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राष्ट्रपति का नालंदा दृष्टिकोण

राष्ट्रपति का नालंदा दृष्टिकोण

हर आदमी अपनी प्रतिबद्घताओं के लिए जाना जाता है और हर राष्ट्राध्यक्ष अपने किए कामों के लिए। जी हां, मैं देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का ही जिक्र कर रहा हूं। उनके जैसे दूरदृष्टि और दृढ़ राजनैतिक इच्छा-शक्ति वाले नेता विरले ही हैं। उन्होंने पहले विदेश और वित्त मंत्रालयों का कार्यभार बड़ी कुशलता से संभाला और अब ऐसे ऊर्जावान और सतत सतर्क रहने वाले राष्ट्रपति की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं, जिनके पास देश में उच्च शिक्षा और ज्ञान का गौरव लौटा लाने का साफ नजरिया है। कभी भारत अपनी परंपरा, ज्ञान, समृद्घ संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, इतिहास और धर्म के आधार पर दुनिया भर में उच्च शिक्षा के अपने उच्चतर मानकों के लिए जाना जाता था। लेकिन, अब दुर्भाग्य से भारत का स्थान दुनिया के 100 अव्वल विश्वविद्यालयों में नहीं है। आज भारत के आला विश्वविद्यालय उच्चतर अध्ययन के केंद्र के रूप में कम, राजनैतिक रस्साकशी और परिसरों में सांस्कृतिक प्रदूषण के लिए ज्यादा जाने जाते हैं। पिछले एक साल में राष्ट्रीय सुर्खियों में उछली घटनाओं पर गौर करें तो साफ-साफ दिख सकता है कि भारत में उच्चतर शिक्षा सही पटरी पर नहीं चल रही है, जिस पर उसे फर्राटा भरना था। यहां तक कि एक के बाद एक सरकारें भी देश में उच्चतर शिक्षा के लिए कोई मुकक्वमल सिद्घांत नहीं गढ़ पाईं हैं। बेशक, देश में निजी विश्वविद्यालय कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। ये संस्थान बिना निर्देशित मिसाइल की तरह दिशाहीन इधर-उधर भटक रहे हैं और बेहिचक यह कहा जा सकता है कि ये देश में शिक्षा बिक्री के कमाऊ धंधे में बदल गए हैं।

यह आसानी से जाना जा सकता है कि शताब्दियों पहले नालंदा विश्वविद्यालय के दौर के मुकाबले आज भारत में विदेशी छात्रों की आमद काफी घट गई है। यह प्रणब दा के लगातार प्रयासों का ही परिणाम है कि 2015 में पहली बार भारतीय शिक्षा संस्थानों को क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में दुनिया के आला 200 विश्वविद्यालयों में जगह मिली। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में एशिया के आपसी संबंधों का विस्तार हुआ। चीन, जापान, तिद्ब्रबत के छात्रों ने नालंदा में पठन-पाठन किया। बाद के दौर में नालंदा के बौद्घ भिक्षुओं ने दुनिया भर में अपने ज्ञान का प्रसार किया। प्रणब दा उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में भारत की वही स्थिति दोबारा बहाल करना चाहते हैं। अगर हम एक नालंदा को पुनर्जीवित कर पाए तो उसके सकारात्मक माहौल और नए विचारों से देश में अनेक केंद्र उसके अनुरूप स्थापित हो सकते हैं। भारत जीवन के हर क्षेत्र में अपनी बौद्घिक विलक्षणता के लिए हमेशा से प्रसिद्घ रहा है। दुनिया भर में भारतीय दर्शन, वैदिक ज्ञान और विभिन्न धर्मों के अध्ययन पर हमेशा ही खासा जोर रहा है। अतीत में भारतीय संस्थानों में उच्च स्तर का तर्क-वितर्क चला करता था। हमारे विद्घानों ने हमेशा ही इतिहास और परंपरा को विशेष स्थान दिया है।

हमारी समृद्घ संस्कृति, परंपरा और समाज के विकास में देश या विदेश में विद्घानों का कभी टोटा नहीं रहा है। प्रणब दा को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने विदेश मंत्री के रूप में नालंदा विश्वविद्यालय के पुनर्जीवन के विचार को आगे बढ़ाया। नालंदा विश्वविद्यालय का विचार 2007 में पूर्वी एशिया शिखर सक्वमेलन के दौरान रखा गया। भारत की संसद में 2010 में नालंदा को अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित करने का कानून सर्वसम्मति से पास किया गया। अब नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति जॉर्ज यो हैं, जो सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री हैं। उन्होंने सही कहा, ”यह मनुष्यों के बीच आपसी सौहार्द, प्रकृति से मनुष्य के तादात्क्वय और मनुष्य को प्रकृति का अंग मानने के प्रति प्रतिबद्घता ही है कि भारत सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय को विश्व को समर्पित किया है।’’

भारत के लिए यह गर्व का विषय है कि शताब्दियों बाद नालंदा विश्वविद्यालय आज अपने पुराने खंडहरों से महज 15 किमी. की दूरी पर फिर स्थापित हो गया है। ऐतिहासिक राजगीर में फिर एक अंतर्राष्टï्रीय विश्वविद्यालय अपना प्रकाश फैलाएगा। राजगीर की चर्चा रामायण और महाभारत में मिलती है। बुद्घ ने राजगीर पहाड़ी के एक किनारे पर अपने कई बेहद प्रसिद्घ सूत्रों की रचना की। उनकी मृत्यु के बाद बौद्घ धर्म की पहली परिषद का आयोजन राजगीर में हुआ था। आज नालंदा विश्वविद्यालय में 25 विदेशी सहित 125 छात्र हैं। प्रणब मुखर्जी के हाल में हुए चीन दौरे के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय और पेकिंग विश्वविद्यालय के बीच सहमति पत्र पर दस्तखत हुए। उस मौके पर हमारे राष्ट्रपति ने कहा, ”आधुनिक नालंदा के पाठ यह आश्वस्त करते हैं कि यह महान परंपरा उसके परिसर में पुनर्जीवन प्राप्त करे। विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का केंद्र होना चाहिए। वहां विविध और विरोधाभासी विचारों को जगह मिलनी चाहिए। वहां असहिष्णुता, पूर्वाग्रह और घृणा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा इस संस्थान में विभिन्न विचारों, सिद्घांतों और दर्शनों को अभिव्यक्ति मिलनी चाहिए।’’ नालंदा विश्वविद्यालय के संरक्षक के नाते प्रणब दा ने उक्वमीद जाहिर की कि यह विश्वविद्यालय सच्चे अर्थों में अपने पुराने गौरव को हासिल करेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि महान शिक्षा संस्थानों में अच्छे शिक्षक और प्रशासक भी होने चाहिए। प्राचीन नालंदा में विलक्षण अध्यापकों और प्रशासनिक कर्मियों को जगह मिली हुई थी। नालंदा दुनिया में महान संस्थान सिर्फ अपने विलक्षण पाठ्यक्रम की वजह से ही नहीं बना, बल्कि खगोलशास्त्र, औषधि शास्त्र, तर्क शास्त्र, भाषा विज्ञान जैसे अनेक विषयों की पढ़ाई होती थी और वह किताबें, ग्रंथों, वास्तुशिल्प और कला संग्रहों के लिए भी प्रसिद्घ था। आईए कामना करें कि आधुनिक नालंदा को विशद रूप में स्थापित करने का प्रणब दा का सपना साकार हो।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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