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बाप चवन्नी तो बेटा अठन्नी

बाप चवन्नी तो बेटा अठन्नी

मुलायम सिंह फिर मुस्कराने लगे हैं। खुशमिजाज नजर आ रहे हैं। लोगों को इसका राज समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन खुसफुसाहट तेज है। कोई कह रहा है जयाप्रदा के फिल्म विकास बोर्ड का चेयरमैन बनाये जाने से खुश हैं तो कोई इसकी वजह घर-परिवार की कलह निबटने को मान रहा है। खैर, खबरची को पता चलता है कि मुलायम बेटे अखिलेश के मैनेजमेंट से खुश हैं। अखिलेश ने पांच साल सीएम रहकर जहां अपनी छवि को बनाए रखा है, वहीं चुपचाप विरोधियों को भी निबटा दिया है। यहां तक कि चचा शिवपाल से लेकर आजम, अमर, रामगोपाल सब को सही-गलत की समझ आ गई है।



खबरदार मैं राजनाथ हूं


11-09-2016

अपने गृहमंत्री के दम की खूब तारीफ हो रही है। पाकिस्तान से आतंकवाद पर कूटनीति खेलकर आये गृहमंत्री ने कश्मीर घाटी में हिंसा पर काबू पाने के लिये जोरदार पहल की है। जब से गृहमंत्री ने तुरुप का पत्ता चला है, आधे विरोधी हवा में लटक गए हैं। पाकिस्तान यात्रा के बाद से ही गृहमंत्री जी पूरे फार्म में हैं। राजनाथ ने जहां संघ की लाइन के अनुरूप कदम उठाया, वहीं कश्मीर में पहल से रुतबा दिखने लगा है। इसी का नतीजा रहा है कि अगले दिन सीएम महबूबा को सफाई देने के लिए दिल्ली आना पड़ा।



अभी तो मैं जवान हूं


11-09-2016

नब्बे की आयु पार कर रहे राम जेठमलानी की सक्रियता देख कर उच्चतम न्यायालय के जज भी चौंक गए। चौंके ही नहीं पूछ भी बैठे कि आखिर कब वह रिटायर होंगे। अपने जेठमलानी जी भी लाजवाब। दे दिया जवाब- भला मरने की तारीख कैसे बता दें। अब जज साहब को क्या पता कि अपने जेठमलानी जी की टीआरपी क्या है। जब वीपी सिंह पीएम थे, तब अपना रूआब दिखाया। जब अटलजी पीएम बने तब दिखाया। अब अपने मोदीजी दो साल से पीएम हैं। हाल ही में जेठमलानी जी राज्यसभा में आए हैं। अभी तो उन्हें अपना फिर रूआब दिखाना बाकी है। भला इससे पहले वह राजनीति और वकालत से कैसे सन्यास ले सकते हैं।



आजा…आ…आ…


11-09-2016

कांग्रेस के खेमे में सब ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेसी भाइयों के मुताबिक राहुल बाबा थोड़े से खिन्न चल रहे हैं। खिन्न होने की वजह भी है। पहली तो यह कि बहन प्रियंका अचानक कुछ ज्यादा सक्रिय हो गई हैं। कांग्रेसी नेताओं का एक बड़ा गुट भी प्रियंका लाओं, कांग्रेस बचाओं का नारा छेड़े हुए हैं। दूसरी तरफ कैंपेनर प्रशांत किशोर ने भी दमदार चेहरे की रट लगा रखी है। इसके अलावा दामाद रॉबर्ट वाड्रा भी अपना जौहर दिखाने को बेताब हैं। लिहाजा राहुल बाबा कांग्रेस उपाध्यक्ष की जिम्मेदारियों तो निभा रहे हैं, लेकिन अंदरूनी पावर टसल भी उन्हें तंग करने लगी है।



कहां गयी चौधराहट


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चौधरी अजीत सिंह की चौधराहट तो देखिए, पूंछ कोई नहीं रहा है और खुद ही चुप भी हैं। एक पत्रकार भाई ने 2017 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बाबत पूछ लिया तो पहले चौधरी ने कहा कि राष्ट्रीय  लोकदल  अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी। फिर बोले कुछ हो न हो रालोद 20-25 सीटें भाजपा की खराब कर ही देगा। बातचीत की करवट बदली तो कह बैठे, मायावती को छोड़कर बाकी सपा, कांग्रेस, जदयू, भाजपा सब राष्ट्रीय लोकदल का साथ चाहते हैं। बस चौधरी साहब को इसमें अभी कोई दिलचस्पी नहीं है। वाह चौधरी वाह क्या राजनीतिक तुर्रा छोड़ा है।



हम बेवफा हरगिज न थे


11-09-2016

बसपा सुप्रीमों मायवती परेशान हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि आगे-पीछे टहल बजाने वाले नेता अचानक क्यों बेवफा हो गए। स्वामी प्रसाद मौर्या, आरके चौधरी और अब ब्रजेश पाठक, जबकि ये मायावती की वफादार चौकडिय़ों में गिने जाते थे। सुना है मायवती ने अब अगले उस बसपाई की तलाश तेज कर दी है जो पार्टी छोडऩे की फिराक में हैं। ताकि खुद तो जाए, कोई बड़ा नुकसान न कर पाए। वहीं बसपाई यह नहीं बता पा रहे हैं कि अगला कौन सा कद्दावर भाजपा में शामिल होगा।



ईरानी की माया


11-09-2016

केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी की माया किसी को समझ में नहीं आ रही है। जब से मंत्री जी शास्त्री भवन से उद्योग भवन पहुंची हैं, चैन से नहीं बैठ रही हैं। 10-12 घंटे काम। अधिकारियों की क्लास, मंत्रालय की ब्रांडिंग सब कुछ कर रही हैं। मनपसंद अधिकारी भी छांट रही हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय से मीडिया सलाहकार के रूप में घनश्याम गोयल को भी छांटकर ले गई हैं। लेकिन विवाद पीछा नहीं छोड़ रहा है। हाल में साडिय़ों के भुगतान का बिल ही विवाद बन गया है। सुना है लाखों की साड़ी के बिल को लेकर मंत्रालय की सचिव से ही ठन गई है।



घर के न घाट के


11-09-2016

मशहूर क्रिकेटर, लाजवाब लाफ्टर नवजोत सिंह सिद्धू को जोर का झटका जरा धीरे से लगा है। बेचारे जब से भाजपा छोड़कर गए हैं, न घर के हुए न घाट के। आम आदमी पार्टी बहुत भाव देने के मूड़ में नहीं हैं, वहीं कांग्रेस भी आओ जी आओ कहकर चुप हो जा रही है। जबकि बीजेपी है कि सिद्धू के साये का भी केवल पीछा कर रही है। ऐसे में सिद्धू भाई को समझ मे नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करें? जाएं तो किधर? केजरी भाई भी केवल आदरपूर्वक बात करके चुप हो जा रहे हैं। अब भला कौन सिद्धू भाई को समझाए कि ऐसा मुसाफिर तो बस भटकता ही रहता है।


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