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पाकिस्तान या कैंसर!

पाकिस्तान या कैंसर!

एक तरफ भारतीय अभिनेत्री रम्या हैं जो रक्षामंत्री पर्रिकर द्वारा पाकिस्तान को नर्क कहे जाने पर एतराज उठाया। दूसरी तरफ पाकिस्तान के एक अहम राजनीतिक दल मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के नेता अल्ताफ हुसैन हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को ‘पूरी दुनिया के लिए कैंसर’ करार दिया है। लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे हुसैन ने पिछले दिनों अपने कार्यकर्ताओं को वीडियो के जरिये संबोधित करते हुए कहा, ‘पाकिस्तान दुनिया के लिए अभिशाप है। यह वैश्विक आतंकवाद की धुरी है, पाकिस्तान जिंदाबाद कौन कहता है, यह तो पाकिस्तान का बेड़ा गर्क है।’

यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। दरअसल, एमक्यूएम पिछले कुछ समय से अपने कार्यकर्ताओं के गायब होने और उनकी हत्या किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। कराची में इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान एमक्यूएम समर्थकों ने एआरवाई न्यूज चैनल के दफ्तर पर तोड़-फोड़ की।

पिछले दिनों पाकिस्तानी अद्र्धसैनिक बल ने कराची स्थित एमक्यूएम के कार्यालय और व्यावसायिक केंद्र को सील कर दिया तथा पार्टी के नौ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इन कार्यकर्ताओं पर दो न्यूज चैनलों पर हमला करने का आरोप है। सिंध पुलिस प्रमुख एडी ख्वाजा ने बताया कि पाकिस्तान विरोधी बयान देने के लिए हुसैन के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है।

सच ही तो कहते हैं अल्ताफ हुसैन। पाकिस्तान भी बड़ा अजीब मुल्क है। एक तरफ वह आतंकवाद का स्पांसरर है, शरणदाता है और दूसरी तरफ आतंकवाद का शिकार भी है। पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा और जैशे मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन तो पाकिस्तानी सेना और खुफिया ऐजेंसी आईएसआई के इशारे पर भारत में आतंकवाद फैलाने का काम करते हैं। दूसरी तरफ तहरीके तालिबान जैसा पाकिस्तान आतंकी संगठन भी है जो पाकिस्तान के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता है। वह अब तक कई दिल दहला देने वाले हमले कर चुका है। पाकिस्तान अपने को मुस्लिम राष्ट्र कहता है, लेकिन इसी पाकिस्तान में 40 लाख अहमदियां पर कानूनी तौर पर पाबंदी है कि वे अपने को मुसलमान नहीं कह सकते। कुछ ऐसा ही बुरा हाल विभाजन के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुहाजिरों का भी था।

आखिर क्या है मुहाजिर और उनका संगठन एमक्यूएम और कौन हैं उनके नेता अल्ताफ हुसैन? 1947 के बंटवारे में भारत से लाखों मुसलमान सिंध की ओर पलायन कर गए। बाद में इन्होंने अपना केंद्र राजधानी कराची बनाया। बंटवारे से पहले कराची में सिंधिये बहुसंख्यक थे, लेकिन भारत से गए मुसलमानों की वजह से वहां की आबादी में बदलाव आया। नतीजतन कराची शहर में एमक्यूएम समर्थक मुहाजिरों का वर्चस्व हो गया।

