासी तंत्र न के बराबर है। कूंवम और अडयार नदियों पर अतिक्रमण बढ़ता गया, शहर में जालशयों की संख्या 50 से घटकर 27 रह गई जिसका परिणाम शहर निवासियों को भुगतना पड़ा। देश के ज्यादात्तर शहर इसी हाल में हैं और ऐसे ही संकट के कगार पर खड़े हैं। शहरों में पानी और सीवरेज व्यवस्था  बहुत ही खराब है। देश के 5 हजार छोटे-बड़े शहरों में से केवल 300 में ही सीवरेज की व्यवस्था ठीक है, वाराणसी जिसे हम क्योटो बनाना चाहते हैं वहां समूचे शहर में 40 प्रतिशत में सीवरेज व्यवस्था है, बाकि का सेफ्टिक टैंकों द्वारा होता है, जो निजी हैं या फिर बरसात में बहा दिया जाता है। मिलेनियम सिटी गुडग़ांव में केवल 30 प्रतिशत में ही सीवरेज व्यवस्था है। जब पानी निकासी की व्यवस्था नहीं होगी तो पानी जाएगा कहां। वह सड़कों पर या घरों में घुसेगा।

जब नदियों का रास्ता हम रोकेंगे, नदियों के पाट पर अतिक्रमण करेंगे तो बरसात में नदी का पानी अपना रास्ता स्वयं बनाएगी और जब नदी अपना रास्ता बना कर चलती है तो हम उसे बाढ़ कहने लगते हैं। तब शहर में हाहाकर मच जाता है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं मानवीय आपदा है। विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी इमारतें, फ्लाईओवर, हाईवे बना कर हमने शहर के नदी-नालों के स्वाभाविक प्रवाह को रोक दिया है। विकास प्रक्रिया में शहर की भौगोलिक संरचना और बढ़ती जनसंख्या का ध्यान नहीं रखा। ध्यान रखा तो सिफ एक छोटे से वर्ग के हितों का जिन्हें हम भूमाफिया, बिल्डर और राजनेता कहते हैं। उनकी जेब तो भरती गई, शहर खोखले होते गए जिसका परिणाम हमारे सामने है।

भारत में हर वर्ष बाढ़ आती है और तड़पते सिसकते परिवारों को छोड़ जाती है जिनके पास न रहने को घर-बार बचता है न माल असबाब। प्रतिवर्ष होने वाली इस क्षति से स्थायी मुक्ति। पाने की आवश्यकता है। बाढ़ की समस्या राज्यों का विषय है। इसे राज्य का विषय न रखकर केन्द्र का विषय बना दिया जाना चाहिए, क्योंकि यदि कोई राज्य अपने हित के लिए अपने संबंध तोड़ दे तो उसके पड़ोसी राज्य में बाढ़ का प्रकोप हो सकता है जिसे नियंत्रण कर पाना भी कठिन हो सकता है और राज्यं एक दूसरे पर दोषारोपण भी नहीं कर सकेंगे जैसा जुलाई 2016 में गुडग़ांव में आई बाढ़ एवं उससे लगने वाले 18 घंटे जाम का दोष हरियाणा के मुख्यमंत्री ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पर लगा दिया था।

11-09-2016

प्राय: बाढ़ को रोकने के लिए नदियों को नियंत्रित करने के लिए बांध बनाए जाते हैं परंतु कभी-कभी ये बांध भी अभिशाप बन जाते हैं, महाराष्ट्र में सबसे अधिक बांध बने हैं और वही सबसे ज्यादा अकाल भी पड़ता है जिस क्षेत्र से राजस्थान कैनाल गुजरी है उसके आस-पास के खेत बर्बाद हो गए हैं, बड़े-बड़े बांध बनाने की अपेक्षा सौ छोटे-छोटे तालाब बनवाएं उन सौ तालाबों का पानी ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करेगा, जबकि अकेला भाखड़ा बांध एक कुएं को भी रिचार्ज नहीं कर सकता और वे सौ तालाब बरसात के पानी को भी अपने अंदर समेटेंगे जिससे बाढ़ का खतरा भी कम होगा और कुंओं से पीने का पानी मिलेगा जिससे सूखे की समस्या भी दूर होगी।

मौजूदा जल संकट चाहे वह सूखे के रूप में हो या बाढ़ के रूप में इसका मुख्य कारण तालाब और कुएं जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों को मिटाना है। पहले एक गोलाई लिए तालाब बनता था और वह गहरा होता था जिसमें पानी पूरे वर्ष जमा रहता था परंतु अब जो तालाब बनाए जा रहे हैं (वास्तव में बहुत कम तालाब बनाए जा रहे हैं) वे मशीन से एकदम समतल बनाए जा रहे हैं और वे जल्दी सूख जाते हैं। यदि देश को बाढ़ और सूखे से मुक्त करना है तो तालाब के डिजाईन के बारे में अवश्य सोचना होगा। आर्थिक विकास की तरह तालाबों का संरक्षण और प्रबंधन को उच्च  प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। आज देश में लातूर का उदाहरण सबके सामने है। रामगढ़ की तरह पानी की एक-एक बूंद रोकनी चाहिए जहां भी तालाब नष्ट हुए वहां से कुंए भी नष्ट हो गए हैं।

जब अंग्रेजों ने सर्वे किया था उस समय देश में 25 लाख तालाब थे। दिल्ली में आठ-नौ सौ तालब थे। हर वर्ष अकाल और बाढ़ से लडऩे में अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं। लोग कहते हैं कि सरकार संवेदनशील थी, क्योंकि उसने लातूर में रेल से पानी पहुंचाया। क्या यह हमारे विकास का पैमाना होगा। विकास उसे कहेंगे जब अकाल या बाढ़ हमारे दरवाजे तक आए और दरवाजा खटखटा कर वापस चले जाएं, जैसा राजस्थान में जैसलमेर में लोगों ने करके दिखाया। उन्होंने बड़े-बड़े तालाब बनाए पानी की एक-एक बूंद को उसमें इकट्ठा किया। शहरों की फैलती सीमाओं कारखानों और ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों के कारण जब प्रबंधन आज सबसे बड़ी चुनौती है। हमारा जल प्रबंधन सही नहीं है, इसलिए कभी चैन्नई में बाढ़ दिखाई देती है, तो कभी लातूर का सूखा। रेल से पानी पहुंचा देना समस्या का स्थायी हल नहीं है। जिस तरह हमारी राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है उसी तरह भूजल का स्तर भी गिरता जा रहा है।

 श्रीकृष्ण मुदगिल

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