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मंदिर जाने के वैज्ञानिक कारण

मंदिर जाने के वैज्ञानिक कारण

भारत अपनी परंपराओं और हिंदू संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग नक्कासी के सैकड़ों मनमोहक मंदिर उपस्थित हैं। इनकी नक्कासी अपने आप में अनूठी कला का प्रतीक है। लेकिन, मंदिरों का जैसा वर्णन वैदिक साहित्यों में किया गया है, सभी मंदिर उस तरह की कला और आकृति के नहीं है। मंदिर में प्र्रवेश करने से न केवल ईश्वर कृपा प्राप्त होती है, बल्कि शांति का भी अनुभव होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाए तो मंदिर जाने के 10 महत्वपूर्ण कारण हैं।

मंदिर का स्थान और संरचना
मंदिरों को जान-बूझ कर ऐसे स्थानों पर बनाया जाता है, जहां पर सकारात्मक ऊर्जा विद्यमान होती है। साथ ही वहां चुम्बकीय लहरें उत्तर-दक्षिण केन्द्रों को धकेलती हैं। प्राचीन काल में भगवान की मूर्ति को मंदिर के अन्तर्भाग में ही रखा जाता था, जिसे गर्भगृह या मूलस्थान कहा जाता है। एक मंदिर की संरचना का कार्य भगवान की मूर्ति को गर्भगृह के उच्च सकारात्मक केन्द्र में रखने के बाद ही शुरू किया जाता है। ये मंदिर का वो मूलस्थान होता है जहां पृथ्वी की चुंम्बकीय लहरें सबसे ज्यादा पाई जाती हैं।

मंदिर के बाहर उतारें जूते-चप्पल
मंदिर वह स्थान है जहां सदैव सकारात्मक और चुम्बकीय लहरों से वातावरण शुद्घ बना रहता है। प्राचीन काल में मंदिर के फर्श की रचना ऐसे पत्थरों या धातुओं से की जाती थी जो सकारात्मक ऊर्जा और चुम्बकीय लहरों का सुचालक हो, ताकि ये ऊर्जा और लहरें पैरों के नीचे से गुजर कर हमारे शरीर में प्रवेश कर सकें। इसलिए आवश्यक है कि जब हम मंदिर में जाएं तो जूते-चप्पल बाहर उतारकर ही जाएं। दूसरा कारण जूते-चप्पल उतारने का ये है कि जूते-चप्पल पहनकर मंदिर में प्रवेश करने से अशुद्घि भी मंदिर परिसर में पहुंच जाती है, जिससे मंदिर का वातावरण अशुद्घ होता है और नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।

मंदिर जाने से पांचों इन्द्रियां सक्रिए होती हैं
मनुष्य के शरीर में पांच इन्द्रियां होती हैं – श्रवण, स्वाद, स्पर्श, दृश्य और सुगंध। ये इन्द्रियां मंदिर में उपस्थित सकारात्मक ऊर्जा तभी ग्रहण कर सकती हैं जब मंदिर में जाने के बाद मनुष्य की ये पांचों इंद्रियां ठीक से काम करें। इन इंद्रियों को सक्रिय करने के लिए मंदिर में विभिन्न तरह की क्रियाएं की जाती हैं, जैसे धूप-दीप, घंटा-ध्वनि, आरती आदि।

04-04-2015

घंटा बजाने से श्रवण इंद्री सक्रिय होती है
मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से पहले लोग घंटा बजाते हैं और फिर प्रवेश करते हैं। घंटा बजाने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उससे हमारे दिमाग के  दाएं और बाएं दोनों हिस्से एक साथ सक्रिय हो जाते हैं। घंटा बजाने से तेज और टिकाऊ ध्वनि उत्पन्न होती है, जो कम-से-कम 7 सेकंड के लिए गूंजती है। इस गूंज से मनुष्य शरीर में उपस्थित सातों चक्र सक्रिय होने लगते हैं। इससे मस्तिष्क में मौजूद नकारात्मक विचार शून्य हो जाते हैं और मस्तिष्क सकारात्मक विचारों से पूर्ण होने लगता है। ऐसी भी धारणा है कि गर्भगृह में मौजूद भगवान की मूर्ति भी घंटा ध्वनि को कुछ सुनिश्चित वक्त पर ग्रहण करती है।

कपूर प्रज्ज्वलित करने से दृश्य इंद्री सक्रिय होती है
मंदिर में आरती करने के लिए कपूर का दिया जलाया जाता है। जलते हुए कपूर को देखने से हमारी दृश्य इंद्री सक्रिय होती है। एक धारणा के अनुसार, आरती के लिए जलाए जाने वाली अग्नि की लौ से निकलने वाली तरंगों को मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्ति भी एक सुनिश्चित वक्त पर ग्रहण करती है।

आरती लेने से जागृत होती है स्पर्श इंद्री
आरती करने के बाद जब जलते हुए कपूर की लौ को भक्तों तक पहुंचाया जाता है, तो भक्त कपूर की लौ से अपने हाथों को गर्म करके अपनी आंखों का स्पर्श करते हैं। इस क्रिया से मनुष्य की स्पर्श इंद्री जागृत होती है।

भगवान को फूल अर्पण करने से जागृत होती है सुगंध इंद्री
फूल देखने में जितने मनमोहक होते हैं, उनकी सुगंध भी उतनी ही लुभावनी होती है। भगवान को फूल अर्पण करने से मंदिर परिसर का वातावरण सुगंधमय हो जाता है। फूल, कपूर और अगरबत्ती की महक से चारों तरफ सुगंधित वातावरण तैयार हो जाता है, जिससे सुगंध इंद्री जागृत होती है और दिमाग को शांति मिलती है।

चरणामृत पीने से स्वाद इंद्री जागृत होती है
चरणामृत को बनाने के लिए कम-से-कम 8 घंटे तक तुलसी के पत्ते को पानी में डालकर तांबे के बर्तन में रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि तांबे में तीन दोषों (वात, कफ, पित्त) को खत्म करने की शक्ति होती है। इसलिए इसमें बनाया गया चरणामृत जहां शरीर के तीन दोषों की रोकथाम करता है, वहीं दूसरी तरफ चरणामृत ग्रहण करने से स्वाद इंद्री भी जागृत होती है।

तिलक लगाने का विधान
तिलक माथे के बीचों-बीच आज्ञा चक्र पर लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तिलक लगाने से शरीर की ऊर्जा क्षय होने से रूक जाती है और एकाग्रता का स्तर भी बढ़ता है। कुमकुम का तिलक लगाने से चेहरे की मांसपेशियों को रक्त की पूर्ति भी ठीक ढंग से होती है, जिससे चेहरे की कांति बनी रहती है।

केले और नारियल का भोग
नारियल और केले को फलों में सबसे अधिक पवित्र माना जाता है। अन्य फलों को उतना शुद्घ नहीं माना जाता। इसलिए इन दोनों फलों को ही भगवान के भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।

गर्भगृह की प्रदक्षिणा
ये सभी अनुष्ठान करने के बाद गर्भगृह की प्रदक्षिणा की जाती है। प्रदक्षिणा करते वक्त मनुष्य वह सभी सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करता है, जिससे पांचों इन्द्रियां सक्रिय होती हैं। ये पांचों सकारात्मक ऊर्जा एक साथ गर्भगृह का आवरण कर लेती हैं। प्रदक्षिणा करते वक्त सभी ऊर्जा एक साथ मनुष्य शरीर में प्रवेश करती है, इसलिए मंदिर जाने के बाद प्रदक्षिणा अवश्य करनी चाहिए। (अमेरिकन हिंदू एसोसिएशन)

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