11-09-2016

पहले जिस कराची में सिर्फ ‘जिए सिंध’ के नारे और सिंधी भाषा का शोर सुनाई देता था उसकी जगह उर्दू का प्रभाव बढ़ता गया। बेशक, कायदे-आजम मुहम्मद अली जिन्ना की अपील  पर भारत के कई शहरों से लाखों मुसलमान पाकिस्तान तो चले गए, लेकिन पाकिस्तान में उनके साथ जिस तरह का भेदभाव हुआ उसकी टीस बंटवारे के 64 साल बाद भी उनके मन में है। यही कारण था कि अस्सी के दशक में कराची में मुहाजिरों में एक नेता अल्ताफ हुसैन का उदय हुआ और उन्होंने करोड़ों मुहाजिरों की रहनुमाई की, जिनकी न तो कोई आवाज सुनी जाती थी और न ही उनके वजूद को कबूल किया जाता था। अल्ताफ हुसैन के परिवार ने भारत के शहर आगरा से बंटवारे के समय कराची में शरण ली थी। अल्ताफ हुसैन की पार्टी मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) जो पहले मुहाजिर कौमी मूवमेंट के नाम से जानी जाती थी। एमक्यूएम पहले एक छात्र संगठन के रूप में उभरा। हालांकि, एमक्यूएम के बढ़ते प्रभाव से पाकिस्तान की राजनीति पर लंबे समय से काबिज राजनेता चिंतित हो गए, नतीजतन 1989-90 में कराची में जबर्दस्त खून-खराबा हुआ। इस खूनी लड़ाई में एमक्यूएम के संस्थापक अल्ताफ हुसैन के भाई और भतीजे का भी कत्ल कर दिया गया। खुद अल्ताफ हुसैन पर कई जानलेवा हमले हुए, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। इस हिंसा के बाद मुहाजिरों ने अल्ताफ हुसैन को अपना भरपूर समर्थन दिया। सिंध की जनता का प्यार देख कर अल्ताफ हुसैन ने एमक्यूएम के बैनर तले पाकिस्तान की राजनीति में उतरने का ऐलान कर दिया। प्रांतीय चुनाव में एमक्यूएम सिंध में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 1990 में चुनाव के बाद कराची में राजनीतिक हिंसा एक बार फिर भड़क उठी। दर्जनों एमक्यूएम के कार्यकर्ता इस हिंसा में मारे गए।

पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता ने इस हिंसा के लिए अल्ताफ हुसैन को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया और हुसैन को मुल्क से बाहर कर दिया गया। पिछले कई सालों से अल्ताफ हुसैन लंदन में बैठकर अपनी पार्टी चला रहे हैं। अल्ताफ हुसैन की मांग है कि पाकिस्तान सरकार मुहाजिरों के साथ भेदभाव करना बंद करे। पाकिस्तान की सेना और प्रशासन में मुहाजिरों को उचित भागीदारी दी जाए। कराची में जारी इस कत्लेआम के बाद एमक्यूएम केंद्र और सिंध प्रांत में पीपीपी की अगुवाई वाले गठबंधन से अलग हो गया। दरअसल कराची में जारी हिंसा के जातीय पहलू हैं- पश्तो और ऊर्दू बोलने वाले समुदायों को निशाना बनाया गया है।

‘वैसे एमक्यूएम पर रॉ के इसारे पर काम करने और उससे आर्थिक मदद लेने के आरोप पहली बार नहीं लगे हैं। समय-समय पर पाकिस्तान का गैर उर्दू भाषी समाज और राजनैतिक दल भी अल्ताफ हुसैन पर हिंदुस्तानपरस्त होने के आरोप लगाते रहे हैं। कभी पाकिस्तानी फौजों के खिलाफ टिप्पणी तो कभी पाकिस्तान के जन्म पर सवालिया निशान लगाने के चलते पाकिस्तानी मीडिया भी उन्हें ‘हिंदभक्त’ और भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का मोहरा बताता रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के एक मंत्री ने इस तरह का आरोप लगाया था। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई बीबीसी सरीखी स्वतंत्र मीडिया संस्था इस तरह की बातें दुनिया के सामने रख रही हो। इसके लिए बहुत कुछ अल्ताफ हुसैन के बेबाक बयान भी जिम्मेदार हैं। वैसे पाकिस्तान कुछ समय से रॉ और एमक्यूएम के रिश्तों को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने लाने  के अभियान में लगा हुया है।

अल्ताफ हुसैन ने सन 2007 में दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में भारत-पाक विभाजन के बारे में कहा था यह जमीन का नहीं, बल्कि खून के रिश्तों का बटवारा था। यह बयान किसी तटस्थ टिप्पणीकार या हिंद-पाक के बीच भाईचारे की सोच को बढ़ावा देने वाले किसी सामाजिक संगठन का तो हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान का कोई राजनेता ऐसा कहने की शायद ही सोच भी सकता हो। उस समय एमक्यूएम जनरल मुशर्रफ की तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य सरकार में शामिल था। साथ ही अल्ताफ हुसैन ने बंटवारे के वक्त हिंदुस्तान से पाकिस्तान गए उन मुहाजिरों की ओर से माफी भी मांगी और भारतीय सरकार से यह आग्रह भी किया कि ‘यदि मुहाजिर वापस हिंदुस्तान लौटना चाहें तो उन्हें पनाह दे। उनके इस बयान पर पाकिस्तान में भारी बवाल हुआ था। वैसे अल्ताफ हुसैन पर 1978 में पाकिस्तानी झंडा जलाने का भी आरोप है।

11-09-2016

इस कारण वे पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन ‘क्लीन-अप’ का शिकार बनें। उस समय पाकिस्तानी सेना को कुछ नक्शे मिले थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं मिल पाया कि वह योजना अल्ताफ हुसैन की ही थी, लेकिन हुसैन को देश छोडना पड़ा। वे बीस साल से लंदन में रह रहे हैं, लेकिन एमक्यूएम पर उनकी पकड़ जरा भी ढ़ीली नहीं हुई है। वे वहीं से पार्टी का सारा कामकाज देखते हैं। लेकिन तबसे एमक्यूएम पर पाकिस्तान सेना की विशेष नजर रहती है।

पाकिस्तान के उत्तर वजीरीस्तान और फाटा राज्यों में आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन-जब्रे अज्ब-पूरा करने के बाद पाकिस्तानी सेना ने अपना मोर्चा शहरों की तरफ मोड़ा है। कराची अभी संगठित अपराधों, हफ्ताखोरों और सुपारी हत्याओं के जाल में फंसा हुआ है। कराची अल्ताफ हुसैन और एमएमक्यू का सबसे मजबूत गढ़ भी है। सेना अपने कराची ऑपरेशन की आड़ में एमक्यूएम का सफाया करने की कोशिश कर सकती है ऐसा कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों को लगता है। कुछ जानकारों का मानना है सेना के ‘माइनस वन फार्मूले’ का मतलब है कराची माइनस एमक्यूएम और अल्ताफ हुसैन। पिछले मार्च महीने में सेना ने पार्टी के कार्यालय पर छापा मारा था। अप्रैल माह में हुए राष्ट्रीय असेंबली के उपचुनाव में ‘जागो मुहाजिर जागो’ का नारा देकर फिर कराची पर अपना वर्चस्व साबित किया। इससे राजनीतिक हल्कों में हडकंप मचा हुआ है। आज कराची के हर चार परिवारों में तीन परिवारों के भारत में रिश्तेदार हैं। मुहाजिर समुदाय ने भारत के प्रति अपने प्रेम को छुपा कर नहीं रखा।

भारतीय संस्कृति उन्हें हमेशा पुकारती रहती है। कराची के ओरंगी टाउन का बनारसी क्लाक मार्केट हो, अलीगढ़ कालोनी, बिहार कालोनी, दिल्ली कालोनी, आगरा ताज कालोनी हो, पंजाबी सौदागरी कालोनी, बंैगलूरू टाऊन, बनारस चौक आदि अपनी पहचान की निशानियों को उन्होंने जतन से बचाकर रखा है। कभी सिंध में आकर बसे मुहाजिरों ने बहुत तरक्की की, लेकिन बाद में उनसे भेदभाव होने लगा। तब उन्होने 1976 में नारा दिया – ‘सिंध में होगा कैसे गुजारा आधा तुम्हारा आधा हमारा’-जिसका मतलब था सिंध में आधा राज्य मुहाजिरों का हो। लेकिन जवाब में सिंधियों ने नारा लगाया – ‘मरसु मरसु सिंध न देसु’ – इससे मुहाजिरों को स्पष्ट हो गया कि अलग राज्य नहीं मिलने वाला। दरअसल ‘जब हमारे पास मुल्क था (भारत), तब हम आजादी कि तलाश में निकले थे। आज हम आजाद हैं, और मुल्क कि तलाश में हैं’ यह शेर मुहाजिरों की मानसिकता पर बखूबी प्रकाश डालता है।

पिछली साल 1 मई को अल्ताफ हुसैन ने लंदन से पाकिस्तान के लोगों को संबोधित किया। इस भाषण में उन्होंने मुहाजिर युवाओं से अपील की कि रोज कारची के क्लिफटन समुद्री तट पर कसरत करें, उन्होंने रॉ से कहा कि उनका खुलकर साथ दें, हथियार भी दे। कराची के लाईन जीरो कार्यालय में इक_े समुदाय ने तालियां बजाकर बयान का स्वागत किया। इस कारण पाकिस्तानियों के चेहरे पर चीन के 47 अरब करोड़ के निवेश से उपजा आशावाद गायब होकर चिंता की लकीरे उभर आईं हैं।

 सतीश पेडणेकर

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